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रविवार, 31 जुलाई 2016

महान रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की १३६ वीं जयंती - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |
वाराणसी शहर से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर लमही गांव में अंग्रेजों के राज में 31 जुलाई 1880 में पैदा हुए मुंशी प्रेमचंद न सिर्फ हिंदी साहित्य के सबसे महान कहानीकार माने जाते हैं, बल्कि देश की आजादी की लड़ाई में भी उन्होंने अपने लेखन से नई जान फूंक दी थी। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था।
 
वाराणसी शहर से दूर १३६ वर्ष पहले कायस्थ, दलित, मुस्लिम और ब्राह्माणों की मिली जुली आबादी वाले इस गांव में पैदा हुए मुंशी प्रेमचंद ने सबसे पहले जब अपने ही एक बुजुर्ग रिश्तेदार के बारे में कुछ लिखा और उस लेखन का उन्होंने गहरा प्रभाव देखा तो तभी उन्होंने निश्चय कर लिया कि वह लेखक बनेंगे। 
 
मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को निश्चय ही एक नया मोड़ दिया और हिंदी में कथा साहित्य को उत्कर्ष पर पहुंचा दिया। प्रेमचंद ने यह सिद्ध कर दिया कि वर्तमान युग में कथा के माध्यम की सबसे अधिक उपयोगिता है। उन्होंने हिंदी की ओजस्विनी वाणी को आगे बढ़ाना अपना प्रथम कर्तव्य समझा, इसलिए उन्होंने नई बौद्धिक जन परंपरा को जन्म दिया।  
 
प्रेमचंद ने जब उर्दू साहित्य छोड़कर हिंदी साहित्य में पदार्पण किया तो उस समय हिंदी भाषा और साहित्य पर बांग्ला साहित्य का प्रभाव छा रहा था। हिंदी को विस्तृत चिंतन भूमि तो मिल गई थी, पर उसका स्वत्व खो रहा था। देश विदेश में उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ रही है तथा आलोचकों के अनुसार उनके साहित्य का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वह अपने साहित्य में ग्रामीण जीवन की तमाम दारुण परिस्थितियों को चित्रित करने के बावजूद मानवीयता की अलख को जगाए रखते हैं। साहित्य समीक्षकों के अनुसार प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में कृषि प्रधान समाज, जाति प्रथा, महाजनी व्यवस्था, रूढि़वाद की जो गहरी समझ देखने को मिलती है, उसका कारण ऐसी बहुत सी परिस्थितियों से प्रेमचंद का स्वयं गुजरना था।
 
प्रेमचंद के जीवन का एक बड़ा हिस्सा घोर निर्धनता में गुजरा था।  प्रेमचंद की कलम में कितनी ताकत है, इसका पता इसी बात से चलता है कि उन्होंने होरी को हीरो बना दिया। होरी ग्रामीण परिवेश का एक हारा हुआ चरित्र है, लेकिन प्रेमचंद की नजरों ने उसके भीतर विलक्षण मानवीय गुणों को खोज लिया।  प्रेमचंद का मानवीय दृष्टिकोण अद्भुत था। वह समाज से विभिन्न चरित्र उठाते थे। मनुष्य ही नहीं पशु तक उनके पात्र होते थे। उन्होंने हीरा मोती में दो बैलों की जोड़ी, आत्माराम में तोते को पात्र बनाया। गोदान की कथाभूमि में गाय तो है ही।  प्रेमचंद ने अपने साहित्य में खोखले यथार्थवाद को प्रश्रय नहीं दिया। प्रेमचंद के खुद के शब्दों में वह आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद के प्रबल समर्थक हैं। उनके साहित्य में मानवीय समाज की तमाम समस्याएं हैं तो उनके समाधान भी हैं। 
 
प्रेमचंद का लेखन ग्रामीण जीवन के प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में इसलिए सामने आता है क्योंकि इन परिस्थितियों से वह स्वयं गुजरे थे। अन्याय, अत्याचार, दमन, शोषण आदि का प्रबल विरोध करते हुए भी वह समन्वय के पक्षपाती थे।  प्रेमचंद अपने साहित्य में संघर्ष की बजाय विचारों के जरिए परिवर्तन की पैरवी करते हैं। उनके दृष्टिकोण में आदमी को विचारों के जरिए संतुष्ट करके उसका हृदय परिवर्तित किया जा सकता है। इस मामले में वह गांधी दर्शन के ज्यादा करीब दिखाई देते हैं। लेखन के अलावा उन्होंने मर्यादा, माधुरी, जागरण और हंस पत्रिकाओं का संपादन भी किया। 
 
प्रेमचंद के शुरूआती उपन्यासों में रूठी रानी, कृष्णा, वरदान, प्रतिज्ञा और सेवासदन शामिल है। कहा जाता है कि सरस्वती के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी से मिली प्रेरणा के कारण उन्होने हिन्दी उपन्यास सेवासदन लिखा था। बाद में उनके उपन्यास प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि और गोदान छपा। गोदान प्रेमचंद का सबसे परिपक्व उपन्यास माना जाता है। उनका अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र अपूर्ण रहा। समीक्षकों के अनुसार प्रेमचंद की सर्जनात्मक प्रतिभा उनकी कहानियों में कहीं बेहतर ढंग से उभरकर सामने आई है।
 
उन्होंने 300 से अधिक कहानियां लिखी। प्रेमचंद की नमक का दरोगा, ईदगाह, पंच परमेश्वर, बड़े भाई साहब, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी और कफन जैसी कहानियां आज विश्व साहित्य का हिस्सा बन चुकी हैं। प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य में आते ही हिंदी की सहज गंभीरता और विशालता को भाव-बाहुल्य और व्यक्ति विलक्षणता से उबारने का दृढ़ संकल्प लिया। जहां तक रीति-काल की मांसल श्रृंगारिता के प्रति विद्रोह करने की बात थी प्रेमचंद अपने युग के साथ थे पर इसके साथ ही साहित्य में शिष्ट और ग्राम्य के नाम पर जो नई दीवार बन रही थी, उस दीवार को ढहाने में ही उन्होंने हिंदी का कल्याण समझा। हिंदी भाषा रंगीन होने के साथ-साथ दुरूह, कृत्रिम और पराई होने लगी थी। चिंतन भी कोमल होने के नाम पर जन अकांक्षाओं से विलग हो चुका था। हिंदी वाणी को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने एक नई बौद्धिक जन परम्परा को जन्म दिया। 

प्रेमचंद की कहानियों का वातावरण बुन्देलखंडी वीरतापूर्ण कहानियों तथा ऐतिहासिक कहानियों को छोड़कर वर्तमान देहात और नगर के निम्न मध्यवर्ग का है। उनकी कहानियों में वातावरण का बहुत ही सजीव और यथार्थ अंकन मिलता है। जितना आत्मविभोर होकर प्रेमचंद ने देहात के पा‌र्श्वचित्र लिए हैं उतना शायद ही दूसरा कोई भी कहानीकार ले सका हो। इस चित्रण में उनके गांव लमही और पूर्वाचल की मिट्टी की महक साफ परिलक्षित होती है। तलवार कहते हैं कि प्रेमचंद की कहानियां सद्गति, दूध का दाम, ठाकुर का कुआं, पूस की रात, गुल्ली डंडा, बड़े भाई साहब आदि सहज ही लोगों के मन मस्तिष्क पर छा जाती हैं और इनका हिंदी साहित्य में जोड़ नहीं है।

ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से होरी को हीरो बनाने वाले रचनाकार मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी १३६ वीं जयंती पर शत शत नमन |

सादर आपका
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रेलवे गार्ड बनना चाहते थे प्रेमंचद

प्रेमचंद और फेसबुक

प्रेमचन्द के नाम शहरी बाबू की पाती

ईदगाह............मुंशी प्रेमचंद

संयोग ऐसे भी होते हैं .

घर वापसी - एक ममतामयी मुलाक़ात

कितने पाकिस्तान

हुतात्मा ऊधमसिंह उर्फ सरदार शेरसिंह

अमर शहीद ऊधम सिंह जी की ७६ वीं पुण्यतिथि 

चाट का स्टाल

जयपुर की सैर ==भाग 7

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

शनिवार, 30 जुलाई 2016

ऑल द बेस्ट - १४००वीं ब्लॉग बुलेटिन

दिल्ली आए हुए एक महीना से बेसी हो गया है. अऊर महानगर के जिन्नगी जइसा हम भी जुट गए हैं, चाहे कहीए जुत गए हैं. नया जगह भी नहीं है, नया ऑफिस भी नहीं है, नया काम भी नहीं है... लेकिन जब एतना साल बीत जाता है, त अपना घरवो अनजान बुझाता है. काहे कि सुबह का भुलायल अदमी को साँझ तक लौट आने का छूट है. हम त चार साल बाद लौटे थे अऊर ई ऑफिस में सात साल बाद. बहुत बदलाव आ गया था. बाकी नहीं बदला था त ऊ रास्ता, जहाँ चारों तरफ हरियाली है, मोर अऊर कोयल का आवाज़ सुनाई देता है, साफ़ सुथरा रोड अऊर खूब सुन्दर बाताबरन.

ऑफिस से निकलकर मेट्रो इस्टेसन तक जाना बहुत सीतल अनुभव होता है. बाकी मेट्रो में पहुँच जाने के बाद बुझाता है कि परधान मंत्री जी का स्वच्छता अभियान एकदम्मे फेल है. एतना गन्दगी कि केतना बार त आँख मूँद लेने का मन करता है. इंसान सुतुरमुर्ग हो गया है अऊर महानगर का इंसान त... आप समझिए सकते हैं. इस्टेसन पर, प्लेटफारम पर, गाड़ी के अंदर... माने कुल मिलाकर स्वच्छता अभियान भी सुसाइड कर ले.
ओफ्फोह... सॉरी... सॉरी!! एगो बात त भुलाइये गए बताना. ई गन्दगी माने चिप्स का खाली पैकेट, गुटखा का पुडिया, कोल्ड-ड्रिंक का खाली डिब्बा, लेमनचूस अऊर चौकलेट का छिलका, सिंघाड़ा (समोसा) का ठोंगा, पानी का बोतल नहीं. ऊ सब पर कंट्रोल है तनी-मनी, लेकिन अदमी पर कोनो कंट्रोल नहीं, खासकर नया जुग का लड़का-लड़की. मॉडर्न होने के नाम पर आपस में बात करते हुए एतना गंदा भासा का परयोग करना कि घर जाकर कान गंगाजल से धोना पड़े. अऊर बेवहार एतना खराब कि सरम को भी सरम आ जाए. अब जो देखने को मिलता है उसको गन्दगी के कैटेगरी में रखें कि अश्लीलता के... बिचार करना होगा. जइसे न्यूड अऊर नेकेड में अंतर होता है, ओइसहीं आधुनिकता अऊर अश्लीलता के बीच भी होता होगा. सायद हमको नहीं बुझाएगा, काहे कि अब त हमरे लिये बरिस्ठ नागरिक वाला सीट भी छोडकर उठ जाता है लोग-बाग.

मगर ऊ का कहते हैं कि गन्दगी देखने वाला के आँख में होता है (कहावत त सुंदरता के लिये है) त हम काहे अपना आँख गंदा करें. ई सब गन्दगी हमरे आँख से परे का चीज है, एही से नहीं देखाई देता है.

अब ओही रोज हम कोई काम से तीस हजारी गए थे. लौटते समय कश्मीरी गेट से राजीव चौक आना था. एगो लड़की हमरे साथ-साथ एस्केलेटर पर चल रही थी. कुछ देर बाद लापता. जब हम मेट्रो में दाखिल हुए तब ओही बचिया फिर से हमरे बगल में आकर खड़ी हो गयी. एकदम उसका कद, नाक नक्सा अऊर बोली हमरी झूमा जइसा था. जैसहीं मेट्रो चलने लगा, ऊ तुरत अपना मोबाइल निकाली अऊर फोन पर चालू हो गयी. मगर जब कान में आवाज गया त सुने कि ऊ बोली, “भैया! हुडा सिटी सेण्टर पर उतरना है न? उसके बाद रिक्शा ले लूँगी!” मन में तनी इत्मिनान हुआ कि ओही सब फालतू बात नहीं सुनाई देगा. बाद में जो बात सुनाई दिया उसमें पहिला बाक्य एही था कि भैया आप मुझसे कुछ सवाल पूछिए ना? पता नहीं वो लोग क्या पूछेंगे.

फिर बातचीत में ब्लड प्रेशर, हेमोग्लोबिन, प्लैटेलेट्स, ब्लड शुगर के बारे में बहुत सा बात फोन पर हुआ. हमरा दिमाग पजल का टुकड़ा जोडने में लगा हुआ था. लडकी कोनो पैरा- मेडिकल सर्विस के लिये इंटरभ्यू देने जा रही थी. बीच में सैलरी के बारे में भी कुछ पूछी, लेकिन उधर का जवाब हमको सुनाई नहीं दिया. हमको भी लगा कि हमरी बेटी एतना बड़ा हो गयी है.

खैर, हमरा इस्टेसन त जल्दिये आने वाला था. उतरने के पहले हम ऊ लड़की के माथा पर हाथ रखे त ऊ चौंक कर हमरे तरफ देखी. उसके आँख में सवाल था अऊर हमरे आँख में चमक. हम बोले, “ऑल द वेरी बेस्ट!”
उसके आँख का का सवाल चमक में बदल गया अऊर चेहरा का तनाव कान से लेकर कान तक के मुस्कराहट में गायब हो गया.
“थैंक्स, अंकल!”
अऊर तब तक हमरे पीछे का भीड़ हमको धकियाकर प्लेटफारम पर पटक दिया.

समय के नदी में का पता किधर से कउन सा बूँद भिगाकर चला जाता है. हमरा त एही जोगदान रहा परधान मंत्री जी के स्वच्छता अभियान में. अऊर अपना एगो हाल में लिखा हुआ नज्म याद आ गया

वक्त से टूटा 
कोई लावारिस सा लम्हा
डर के मारे
सड़क किनारे सुबक रहा था
उसकी उंगली थामी
प्यार से चूमा उसको
जब वो प्यार से पलट के 
मेरे गले लग गया
मैंने समझा मेरी नज़्म मुकम्मल हो गयी
और सूना सा दिन
कोई गुलज़ार कर गया!!

जिन्नगी जीने का सबसे मजेदार फंडा एही है कि एगो बड़ा सा खुसी का इंतज़ार करने से अच्छा, छोटा-छोटा खुसी को जिया जाए. अब अगर एही छोटा-छोटा ब्लॉग-बुलेटिन हमलोज एन्जॉय नहीं करते, त आज कइसे ई १४००वाँ ब्लॉग बुलेटिन आपके सामने होता!


शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

सम्मान खोते उच्च न्यायालय

जिला न्यायालय अभियुक्त को दोषी ठहराता है, उच्च न्यायालय बरी कर देता है और फिर अंत में सर्वोच्च न्यायालय दोषी ठहरा कर उच्च न्यायालय को साक्ष्यों को न देखने के लिए फटकार लगा देता है। सलमान खान के दोनों मामले देखिये, ऐसे ही कई और मामले हैं जहाँ उच्च न्यायालय सिर्फ खानापूर्ति करने के लिए हैं और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। उन्हें मालूम है कि कोई भी फैसला दें, मामला ऊपरी अदालत में ही हल होना है सो क्या देखें, क्या सुनें और क्या ही बोलें सो बस काम ख़त्म किया जाए। मेरे विचार से इस मामले में भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है और इसकी सीबीआई जांच होना चाहिए। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और वकील और खुद सलमान खान के खिलाफ लाई डिटेक्टर टेस्ट कराया जाना चाहिए था, वैसे कुछ होगा नहीं क्योंकि भ्रष्ट हो चुकी न्यायपालिका के इस अंग में भयंकर कोढ़ फ़ैल गया है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है?
अपने यहाँ की न्याय प्रणाली को ओवरहालिंग की ज़रूरत है, जजों की नियुक्ति की पुरानी और बेकार हो चुकी अंग्रेजों की प्रणाली को निकालकर एक बेहतर प्रणाली की ज़रूरत है। समस्या यह है कि भ्रष्ट हो चुके न्यायतंत्र में इस बदलाव की वकालत करने वाले बहुत कम लोग हैं और न्यायप्रणाली भी स्वयं को बदलना नहीं चाहती।
मित्रों वकालती पढ़ने वाले कितने व्यक्ति वाकई में वकालत को अपना कैरियर बनाना चाहते हैं? टीचरी के बाद यह दूसरा ऐसा पेशा है जिसे लोग मजबूरी में चुनते हैं। टीचरी लाइन में वह जाते हैं जो कहीं किसी और क्षेत्र में जा नहीं पाते और टीचरी लाइन में जाकर अपनी कुंठा बच्चो में धकेलते रहते हैं। ठीक वैसे ही वकालती लाइन भी है जिसमे बड़ी संख्या में लोग कुछ और नहीं कर पा सकने के कारण मजबूरी में इस लाइन में आ जाता है और फिर धीरे धीरे थोड़ा बहुत सीखकर इसी भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन जाता है।
वकालती लाइन में ज़बरदस्त धांधलेबाजी है, घूसखोरी है, चोरी और मक्कारी है। दिक्कत यह है कि इसकी कोई खुलकर निंदा नहीं करता, सब डिप्लोमैटिक उत्तर देकर निकल लेते हैं... न्यायालय का सम्मान करने जैसी भाषा अजीब लगती है कभी कभी, उसपर भी उच्च न्यायालय का तो कहना ही क्या है?
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एक चिंकारे की आत्महत्या

बेटियों के लिए जागना होगा

यह राज ज़माने से छुपाती चली गई

खामोश हो गयी शोषित. वंचित समाज के हित में उठनेवाली आवाज

सम्‍मान और गौरव से सात हाथ की दूरी..

गढवाल में बाइक यात्रा

पापा का ८० वां जन्मदिन

लाडली १ 

मौसम की मार , डेंगू बुखार :

मेरी आस यही अरदास यही

Goodbye VCR - अलविदा वीसीआर

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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

श्रद्धांजलि हजार चौरासी की माँ को - ब्लॉग बुलेटिन

प्रसिद्द बांग्ला साहित्यकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी का आज २८ जुलाई २०१६ को ९० वर्ष की आयु में निधन हो गया.


महाश्वेता जी का जन्म १४ जनवरी १९२६ को अविभाजित भारत के ढाका में हुआ था. आपके पिता मनीष घटक कवि और उपन्यासकार थे तथा आपकी माता धारित्री देवी भी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं. अपने माता-पिता के व्यापक प्रभावस्वरूप उन्होंने स्वयं को पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया. भारत विभाजन के पश्चात् उनका परिवार पश्चिम बंगाल आ गया. कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने शिक्षक और पत्रकार के रूप में अपना जीवन शुरू किया. इसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय में अंग्रेजी व्याख्याता के रूप में नौकरी की.

महाश्वेता जी ने कम उम्र में लेखन शुरू कर दिया था. झाँसी की रानी उनकी प्रथम रचना है जिसका प्रकाशन १९५६ में हुआ. उनका कहना था कि "इसको लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।" इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं बल्कि इतिहास के मंच पर सागर, जबलपुर, पूना, इंदौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी ग्वालियर, कालपी में १८७५-५८ के दौरान घटित तमाम घटनाओं के साथ तादात्म्य बैठाते हुए लिखा. उनके लेखन की मूल विधा कविता थी जो बाद में कहानी और उपन्यास में परिवर्तित हुई. उनकी कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और 'हजार चौरासी की माँ' अत्यंत प्रसिद्द हैं. आपकी छोटी-छोटी कहानियों के बीस संग्रह प्रकाशित किये जा चुके हैं और लगभग सौ उपन्यास (सभी बंगला भाषा में) प्रकाशित हो चुके हैं. आपने बांग्ला भाषा में अत्यंत संवेदनशील और वैचारिक लेखन के द्वारा साहित्य को समृद्ध बनाया. वे लेखन के साथ-साथ समाजसेवा में भी लगातार सक्रिय रहीं. स्त्रियों, दलितों तथा आदिवासियों के हितों के लिए उन्होंने व्यवस्था से संघर्ष किया. 'संघर्ष' (१९६८), 'रूदाली' (१९९३), 'हजार चौरासी की माँ' (१९९८) और 'माटी माई' (२००६) उनकी कृतियों पर बनी कुछ फिल्में हैं.

१९७७ में महाश्वेता देवी को 'मैगसेसे पुरस्कार' प्रदान किया गया. उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए १९७९ में उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' तथा १९९६ में 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित किया गया. १९८६ में 'पद्मश्री' तथा २००६ में उन्हें 'पद्मविभूषण' से अलंकृत किया गया.

ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से महाश्वेता देवी जी को विनम्र श्रद्धांजलि के साथ उनकी सक्रियता को समर्पित आज की बुलेटिन.

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बुधवार, 27 जुलाई 2016

डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम जी की प्रथम पुण्यतिथि और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
अबुल पाकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम अथवाडॉक्टर ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम (15 अक्टूबर 1931 -27 जुलाई 2015) जिन्हें मिसाइल मैन और जनता के राष्ट्रपति के नाम से जाना जाता है, भारतीय गणतंत्र के ग्यारहवें निर्वाचित राष्ट्रपति थे। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति, जानेमाने वैज्ञानिक और अभियंता के रूप में विख्यात थे।

इन्होंने मुख्य रूप से एक वैज्ञानिक और विज्ञान के व्यवस्थापक के रूप में चार दशकों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) संभाला व भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल के विकास के प्रयासों में भी शामिल रहे। इन्हें बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास के कार्यों के लिए भारत में मिसाइल मैन के रूप में जाना जाने लगा।

इन्होंने 1974 में भारत द्वारा पहले मूल परमाणु परीक्षण के बाद से दूसरी बार 1998 में भारत के पोखरान-द्वितीय परमाणु परीक्षण में एक निर्णायक, संगठनात्मक, तकनीकी और राजनैतिक भूमिका निभाई।

कलाम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों के समर्थन के साथ 2002 में भारत के राष्ट्रपति चुने गए। पांच वर्ष की अवधि की सेवा के बाद, वह शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक सेवा के अपने नागरिक जीवन में लौट आए। इन्होंने भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त किये।

27 जुलाई 2015 की शाम अब्दुल कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग में 'रहने योग्य ग्रह' (Livable Planet) पर एक व्याख्यान दे रहे थे जब उन्हें जोरदार कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) हुआ और ये बेहोश हो कर गिर पड़े। लगभग 6:30 बजे गंभीर हालत में इन्हें बेथानी अस्पताल में आईसीयू में ले जाया गया और दो घंटे के बाद इनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी गई। अस्पताल के सीईओ जॉन साइलो ने बताया कि जब कलाम को अस्पताल लाया गया तब उनकी नब्ज और ब्लड प्रेशर साथ छोड़ चुके थे। अपने निधन से लगभग 9 घण्टे पहले ही उन्होंने ट्वीट करके बताया था कि वह शिलोंग आईआईएम में लेक्चर के लिए जा रहे हैं।


भारत के महान प्रणेता डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम जी की प्रथम पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...













आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। जय हिन्द...जय भारत।।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सैनिकों के सम्मान में विजय दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ अर्थात या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा. गीता के इस श्लोक से प्रेरित होकर देश के शूरवीरों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को खदेड़ कर सीमापार कर दिया था. आज से 17 वर्ष पहले भारतीय सेना ने कारगिल पहाड़ियों पर कब्ज़ा जमाए पाकिस्तानी सैनिकों को मार भगाया था. इस विजय की याद में और शहीद जांबाजों को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 26 जुलाई को कारगिल दिवस के रूप में मनाया जाता है. भारतीय सेना के विभिन्न रैंकों के लगभग 30000 अधिकारियों और जवानों ने ऑपरेशन विजय में भाग लिया. इस युद्ध में भारतीय आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 527 जांबाज़ शहीद हुए और 1363 घायल हुए.


एक तरह हम विजय दिवस मना रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे सैनिक एक आतंकी की मौत पर अलगाववादियों के पत्थरों का शिकार हो रहे हैं. आखिर ऐसा विरोधाभास क्यों? यहाँ इस तथ्य का स्मरण करना होगा कि विगत कुछ वर्षों से भारतीय सेना के कार्यों-दायित्वों में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है. अब नागरिक प्रशासन में भी उनकी भूमिका अहम् होती जा रही है. देश में किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा आने पर सेना को याद किया जाता है. दंगों की स्थिति, वर्ग-संघर्ष, धरना प्रदर्शन, बच्चों के बोरवेल में गिरने की घटनाएँ या फिर निर्वाचन, सभी में स्थानीय प्रशासन के स्थान पर सेना की भूमिका को सराहनीय, विश्वसनीय माना जाने लगा है. आज ये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि अपनी जान पर खेलकर देश के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले सैनिकों के लिए हम किस तरह का माहौल बना रहे हैं? सैनिकों को यदि पर्याप्त सम्मान न मिले, अधिकार होने के बाद भी अधिकारों का उपयोग करने की आज़ादी न मिले, सशक्त होने के बाद भी भीड़ से पत्थरों की मार सहनी पड़े, कर्तव्य की राह में मानवाधिकार आकर धमकाए तो ये खतरे का सूचक है. ये बिन्दु कहीं न कहीं सैनिकों के, सेना के मनोबल को कम करते हैं, उनमें अलगाव की भावना को जन्म देते हैं.

सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ-साथ आम नागरिकों का प्रयास हो कि सेना का मनोबल कम न होने पाए. सत्ता प्रतिष्ठानों को सेना सम्बन्धी मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए. समय-समय पर सेना के सामने आती असहज स्थितियों पर उनके साथ खड़े होने का एहसास कराना चाहिए. इससे सेना का मनोबल बढ़ेगा. इसी तरह आम नागरिकों को भी अपने स्तर पर सेना का, सैनिकों का सम्मान करने की भावना को विकसित करना चाहिए. हमारे जवानों द्वारा किये गए वलिदानों को, उनकी जांबाजी को न केवल याद किया जाये वरन उसे समाज में प्रचारित-प्रसारित किया जाये. निस्वार्थ भाव से देश के लिए कार्य कर रहे सैनिकों के लिए हम सभी को जागना होगा. कारगिल विजय दिवस के सहारे ही हमें उन सभी सैनिकों का स्मरण करना होगा जो हमारी रक्षा के लिए अपनी जान को जोखिम में डालते हैं. देश की एकता, अखंडता, स्वतंत्रता के लिए और नागरिकों के सुखमय जीवनयापन करने, सुरक्षित रहने के लिए ऐसा करना अनिवार्य भी है.

अपने जांबाज़ सैनिकों को याद करते हुए विजय दिवस को समर्पित आज की बुलेटिन. 
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सोमवार, 25 जुलाई 2016

आचार्य परशुराम चतुर्वेदी और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ( Parshuram Chaturvedi ) जन्म: 25 जुलाई, 1894 - मृत्यु: 3 जनवरी, 1979  परिश्रमशील विद्वान शोधकर्मी समीक्षक थे। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया में हुआ। इनकी शिक्षा इलाहाबादतथा वाराणसी विश्वविद्यालय में हुई। वे पेशे से वकील थे, किंतु आध्यात्मिक साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। संस्कृततथा हिन्दी की अनेक उपभाषाओं के वे पंडित थे।

परशुराम चतुर्वेदी का व्यक्तित्व सहज था। वे सरल स्वभाव के थे। स्नेह और सौहार्द के प्रतिमूर्ति थे। इकहरा शरीर, गौरवर्ण, मध्यम कद काठी और सघन सफेद मूंछें उनके बड़प्पन को प्रकाशित करने के लिये पर्याप्त थीं। उनके मुख मंडल पर परंपरागत साहित्य की कोई विकृति की रेखा नहीं देखी गयी बल्कि एक निश्चित दीप्ति सदा थिरकती रही जिससे बंधुता एवं मैत्री भाव विकीर्ण होता रहता था। चतुर्वदी जी महान अन्नवेषक थे। मनुष्य की चिंतन परंपरा की खोज में उन्होंने संत साहित्य का गहन अध्ययन किया। वे मुक्त चिंतन के समर्थक थे इसलिये किसी सम्प्रदाय या झंडे के नीचे बंधकर रहना पसंद नहीं किया। साहित्य में विकासवादी सिद्धांत के पक्षधर थे। उनकी विद्वता के आगे बड़े-बड़ों को हमेशा झुकते देखा गया। उनका जीवन मानवता के कल्याण के प्रति समर्पित था।

बहुत कम लोग जानते हैं कि कबीर को जाहिलों की कोह में से निकाल कर विद्वानों की पांत में बैठाने का काम आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने ही किया था। कबीर के काव्य रूपों,पदावली, साखी और रमैनी का जो ब्यौरा, विस्तार और विश्लेषण आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने परोसा है, और ढूंढ ढूंढ कर परोसा है, वह आसान नहीं था। फिर बाद में आचार्यहजारी प्रसाद द्विवेदी सरीखों ने कबीर को जो प्रतिष्ठा दिलाई, कबीर को कबीर बनाया, वह आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के किए का ही सुफल और विस्तार था, कुछ और नहीं। दादू, दुखहरन, धरनीदास, भीखराम, टेराम, पलटू जैसे तमाम विलुप्त हो चुके संत कवियों को उन्होंने जाने कहां-कहां से खोजा, निकाला और उन्हें प्रतिष्ठापित किया। संत साहित्य के पुरोधा जैसे विशेषण उन्हें यूं ही नहीं दिया जाता। मीरा पर भी आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने जो काम किये वे अविरल हैं। गांव-गांव, मंदिर-मंदिर जो घूमे, यहां तक कि मीरा के परिवारके महाराजा अनूप सिंह से भी मिले तो यह आसान नहीं था। कुछ लोग तो उन्हें गड़े मुर्दे उखाड़ने वाला बताने लगे थे पर जब उन की किताबें छप-छप कर डंका बजा गईं तो यह ‘गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले’ की जबान पर ताले लग गए। उत्तरी भारतकी संत साहित्य की परख, संत साहित्य के प्रेरणा स्रोत, हिंदी काव्य धारा में प्रेम प्रवाह, मध्य कालीन प्रेम साधना, सूफी काव्य संग्रह, मध्य कालीन श्रृंगारिक प्रवृत्तियां, बौद्ध साहित्य की सांस्कृतिक झलक, दादू दयाल ग्रंथावली, मीराबाई की पदावली, संक्षिप्त राम चरित मानस और कबीर साहित्य की परख जैसी उन की किताबों की फेहरिस्त बहुत लंबी नहीं तो छोटी भी नहीं है। ‘शांत रस एक विवेचन’ में शांत रस का जो छोटा-छोटा ब्यौरा वह परोसते हैं, वह दुर्लभ है। अजीब संयोग है कि बलिया में गंगा के किनारे के गांव में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जन्मे और दूसरे किनारे के गांव जवहीं में आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जन्मे। दोनों ही प्रकांड पंडित हुए। पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रसिद्धि का शिखर छू गए। और आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने विद्वता का शिखर छुआ। पर प्रसिद्धि जितनी उन्हें मिलनी चाहिए थी उतनी नहीं मिली। तो यह हिंदी वालों का ही दुर्भाग्य है, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी का नहीं।

[ जानकारी स्त्रोत - http://bharatdiscovery.org/india/परशुराम_चतुर्वेदी ]


आज स्वर्गीय आचार्य परशुराम चतुर्वेदी जी की 122वीं जयंती पर हिन्दी ब्लॉग जगत और ब्लॉग बुलेटिन टीम उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।

अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...














आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 24 जुलाई 2016

डिग्री का अटेस्टेशन - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक बार मैनपुरी दौरे के दौरान, एक छात्र ने मुलायम सिंह जी से शिकायत की : "सर जी, आप ने मैनपुरी को कटौती रहित बिजली सप्लाई के आदेश करवाए हुये हैं फिर भी बिजली नहीं आती ... हम लोगों की पढ़ाई नहीं हो पाती ... कुछ जुगाड़ हो जाती तो ..."

मुलायम सिंह जी : "हम नितीश कुमार जी से कह के कुछ इंतजाम करवाते हैं।"

छात्र: "बिजली का?"

मुलायम सिंह जी : "नहीं, तुम्हारी डिग्री का।"

छात्र: "वो तो ठीक है पर डिग्री केजरीवाल जी से अटेस्ट जरूर करवा देना, बाद में कोई लफड़ा नहीं चाहिए मुझे ... जैसा स्मृति जी या मोदी जी के साथ हुआ !!"

(कृपया लतीफ़े को लतीफ़ा समझ कर ही आनंद लें ... राजनीतिक भावनाओं के आहात होने की स्थिति में आप स्वंय जिम्मेदार होंगे !!)

सादर आपका

शनिवार, 23 जुलाई 2016

रामायण की दो कथाएं..

आज रामायण के पाठ के समय अरण्य काण्ड के दो कथाएं पढ़ी, आइये आप भी राम भक्ति का लाभ लीजिये।
एक बार इंद्र का पुत्र जयंत, भगवान श्री राम के बल की थाह लेने और सीता के रूप पर मोहित होकर एक काग का रूप धारण कर उसके निकट गया।

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥

सीता के पैर पर जब उस काग ने अपनी चोंच से प्रहार किया तब सीता माता के कष्ट के दंडस्वरूप भगवान श्रीराम ने एक सरकंडे को अभिमंत्रित करके उस काग पर छोड़ दिया। तीनों लोको के प्रभु श्रीराम की की प्रभुता को न मानने वाले जयंत को रामबाण से बचने और कहीं भी छिपने की जगह न मिली, अब भला रामद्रोह करने वाले को जगह कौन देता।

काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना

रामद्रोही के लिए काकभुशुण्डि कहते हैं कि उसके लिए माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।
अंत में कोई उपाय न जानकर नारद की मंत्रणा पर जयंत ने भगवान श्रीराम के चरणों में आत्म समर्पण कर दिया। अब ब्रह्मास्त्र के मंत्रों से अभिमंत्रित राम द्वारा छोड़ी कुशा व्यर्थ नहीं जा सकती थी, अत: उसने कौए की दाहिनी आँख फोड़ दी, किंतु उसके प्राण बच गए।

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मुनि सुतीक्ष्ण से मिलने के पश्चात जब राम पंचवटी में निवास कर रहे थे तब एक बार लक्ष्मण भगवान राम के पास एक शंका लेकर आये। उनकी शंका पशु और मनुष्य के भेद और भक्ति के सम्बन्ध में थी। भगवान राम ने लक्ष्मण की शंका समाधान करते हुए कहा... 

ज्ञान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥

भावार्थ : ज्ञान वह है, जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी (दोष) नहीं है और जो सबसे समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात! उसी को परम वैराग्यवान्‌ कहना चाहिए, जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो॥4॥

गीता इसी की व्याख्या करते हुए कहती है, जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्य सेवा का अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मन का निगृहीत न होना, इंद्रियों के विषय में आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिमय जगत्‌ में सुख-बुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदि में आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में हर्ष-शोक, भक्ति का अभाव, एकान्त में मन न लगना, विषयी मनुष्यों के संग में प्रेम- ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म (आत्मा) में स्थिति तथा तत्त्व ज्ञान के अर्थ (तत्त्वज्ञान के द्वारा जानने योग्य) परमात्मा का नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है।

ज्ञान और भक्ति दो अलग अलग तत्व हैं लेकिन यदि ध्यान से देखे तो जिसे भक्ति का ज्ञान है वह श्रेष्ठ है, जिसे ज्ञान पर मान अभिमान है वह भक्ति से उतना ही दूर है। 

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23 जुलाई लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक

कर दी अंग्रेजी की हिन्दी

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - १

संवेदना-लघुकथा

आदमी

और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला...महाकवि हरिवंश राय बच्चन

जालौन की पहली महिला क्रांतिकारी : ताईबाई - (1000वीं पोस्ट)

काले हीरे की खान झरिया की व्यथा कथा

सारे नंगे लिख रहे होते हैं कपड़े जहाँ वहाँ चिंता की बात नहीं होती है नंगा हो जाना / बस हर तरफ कपड़े कपड़े हो जाने का इंतजार होना जरूरी होता है

सुरा-शक्ति

२३ जुलाई का दिन भारत की ३ महान विभूतियों के नाम है 

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शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

२२ जुलाई - राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

 
भारत के राष्ट्रीय ध्वज जिसे तिरंगा भी कहते हैं, तीन रंग की क्षैतिज पट्टियों के बीच नीले रंग के एक चक्र द्वारा सुशोभित ध्वज है। इसकी अभिकल्पना पिंगली वैंकैया ने की थी। इसे १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व २२ जुलाई, १९४७ को आयोजित भारतीय संविधान-सभा की बैठक में अपनाया गया था। इसमें तीन समान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियाँ हैं , जिनमें सबसे ऊपर केसरिया, बीच में श्वेत ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी है। ध्वज की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात २:३ है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है जिसमें २४ अरे होते हैं। इस चक्र का व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है व रूप सम्राट अशोक की राजधानी सारनाथ में स्थित स्तंभ के शेर के शीर्षफलक के चक्र में दिखने वाले की तरह होता है।
सरकारी झंडा निर्दिष्टीकरण के अनुसार झंडा खादी में ही बनना चाहिए। यह एक विशेष प्रकार से हाथ से काते गए कपड़े से बनता है जो महात्मा गांधी द्वारा लोकप्रिय बनाया था। इन सभी विशिष्टताओं को व्यापक रूप से भारत में सम्मान दिया जाता हैं भारतीय ध्वज संहिता के द्वारा इसके प्रदर्शन और प्रयोग पर विशेष नियंत्रण है।
 
पूरा आलेख पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ ... राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस - २२ जुलाई
 
सादर आपका
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Politics: महिलाओं के लिए बदजुबानी में कौन कम है भला

जिन्दगी

कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास

चाह

भाजपा का आत्मघाती रवैया..

बहुत मुँहफट है, बहनजी

दलित-स्त्री विमर्श का स्वर्णकाल!

मोरचा सम्भाले...

कांशीराम ने तब नरेंद्र मोहन की बेटी मांगी थी , अब इन को दयाशंकर सिंह की बेटी बहन दोनों चाहिए

जिंदगी मुबारक !

"वो कमरा बात करता था ..."

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

क्या सही, क्या गलत - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय मित्रो,

एक महाशय ने एक मोहतरमा को कुछ अपशब्द कहे और देशव्यापी बवाल मच गया. इसके पक्ष-विपक्ष बन गए हैं. इसको सही-गलत ठहराया जाने लगा है. समझ नहीं आता कि सही-गलत की परिभाषा क्या है, क्या होनी चाहिए? असमंजस उस समय और बढ़ जाता है जबकि ये दो उदाहरण याद कर लिए जाते हैं. 


समाज में उस संतान को श्रेष्ठ समझा जाता है जो अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करती है. ऐसा न करने वाली संतान को सम्मान नहीं मिलता है. भारतीय संस्कृति में दो उदाहरण ऐसे हुए हैं जो सही-गलत को काल, परिस्थितियों के सापेक्ष निर्धारित करने का मार्ग दिखाते हैं.

भगवान राम को समाज श्रेष्ट पुत्र, सपूत कहता है क्योंकि वे अपने पिता की आज्ञा मानते हुए वन को गए. इसके उलट इसी संस्कृति में एक पुत्र ऐसा हुआ है जिसने अपने पिता की किसी आज्ञा का पालन नहीं किया, इसके बाद भी वो श्रेष्ठ माना जाता है, पूज्य है, सम्मानित है. ऐसा पुत्र है प्रह्लाद, जिसने अपने पिता हिरणाकश्यप की किसी भी आज्ञा का पालन नहीं किया फिर भी सपूत है.

किसी भी घटना के, किसी भी स्थिति के पक्ष-विपक्ष में एकदम से राय देने वालों की आँख खोलने को उक्त दो उदाहरण संभवतः पर्याप्त होंगे. उक्त दो उदाहरणों के आलोक में आज की बुलेटिन के सही-गलत का फैसला आपके हाथ. लीजिये पढ़िए और आनंद लीजिये.

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चित्र गूगल छवियों से साभार 

लेखागार