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शनिवार, 10 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 26

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अवलोकन के इस चरण में 
केवल राम की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति जो हर पाठक के मन में विशेष स्थान बनाएगी 


राह चलते
जीवन के सफ़र में
मंजिल को तय करते
मिले मुझे लोग कई
अपनी-अपनी विशेषता से भरपूर
जिनमें अक्स देखा मैंने
अपनी भावनाओं का, अपने विचारों का
समर्थन का-विरोध का
प्रेम का-नफरत का, अच्छे और बुरे का भी
जितने नज़ारे हैं,
इस जहान में-उस जहन में
जितने अनुभव हैं, दुनिया में
एक-एक कर सब समेटे हैं मैंने
अपनी आँखों से-अपने मन से-अपने हृदय से
लेकिन इन सबसे परे पाया है मैंने
 ‘माँ’ की ममता को.

माँ का होना ही मेरा होना है

यूं माँ-माँ होती है, अक्सर लोग कहते हैं
लेकिन जितना मैंने पाया है
माँ को समझना आसान नहीं,
उसके अहसासों को शब्दों में बांधना  
कल्पनाओं और वास्तविकता को समझना
सामान्य बुद्धि का काम नहीं
नहीं होती है वह जुदा
अपने अक्स से
नहीं होता कोई अन्तर, उसके मन-वचन और कर्म में  
वह संजीदा है हर हाल में हर किसी के लिए
उसकी ममता में नहीं भेद अपने-पराये के लिए
समदृष्टि और समभाव की प्रतिमूर्ति है
माँ मेरे लिए.

सोचता हूँ कभी तनहाई में
क्या कुछ किया मैंने अपनी माँ के लिए?
यूं एक दिन उस चर्चा में, मैं भी शामिल हुआ था
जहाँ बखान कर रहे थे, अजीज मेरे
अपनी माँ की खुशियों के लिए किये गए
प्रयासों का,
वह मूल्य आंक रहे थे माँ की ख़ुशी का
भौतिक वस्तुओं से, अपनी उपलब्धियों से, अपनी शान भरी जिन्दगी से
लेकिन........
उनकी.... माँ उनसे दूर है
वह अकेले जीने को मजबूर है
बेटे उसे भेजते हैं चंद पैसे
उसका भी उन्हें गरूर है.

यूं माँ के प्रति फर्ज निभाना
काम मुश्किल है.
मैंने जब भी माँ के बारे में सोचा
मेरी कल्पना हमेशा बोनी साबित हुई
और कर्म अपंग हो गया
माँ के हर अहसास का मैं कर्जदार हो गया
जिन चीजों को मैंने समझा कि माँ की इसमें ख़ुशी है
तो मेरा यह अनुमान भी हमेशा आधारहीन साबित हुआ.
माँ बस माँ है
उसकी कोई व्याख्या नहीं
बजूद मेरा कुछ भी नहीं है
उसके सिवा
मैंने खुद को जब गहरे से विश्लेषित किया
तो पाया कि
माँ की बेहतर अभिव्यक्ति हूँ मैं
इस जहान में सबसे बेहतर रचनाकार है माँ
एक अद्भुत शिल्पकार है माँ
जो कष्ट सहनकर बनाती है एक जीवन
इस दुनिया के लिए
वह अर्पित कर देती है अपने कलेजे के टुकड़े को
देश की बेहतरी के लिए.

माँ ही जीवन है मेरा, उसकी ही छाया हूँ मैं
मेरी आँखों में रोशनी बेशक हो,
लेकिन दृष्टि माँ ने ही दी है मुझे
जुबान है मुँह में मेरे
भाषा और मिठास, माँ ने दी है मुझे
क्या अच्छा है, क्या बुरा
क्या सच है, क्या झूठ
क्या प्रेम है, क्या नफरत
इस सबकी पहचान दी है माँ ने मुझे
मेरे जीवन के सफ़र में
हर अहसास की साक्षी है माँ
मैंने जब-जब भी सोचा अपने बजूद के बारे में
तो हर बार यही पाया कि
मैं कहीं नहीं हूँ, कुछ भी नहीं
सिर्फ माँ की अभिव्यक्ति हूँ मैं

ठीक कवि की कविता की तरह
शिल्पकार की मूर्ति की तरह
चित्रकार की कूची से अभिव्यंजित
एक बड़े फलक पर उकेरे चित्र की तरह
सृजन हूँ में माँ का,
उसी से बजूद है मेरा
उसी की अभिव्यक्ति हूँ मैं

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 25


कुछ बातें किसी एक वर्ष के घेरे में नहीं होती, हर वर्ष वे दोहराई जाती हैं,उनके सज़दे किये जाते हैं, बर्फ शरीर में भी आग धधकती है  ... 

पढ़िए, सुनते हुए और अच्छा लगेगा ।  
अलग अलग सोच की कोपलें फूटेंगी, दिल कहेगा रब एक विक्रम फिर से चाहिए




कारगिल वॉर के हीरो शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की अनसुनी लव स्टोरी
सुशांत तलवार
कारगिल विजय के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा की जाबांजी के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे. हम सभी देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले उस हीरो की जिंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं को जानना चाहते हैं. हम कैप्टन बत्रा की जिंदगी के उन खूबसूरत लम्हों से अबतक अनजान हैं, जिनके सहारे उनकी हमसफर अपना जीवन बिता रही है. कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन बत्रा की लव स्टोरी भी उतनी ही खूबसूरत है जितना की उनकी बहादुरी के किस्से. 
मिलिए कारगिल वॉर में शहीद हुए कैप्टन विक्रम बत्रा की गर्लफ्रेंड- डिंपल चीमा से.
कैप्टन विक्रम बत्रा की जयंती के मौके पर डिंपल चीमा ने द क्विंट से बात की. इस दौरान उन्होंने 17 साल पुरानी उन खूबसूरत यादों को साझा किया, जिनके सहारे वह जिंदगी बिता रहीं हैं.
(

डिंपल चीमा की द क्विंट के साथ पूरी बातचीत यहां पढ़िएः

मैं साल 1995 में चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में पहली बार विक्रम से मिली थी. हम दोनों ने एमए इंग्लिश में एडमिशन लिया था. लेकिन न मैं पास हुई और न ही वो. मुझे लगता है कि वही हमारा नसीब था जो हमें करीब लाया. इंडियन मिलिट्री एकेडमी में सिलेक्शन होने के बाद विक्रम ने जब मुझे फोन किया था, उस आवाज की खनक मुझे अभी भी हूबहू याद है. उस खबर ने हमारे रिलेशन को मजबूत कर दिया था.
मेरे परिवारवाले जब मेरे लिए कोई रिश्ता लेकर आते और मैं उस बारे में विक्रम को बताती तो वो कहता, ‘जिसे प्यार करती हो, उसे हासिल करने की कोशिश करो...वरना लोग तुम्हें उससे प्यार करने को कहेंगे, जो तुम्हें मिलेगा’ उसकी इस बात को मैं आज भी फॉलो करती हूं.
हम अक्सर मंसा देवी मंदिर और गुरुद्वारा श्री नाडा साहिब जाते थे. एक बार हम मंदिर में परिक्रमा कर रहे थे और वह मेरे पीछे चल रहा था.
जैसे ही परिक्रमा पूरी हुई. उसने अचानक कहा- मुबारक हो मिसेज बत्रा. मैंने देखा उसने एक हाथ से मेरा दुपट्टा पकड़ रखा था...और मेरे पास अपनी खुशी बयां करने के लिए शब्द नहीं रह गए थे. रिश्ते को निभाने के लिए ये विक्रम का समर्पण था. 
वह हमेशा आगे बढ़ते रहने वाला शख्स था, कभी न थकने वाला. वह हमेशा कुछ न कुछ करता रहता था, वह कभी दो पल के लिए भी शांत नहीं बैठता नहीं था. एक बार हम एक रेस्तरां में अपने ऑर्डर का इंतजार कर रहे थे. इतने में वह टेबल बजाने लगा. जब मैंने रोका तो अपने पैर हिलाने लगा. आखिर मैं जब मैंने उसे आंखें दिखाई तो वो पानी पीने लगा. उसे देखकर कारगिल वॉर में जाने की बेकरारी साफ देखी जा सकती थी. मैं जब भी सोचती हूं तो मुझे महसूस होता है कि वो कारगिल में जाने के लिए उन दिनों कितना उत्सुक होगा.
एक बार जब वह आया तो मैंने उसे शादी के लिए बोला, उस वक्त शायद मैं डरी हुई थी. उसने बिना कुछ कहे अपनी जेब से ब्लेड निकाला और अपना अंगूठा काटकर अपने खून से मेरी मांग भर दी. मेरी जिंदगी में मुझे सबसे ज्यादा खुशी उसी दिन हुई. उस दिन के बाद से मैं उसे ‘पूरा फिल्मी’ बोलकर छेड़ने लगी थी.
4 साल के रिलेशन में बनाई उन यादों को चंद लफ्जों में बयां करना तो नामुमकिन है. 17 साल में एक दिन ऐसा नहीं गुजरा, जब मैंने खुद को तुमसे अलग पाया हो. मुझे हमेशा लगता है, किसी पोस्टिंग पर तुम मुझसे दूर गए हो. मुझे गर्व होता है, जब लोग तुम्हारी उपलब्धियों पर बात करते हैं. लेकिन दिल के किसी कोने में एक अफसोस जरूर है. कि काश तुम यहीं होते और अपनी बहादुरी की कहानियां सुन रहे होते...तो अच्छा होता. मुझे भरोसा है कि वो वक्त आएगा, जब हम फिर मिलेंगे. एक होंगे.

लेखागार