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सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

जय जय संतुलन

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज अपनी बात कहती हूँ आयुष झा आस्तिक के शब्दों के माध्यम से....

मेरी कमीज के बटन में 
शून्य चार!
चार आसमान,
पृथ्वी चार।
बटन रणभूमि,
चार घूड़सवार!
बटन तलवार,
बटन ढ़ाल।
पृथ्वी की
नकेल कसती एक सूई!
युद्ध पत्थर,
चार योद्धा छुई-मुई।
एक जोड़े आसमान के
कंधे पर पालो,
ऐ जोतते हुए हल बटोही,
पीठ पर एक पृथ्वी उठा लो।
तीन पृथ्वी,
तीन चंदा,
एक चूल्हा!
एक चूल्हा,चार योद्धा,एक थाली!
एक पंक्षी,एक वृक्ष और चार आरी।
दो आसमान जैसे
एक सिक्का के दो पहलू!
दो आसमान जैसे
एक तराजू का दो पलरा।
गर एक ऊपर,
एक नीचे!
गर एक आगे,
एक पीछे।
सात ढ़िबरी तेल सठा कर
संतुलन खोजो,
नदी/नाली से पइन उपछ कर
समंदर में बोझो।
उफ्फ संतुलन,
हाय संतुलन,
भाय-भाय संतुलन!
खोजकर्ताओं की
ऐसी-तैसी,
जय जय संतुलन...
-आयुष

एक नज़र आज के बुलेटिन पर









आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

"सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती...."

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

चित्र गूगल से साभार
व्हाट्स एप्प पर प्राप्त एक पोस्ट :

मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था, तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया। स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और अख़बार से चटाक हो गया और दो-एक मच्छर ढेर हो गए.!! फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मैं असहिष्णु हो गया हूँ.!! मैंने कहा तुम खून चूसोगे तो मैं मारूंगा.!! इसमें असहिष्णुता की क्या बात है.??? वो कहने लगे खून चूसना उनकी आज़ादी है.!! "आज़ादी" शब्द सुनते ही कई बुद्धिजीवी उनके पक्ष में उतर आये और बहस करने लगे.!! इसके बाद नारेबाजी शुरू हो गई., "कितने मच्छर मारोगे हर घर से मच्छर निकलेगा".???

बुद्धिजीवियों ने अख़बार में तपते तर्कों के साथ बड़े-बड़े लेख लिखना शुरू कर दिया.!! उनका कहना था कि मच्छर देह पर मौज़ूद तो थे लेकिन खून चूस रहे थे ये कहाँ सिद्ध हुआ है.?? और अगर चूस भी रहे थे तो भी ये गलत तो हो सकता है लेकिन 'देहद्रोह' की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि ये "बच्चे" बहुत ही प्रगतिशील रहे हैं., किसी की भी देह पर बैठ जाना इनका 'सरोकार' रहा है.!!

मैंने कहा मैं अपना खून नहीं चूसने दूंगा बस.!!! तो कहने लगे ये "एक्सट्रीम देहप्रेम" है.! तुम कट्टरपंथी हो, डिबेट से भाग रहे हो.!!! मैंने कहा तुम्हारा उदारवाद तुम्हें मेरा खून चूसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता.!!! इस पर उनका तर्क़ था कि भले ही यह गलत हो लेकिन फिर भी थोड़ा खून चूसने से तुम्हारी मौत तो नहीं हो जाती, लेकिन तुमने मासूम मच्छरों की ज़िन्दगी छीन ली.!! "फेयर ट्रायल" का मौका भी नहीं दिया.!!! इतने में ही कुछ राजनेता भी आ गए और वो उन मच्छरों को अपने बगीचे की 'बहार' का बेटा बताने लगे.!!

हालात से हैरान और परेशान होकर मैंने कहा कि लेकिन ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाता है, और तुरंत न सही बाद में बीमार और कमज़ोर होकर मौत हो जाती है.!! इस पर वो कहने लगे कि तुम्हारे पास तर्क़ नहीं हैं इसलिए तुम भविष्य की कल्पनाओं के आधार पर अपने 'फासीवादी' फैसले को ठीक ठहरा रहे हो..!!! मैंने कहा ये साइंटिफिक तथ्य है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है., मुझे इससे पहले अतीत में भी ये झेलना पड़ा है.!! साइंटिफिक शब्द उन्हें समझ नहीं आया.!!

तथ्य के जवाब में वो कहने लगे कि मैं इतिहास को मच्छर समाज के प्रति अपनी घृणा का बहाना बना रहा हूँ., जबकि मुझे वर्तमान में जीना चाहिए..!!! इतने हंगामें के बाद उन्होंने मेरे ही सर माहौल बिगाड़ने का आरोप भी मढ़ दिया.!!!

मेरे ख़िलाफ़ मेरे कान में घुसकर सारे मच्छर भिन्नाने लगे कि "लेके रहेंगे आज़ादी".!!!
मैं बहस और विवाद में पड़कर परेशान हो गया था., उससे ज़्यादा जितना कि खून चूसे जाने पर हुआ था.!!!

आख़िरकार मुझे तुलसी बाबा याद आये: "सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती...."। और फिर मैंने काला हिट उठाया और मंडली से मार्च तक, बगीचे से नाले तक उनके हर सॉफिस्टिकेटेड और सीक्रेट ठिकाने पर दे मारा.!!! एक बार तेजी से भिन्न-भिन्न हुई और फिर सब शांत.!!

उसके बाद से न कोई बहस न कोई विवाद., न कोई आज़ादी न कोई बर्बादी., न कोई क्रांति न कोई सरोकार.!!! अब सब कुछ ठीक है.!! यही दुनिया की रीत है.!!!

सादर आपका

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लचर अधार, कमजोर दलील

अनंत विजय at हाहाकार 

राष्ट्रवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

स्वयं ही समाया

प्रवीण पाण्डेय at न दैन्यं न पलायनम्

अजब गजब संसार

ई. प्रदीप कुमार साहनी at मेरा काव्य-पिटारा

"अपने आप को जानें और पहचानें"

राजेंद्र कुमार at भूली-बिसरी यादें

सुजी और बेसन के इंस्टंट ढोकले

भारतमाता पर सबका हक़ !

संतोष त्रिवेदी at टेढ़ी उँगली

भूत, पिशाच और राक्षस - देवासुर संग्राम 8

यादों में खोया हुआ हूँ

आशापुरी लेक रिसोर्ट

दर्शन कौर धनोय at मेरे अरमान.. मेरे सपने..

जी मैं आता है यहीं मर जाइए - मास्टर मदन का गायन


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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!! 

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

"ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है।
अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है॥"
-रामधारी सिंह दिनकर
सादर आपका

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क्या लिखें .... क्या लिखें गीत

पिता

ताज्जुब नहीं!

पलाश की दीवानी

यह देश कब जागृत और परिपक्व होगा ?

खतरनाक मिसाल कायम कर रहे हैं पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम

अपशब्द

अमर शहीद पंडित चन्द्र शेखर आज़ाद जी की ८५ वीं पुण्यतिथि

बसंत

अरे क्या साँप सूँघा है सभी को

ऊपर वाले के जैसे ही कुछ अपने अपने नीचे भी बना कर वंदना कर के आते हैं

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

परमार्थ से बड़ा सुख नहीं - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

कल फेसबुक पर विचरण करते समय चचेरे भाई गौरव चतुर्वेदी की वाल पर एक बेहद प्यारी सी लघु कथा पढ़ने को मिली ... सो आज की बुलेटिन मे वही आप सभी के साथ सांझा कर रहा हूँ |

ऑफिस से निकल कर शर्माजी ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया, पत्नी ने कहा था,१ दर्ज़न केले लेते आना। तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी।


वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे, पर आज उन्हें लगा कि क्यों न बुढ़िया से ही खरीद लूँ ? उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, केले कैसे दिए!?" बुढ़िया बोली, "बाबूजी बीस रूपये दर्जन...", शर्माजी बोले, "माई १५ रूपये दूंगा।" बुढ़िया ने कहा, "अट्ठारह रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी।" शर्मा जी बोले, "१५ रूपये लेने हैं तो बोल!!", बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,"न" मे गर्दन हिला दी।


शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर केले का भाव पूछा तो वह बोला "२४ रूपये दर्जन हैं बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ?" शर्माजी बोले, "५ साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, ठीक भाव लगाओ।" तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें" शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, उन्होंने कुछ सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर मोड़ दिया।


सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए। बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली, "बाबूजी केले दे दूँ, पर भाव १८ रूपये से कम नही लगाउंगी। शर्माजी ने मुस्कराकर कहा, "माई एक नही दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।" बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। केले देते हुए बोली... " बाबूजी मेरे पास थैली नही है । वो क्या है न सब कहते है पल्स्टिक की थैली से माहौल गंदा होता है ... सो मैं नहीं रखती ||"


फिर बोली, "एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी। सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर। आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी, आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं। किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।" इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी, और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।


शर्माजी ने ५० रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।" शर्माजी बोले "माई चिंता मत करो, रख लो, अब मै तुमसे ही फल खरीदूंगा, और कल मै तुम्हें ५०० रूपये दूंगा। धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना।" बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए।


घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, "न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर मुंह मांगे पैसे दे आते हैं। शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं।"


अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को ५०० रूपये देते हुए कहा, "माई लौटाने की चिंता मत करना। जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे।" जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया। तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया। बुढ़िया अब बहुत खुश है। उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा है ।


हर दिन शर्माजी और ऑफिस के दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती। शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है..!


जीवन मे किसी बेसहारा की मदद कर के देखो यारों, अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से ज्यादा संतोष मिलेगा...!!

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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पोमपोर की घटना पर कायराना हरकत

जेपी हंस at शब्द क्रांति
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अब आज्ञा दीजिये ... 
जय हिन्द !!!

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

देश की पहली मिसाइल 'पृथ्वी' और ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,

देश में इस समय देशभक्ति, देशद्रोह जैसे मुद्दे हवा में तैर रहे हैं. लोकतंत्र का मंदिर माने जाने वाले संसद पर हमले के आरोपी को शहीद घोषित करके वास्तविक शहीदों का अपमान किया जा रहा है. राजनैतिक परिवारों, पदों से जुड़े लोग ऐसे आरोपी का समर्थन करने वालों के साथ खड़े दिख रहे हैं. क्षुद्र राजनैतिक मंशा के चलते शहीदों को विस्मृत किया जा रहा है; सैनिकों के ज़ज्बात को कम करके आँका जा रहा है; जिस तिरंगे के लिए कई-कई जवानों ने अद्यतन अपनी जान कुर्बान की है, उसी तिरंगे के फहराए जाने के समय की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं. शर्मसार करता है वो दृश्य जबकि एक पूर्व सैन्य अधिकारी को सम्पूर्ण देश ने टीवी चैनल पर सेना के अकेलेपन की स्थिति पर आँसू छलकाते देखा. ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थितियों के बीच भी कुछ-कुछ पल ऐसे आते हैं जो गौरवान्वित करते हैं. हमारे वैज्ञानिकों पर, सेना पर, सैनिकों पर गर्व करने को प्रेरित करते हैं. आज 25 फरवरी ऐसा ही दिन लेकर आया है. 

आज से 28 वर्ष पूर्व 1988 को देश की पहली मिसाइल ‘पृथ्वी’ का पहला सफल परीक्षण किया गया. पृथ्वी भारत की स्वदेशी तकनीक से निर्मित प्रथम बेलिस्टिक मिसाइल है. यह भारत के एकीकृत मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत बनाई गई है. सतह से सतह तक मार करने वाली इस मिसाइल का निर्माण रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन तथा भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के द्वारा किया गया.  4400 किग्रा वजनी, 9 मीटर लम्बी इस मिसाइल की मार 150 किमी की है. यह परमाणु हथियारों समेत 500 किलोग्राम से किलोग्राम से लेकर एक टन तक का भार वहन कर सकती है. पृथ्वी के पहले सफल परीक्षण के बाद इसके कई संस्करणों का सफल परीक्षण किया जा चुका है. इसमें पृथ्वी-1 को थल सेना के अनुरूप, पृथ्वी-2 को वायु सेना के अनुरूप तथा पृथ्वी-3 को जल सेना के अनुरूप डिजाइन किया गया है. पृथ्वी-2 और पृथ्वी-3 की मार क्रमशः 250-350 किमी और 350-600 किमी है. समय के साथ होते परिवर्तनों ने पृथ्वी मिसाइल की मारक क्षमता को बढ़ाया ही है. पृथ्वी-2 भारतीय सेना में 2003 में लाई गई थी जो पहली मिसाइल थी जो रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम की तकनीक के अंतर्गत बनाई गई मिसाइल है. यकीनन युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं किन्तु अपनी सैन्य क्षमता को लगातार समृद्ध, सशक्त करने से एक तरफ जहाँ सेना का, सैनिकों का, देशवासियों का मनोबल बढ़ता है वहीं दूसरी तरफ देश के दुश्मनों के हौसले भी पस्त होते हैं. 

आइये अपने तिरंगे, अपनी सेना, अपने सैनिकों और अपने तमाम आयुधों पर गर्व करते हुए आज की बुलेटिन का आनंद उठायें. 

++++++++++












बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

सचिन 200 नॉट आउट और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।

आज का दिन क्रिकेट जगत के लिए काफी यादगार और ऐतिहासिक दिन है। आज ही के दिन वर्ष 2010 में भारत के महान क्रिकेट खिलाड़ी और बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने ग्वालियर में एकदिवसीय क्रिकेट मैच ( वनडे मैच ) में दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध वनडे क्रिकेट इतिहास का पहला दोहरा शतक ( डबल सेंचुरी ) लगाया था। सचिन तेंदुलकर इसी पारी के साथ ही वनडे क्रिकेट में डबल सेंचुरी लगाने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज बने थे। मास्टर ब्लास्टर ने 147 गेंदों को खेलते हुए 200 रन की नाबाद ( नॉट आउट ) पारी खेली। इस पारी में सचिन ने कुल 25 चौके और 3 छक्के लगाए थे। इस ऐतिहासिक पारी के साथ ही सचिन तेंदुलकर के नाम पर क्रिकेट जगत का एक और रिकॉर्ड जुड़ गया था। भारत ने ये क्रिकेट मैच 153 रनों से जीता था।

इस मैच का संक्षिप्त स्कोर यहाँ देखे :- South Africa tour of India, 2nd ODI: India v South Africa at Gwalior, Feb 24, 2010


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर..........














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे। तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर  … अभिनन्दन।।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

मइया की रोटी की यही थी कहानी !



गालियों के आटे में 
आँसुओं का पानी 
मइया की रोटी की यही थी कहानी  !

बाबा की लाल ऑंखें 
लड़खड़ाते पाँव 
कोने में दुबकी मइया के घाव 
सुबकते थे सपने 
रोता था घर 
सोचता था मन 
क्या यही होता है घर !  ... गालियों के आटे में 
आँसुओं का पानी 
मइया की रोटी की यही थी कहानी  !

 शराब में खो गया 
सुख चैन घर का 
बचपन न जाने कहाँ 
किस कोने खो गया 
रोता था घर 
सोचता था मन 
क्या यही होता है घर !  ... गालियों के आटे में 
आँसुओं का पानी 
मइया की रोटी की यही थी कहानी  !

नहीं होगा ऐसा मेरा घर 
सोचता था मन मेरा सिहर सिहरकर 
पर हाय रे करम 
घूँघट से देखा मैंने लड़खड़ाता हुआ घर 
.... गालियों के आटे में 
आँसुओं का पानी 
मइया की रोटी सी 
यही थी कहानी  !

गाँव हो या शहर, नगर या महानगर, देश या विदेश - यह आम सी स्थिति मिल ही जाती है  ..... 


सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

डरो ... कि डरना जरूरी है ...

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज के परिवेश में विष्णु जी की ये कविता बहुत सार्थक प्रतीत होती है.........
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो
सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था
देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे
सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें
पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो
लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी
डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर!
- विष्णु खरे

एक नज़र आज के बुलेटिन पर









आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

'नीरजा' - एक वास्तविक नायिका की काल्पनिक लघु कथा

“यार एक बात पूछूँ?”
”हम्म्म!!”
”क्या समझूँ इसका मतलब? हाँ या ना?”
”पूछ ले! वैसे मैं जानता हूँ तू क्या पूछना चाहता है, लेकिन तेरी ज़ुबान से सुननना चाहता हूँ!”
”तू मेरा बहुत अच्छा दोस्त है. हमने साथ में कितनी फ़्लाइट उड़ाई है. तुझे ट्रेनिंग के दौरान भी कितने ईनाम मिले. लेकिन देखता हूँ कि जब भी तू इस देश की फ़्लाइट पर होता है, या इधर से गुज़रता है तो बहुत सीरियस हो जाता है.”
”नहीं तो... ऐसा कुछ भी नहीं!”
”बहुत करीब से देखा है तुझे, महसूस कर सकता हूँ!”
”इधर आकर मुझे किसी की याद आ जाती है.”
याद आ जाती है से क्या मतलब? तेरी वो तो है ना तेरे घर पर?”
”मैं जिसकी बात कर रहा हूँ, वो अमेरिकन नहीं है... वो इण्डियन है!”
“पहेलियाँ मत बुझाओ! साफ़ साफ़ बताओ किस्सा क्या है!”
”लगभग तीस साल पहले, इसी हवाई अड्डे पर एक हवाई जहाज आतंकवादियों द्वारा हाइजैक कर लिया गया था.”
”फिर क्या हुआ?”
”उस हवाई जहाज में एक लड़की थी, जिसने चालक दल को आगाह किया और वे कॉकपिट के ऊपर से निकल गये ताकि जहाज को उड़ाकर आतंकवादियों की मनचाही जगह तक नहीं ले जाया जा सके.”
”ये तो ठीक हुआ, लेकिन पैसेंजर्स का क्या हुआ?”
”केबिन क्र्यू की वो सदस्य आतंकवादियों के सामने थी. आतंकवादियों ने उसे सभी पैसेंजर्स के पासपोर्ट ले लेने का हुक़्म दिया.”
”क्यों?”
”वे जानना चाहते थे कि उनमें कितने अमेरिकी यात्री हैं. कुल 41 अमेरिकी थे. उस क्र्यू सदस्य ने सभी के पासपोर्ट लेकर छिपा दिये.”
”.................”
”लगभग सत्रह घण्टे तक अपनी माँग को लेकर बहस करने के बाद उन आतंकवादियों ने अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया.”
”और वो लड़की जिसने अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट छिपा दिये थे?”
”उसने इमरजेंसी दरवाज़ा खोल दिया और यात्रियों को निकालने में मदद करने लगी.”
”जब दरवाज़ा खुला तो वो ख़ुद भी तो निकल सकती थी?”
“नहीं दोस्त! वो सबसे पहले निकल सकती थी, लेकिन अजीब जुनूनी शख्स थी वो. ऐसी भयंकर घटना में 41 में से सिर्फ़ दो अमेरिकी की मौत हुई.”
”फ़्लाइट में बच्चे भी तो रहे होंगे? उनका क्या हुआ?”
”बच्चों को भी उसी ने निकाला.”
”अरे वाह! लेकिन तुम्हें यह सब कैसे पता? वो भी इतनी बारीकी से?”
“उन बचाए गये बच्चों में एक मैं भी था... सात साल का बच्चा.”

”अरे वाह!! तो क्या तुमने कभी उस लड़की से मिलने या कॉण्टैक्ट करने की कोशिश की?”

”वही तो कर रहा हूँ. जब भी इधर आता हूँ, इन रुई के फाहों से उड़ते हुये बादलों में उसे ढूँढने की कोशिश करता हूँ.”

”इश्क़ तो नहीं हो गया उससे!”

”इश्क़ ही तो है. मुझसे 18 साल बड़ी लड़की से इश्क़. माँ है वो मेरी.”

”तू तो सीरियस हो गया यार!”

”बात ही सीरियस है. उसने मुझे दूसरी ज़िन्दगी बख्शी!”

”तो एक बार मिल ले उससे. इण्डियंस तो वैसे भी बड़े प्यारे लोग होते हैं!”

”नहीं मिल सकता, तभी तो बादलों में उसे ढूँढता हूँ. हमें बचाते हुये वो आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गयी. सिर्फ़ 23 साल की उम्र में.”

”हे भगवान!”

”नीरजा नाम था उसका. नीरजा भनोत. मेरे एक इण्डियन दोस्त ने बताया कि उसके नाम का मतलब होता है पानी से पैदा हुई. आज भी इन पानी भरे बादलों को देखता हूँ तो पूछने की तबियत होती है कि मुझे पानी से जन्मी नीरजा से मिला दो जिसने मुझे जन्म तो नहीं दिया, पर ज़िन्दगी दी!”

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यह एक काल्पनिक रचना है और इसका उद्देश्य नीरजा भनोत, अशोक चक्र की शहादत को याद करना और भारतवर्ष की इस बहादुर बेटी को श्रद्धांजलि अर्पित करना है. अभी हाल ही में सितम्बर 1986 की उस घटना पर एक फ़िल्म बनी है, जो मैंने नहीं देखी है. ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से दिये गये इस विषय पर लिखने का यह मेरा स्वतंत्र प्रयास है! आशा है आपको पसन्द आया होगा.

                                - सलिल वर्मा 

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पति पीड़ित लड़की की दास्‍तां भी है 'नीरजा'

फिल्म एक नजर में : नीरजा

कभी नहीं--- कभी नहीं---कभी नहीं

ब्राम्हणवाद

भारंगम में फिल्म वालों के नाटक

क्योंकि....

रांची से बंगाल नाता है पुराना

चन्दा भी तू...और सूरज भी तू...

परिवर्तन...

रहती जहां है आशा ...

लघुव्यंग्य – गारंटी

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शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

बड़ी बी की शर्तें - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
चित्र गूगल से साभार

शहर के सबसे बडे बैंक में एक बार एक बुढिया आई।

उसने मैनेजर से कहा, "मुझे इस बैंक में कुछ रुपये जमा करने हैं।"

मैनेजर ने पूछा, "कितने हैं?"

वृद्धा बोली, "होंगे कोई दस लाख।"

मैनेजर बोला, "वाह क्या बात है, आपके पास तो काफ़ी पैसा है, आप करती क्या हैं?"

वृद्धा बोली, "कुछ खास नहीं, बस शर्तें लगाती हूँ ।"

मैनेजर: शर्त लगा-लगा कर आपने इतना सारा पैसा कमाया है? कमाल है।

वृद्धा: कमाल कुछ नहीं है बेटा, मैं अभी एक लाख रुपये की शर्त लगा सकती हूँ कि तुमने अपने सिर पर विग लगा रखा है।

मैनेजर हँसते हुए बोला, "नहीं माताजी, मैं तो अभी जवान हूँ, और विग नहीं लगाता।"

वृद्धा: तो शर्त क्यों नहीं लगाते?

मैनेजर ने सोचा यह पागल बुढिया फ़िज़ूल में ही एक लाख रुपये गँवाने पर तुली है, तो क्यों न मैं इसका फ़ायदा उठाऊँ। मुझे तो मालूम ही है कि मैं विग नहीं लगाता। मैनेजर एक लाख की शर्त लगाने को तैयार हो गया।

वृद्धा: चूँकि मामला एक लाख रुपये का है, इसलिये मैं कल सुबह ठीक दस बजे अपने वकील के साथ आऊँगी और उसी के सामने शर्त का फ़ैसला होगा।

मैनेजर ने कहा, "ठीक है बात पक्की।"

मैनेजर को रात भर नींद नहीं आई। वह एक लाख रुपये और बुढिया के बारे में सोचता रहा।

अगली सुबह ठीक दस बजे वह बुढिया अपने वकील के साथ मैनेजर के केबिन में पहुँची और पूछा, "क्या आप तैयार हैं?"

मैनेजर: बिलकुल, क्यों नहीं?

वृद्धा: लेकिन चूँकि वकील साहब भी यहाँ मौजूद हैं और बात एक लाख की है इसलिए मैं तसल्ली करना चाहती हूँ कि सचमुच आप विग नहीं लगाते, इसलिए मैं अपने हाथों से आपके बाल नोचकर देखूँगी।

मैनेजर ने पल भर सोचा और हाँ कर दी, आखिर मामला एक लाख का था।

वृद्धा मैनेजर के नजदीक आई और धीर-धीरे आराम से मैनेजर के बाल नोँचने लगी। उसी वक्त अचानक पता नहीं क्या हुआ, वकील साहब अपना माथा दीवार पर ठोंकने लगे।

मैनेजर: अरे.. अरे.. वकील साहब को क्या हुआ?

वृद्धा: कुछ नहीं, इन्हें सदमा लगा है, मैंने इनसे पाँच लाख रुपये की शर्त लगाई थी कि आज सुबह दस बजे मैं शहर से सबसे बडे बैंक के मैनेजर के बाल नोँचकर दिखा दूँगी।

तो साहब ... यह तो हुई बड़ी बी की शर्तों की बात अब चलते है आज की बुलेटिन की ओर ...

सादर आपका
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कैसा है ये लोकतंत्र

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (७)

यमाताराजभानसलगा

मनहूस

तिरंगा, सैनिक हैं सम्मान के हकदार

स्वच्छता अभियान की जय हो

जिन्दगी यूँ ही चलती रहती है (कहानी)

पृथ्वी न्यूज़ पेपर ( हास्य रचना )

*** अस्पृश्य पद्यांश ***

कुछ यादे है...

आग का दरिया है और डूब के जाना है

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

लेखागार