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सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

नमन भूगोल रचने वाले व्यक्तित्वों को - ब्लॉग बुलेटिन

आज लौह पुरुष के रूप में विख्यात सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्मदिवस है. उनका जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था. वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री रहे. उनको सरदार पटेल के उपनाम से भी जाना जाता है. देश की आज़ादी के बाद वे उप प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे थे. उन्होंने अपनी कूटनीति से बिना किसी सैन्य हस्तक्षेप के देश की सबसे बड़ी समस्या को निपटाते हुए क़रीब पाँच सौ से अधिक देशी रियासतों का विलय देश में करवाया. इसी उपलब्धि के चलते उन्हें लौह पुरुष या भारत का बिस्मार्क की उपाधि से सम्मानित किया गया. सन 1991 में उनको मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया. उनका देहावसान 15 दिसंबर 1950 को हुआ. सरदार पटेल को श्रद्धांजलि स्वरूप उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है.

आज देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि है. आज ही के दिन 31 अक्टूबर 1984 को उनके अंगरक्षकों द्वारा गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी. उनका जन्म 19 नवम्बर 1917 को इलाहाबाद में हुआ था. वे न केवल भारतीय राजनीति पर बल्कि वैश्विक राजनीति पर भी प्रभाव छोड़ने में सफल रहीं. इंदिरा गाँधी को आज भी उनकी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए जाना जाता है. देश के द्वितीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री के देहांत के पश्चात् 1966 में इंदिरा गाँधी देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनी. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय बांग्लादेश निर्माण के लिए उनकी भूमिका को जितना सराहा जाता है, उतना ही 1975 में उनके द्वारा देश में लगाये गए आपातकाल के कारण उनकी निंदा भी की जाती है. बावजूद इसके उनकी क्षमताओं को देखते हुए उन्हें लौह महिला के नाम से भी संबोधित किया जाता है. उनको 1971 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

देश के दो ऐसे व्यक्तित्वों को जिन्होंने इतिहास रचने के साथ-साथ भूगोल भी रचा, बुलेटिन परिवार की तरफ से श्रद्धांजलि.

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रविवार, 30 अक्तूबर 2016

ब्लॉग बुलेटिन का दिवाली विशेषांक

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज दिवाली है ... ब्लॉग बुलेटिन टीम और मेरी ओर से आप सभी पाठकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं |

एक दिया ऐसा भी हो , जो
भीतर तलक प्रकाश करे ,
एक दिया मुर्दा जीवन में ,
फिर आकर कुछ श्वास भरे |
एक दिया सादा हो इतना ,
जैसे साधु का जीवन ,
एक दिया इतना सुन्दर हो ,
जैसे देवों का उपवन |
एक दिया जो भेद मिटाए ,
क्या तेरा क्या मेरा है ,
एक दिया जो याद दिलाये ,
हर रात के बाद सवेरा है |
एक दिया उनकी खातिर हो ,
जिनके घर में दिया नहीं ,
एक दिया उन बेचारों का ,
जिनको घर ही दिया नहीं |
एक दिया सीमा के रक्षक ,
अपने वीर जवानों का ,
एक दिया मानवता-रक्षक ,
चंद बचे इंसानों का |
एक दिया विश्वास दे उनको ,
जिनकी हिम्मत टूट गयी ,
एक दिया उस राह में भी हो ,
जो कल पीछे छूट गयी |
एक दिया जो अंधकार का ,
जड़ के साथ विनाश करे ,
एक दिया ऐसा भी हो , जो
भीतर तलक प्रकाश करे || 

सादर आपका

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http://kamleshkumardiwan.blogspot.com/2016/10/2016.html

http://anvarat.blogspot.in/2016/10/blog-post.html

http://yehmerajahaan.blogspot.com/2016/10/blog-post.html

http://udayaveersingh.blogspot.com/2016/10/blog-post_57.html

http://amritatanmay.blogspot.com/2016/10/blog-post_30.html

http://chikotii.blogspot.com/2016/10/blog-post_30.html

http://rooparoop.blogspot.com/2016/10/blog-post_30.html

http://feedproxy.google.com/~r/udantashtari/~3/7H06hwhPmBE/blog-post_29.html

http://www.chalte-chalte.com/2016/10/blog-post_30.html

http://www.jakhira.com/2016/10/nai-hui-fir-rasm-purani.html?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Jakhira+%28Jakhira%29

डा. होमी जहांगीर भाभा की १०७ वीं जयंती
यहाँ दिये हर एक चित्र में एक ब्लॉग पोस्ट का लिंक छिपा है ... चित्र को क्लिक करते ही वो ब्लॉग पोस्ट खुलेगी ... पर यह जरूरी नहीं कि पोस्ट दिवाली पर ही लिखी गई हो |

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फौजी भाइयों के नाम एक संदेश 


बाहरी या आतंरिक शत्रु से देश की सुरक्षा के लिए तैनात हर एक सुरक्षा बल के जवानों और उनके परिवारों को मेरी और मेरे परिवार की ओर से दिवाली की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएं।

आप सब अपनी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति वफ़ादार और मुस्तैद रहते हैं तभी हम सब नागरिक बेख़ौफ़ जी पाते है। आपके व आपके परिवार द्वारा राष्ट्र हित किए गए इन बलिदानों को मैं नमन करता हूँ।

#Sandesh2Soldiers
 

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिंद।

जय हिंद की सेना।

शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

छोटी दिवाली पर देश की मातृ शक्ति को बड़ा नमन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

एक गाँव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गये और जमींदार के घर नौकरी में लगते गये। सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे।

बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी। उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। उस दिन जग्गू की झोंपड़ी के सामने बड़ी बमचक मची। बहुत लोग इकठ्ठा हुये नई बहू देखने को। फिर धीरे धीरे भीड़ छंटी। आदमी काम पर चले गये। औरतें अपने अपने घर। जाते जाते एक बुढ़िया बहू से कहती गई – पास ही घर है। किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच मत करना, आ जाना लेने।

सबके जाने के बाद बहू ने घूंघट उठा कर अपनी ससुराल को देखा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया।जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छः चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपने गांव भाग चले। पर अचानक उसे सोच कर धचका लगा – वहां कौन से नूर गड़े हैं। मां है नहीं। भाई भौजाई के राज में नौकरानी जैसी जिंदगी ही तो गुजारनी होगी। यह सोचते हुये वह बुक्का फाड़ रोने लगी। रोते-रोते थक कर शान्त हुई। मन में कुछ सोचा।

पड़ोसन के घर जा कर पूछा – अम्मां एक झाड़ू मिलेगी? बुढ़िया अम्मा ने झाड़ू, गोबर और मिट्टी दी। साथ में अपनी पोती को भेज दिया। वापस आ कर बहू ने एक चूल्हा छोड़ बाकी फोड़ दिये। सफाई कर गोबर-मिट्टी से झोंपड़ी और दुआर लीपा। फिर उसने सभी पोटलियों के चने एक साथ किये और अम्मा के घर जा कर चना पीसा अम्मा ने उसे साग और चटनी भी दी। वापस आ कर बहू ने चने के आटे की रोटियां बनाई और इन्तजार करने लगी।

जग्गू और उसके लड़के जब लौटे तो एक ही चूल्हा देख भड़क गये। चिल्लाने लगे कि इसने तो आते ही सत्यानाश कर दिया। अपने आदमी का छोड़ बाकी सब का चूल्हा फोड़ दिया। झगड़े की आवाज सुन बहू झोंपड़ी से निकली। बोली –आप लोग हाथ मुंह धो कर बैठिये, मैं खाना निकालती हूं। सब अचकचा गये! हाथ मुंह धो कर बैठे। बहू ने पत्तल पर खाना परोसा – रोटी, साग, चटनी। मुद्दत बाद उन्हें ऐसा खाना मिला था। खा कर अपनी अपनी कथरी ले वे सोने चले गये।

सुबह काम पर जाते समय बहू ने उन्हें एक एक रोटी और गुड़ दिया। चलते समय जग्गू से उसने पूछा – बाबूजी, मालिक आप लोगों को चना और गुड़ ही देता है क्या? जग्गू ने बताया कि मिलता तो सभी अन्न है पर वे चना-गुड़ ही लेते हैं।आसान रहता है खाने में।

बहू ने समझाया कि सब अलग अलग प्रकार का अनाज लिया करें। देवर ने बताया कि उसका काम लकड़ी चीरना है। बहू ने उसे घर के ईंधन के लिये भी कुछ लकड़ी लाने को कहा।बहू सब की मजदूरी के अनाज से एक- एक मुठ्ठी अन्न अलग रखती। उससे बनिये की दुकान से बाकी जरूरत की चीजें लाती। जग्गू की गृहस्थी धड़ल्ले से चल पड़ी। एक दिन सभी भाइयों और बाप ने तालाब की मिट्टी से झोंपड़ी के आगे बाड़ बनाया। बहू के गुण गांव में चर्चित होने लगे। जमींदार तक यह बात पंहुची। वह कभी कभी बस्ती में आया करता था।

आज वह जग्गू के घर उसकी बहू को आशीर्वाद देने आया। बहू ने पैर छू प्रणाम किया तो जमींदार ने उसे एक हार दिया। हार माथे से लगा बहू ने कहा कि मालिक यह हमारे किस काम आयेगा। इससे अच्छा होता कि मालिक हमें चार लाठी जमीन दिये होते झोंपड़ी के दायें - बायें, तो एक कोठरी बन जाती। बहू की चतुराई पर जमींदार हंस पड़ा। बोला – ठीक, जमीन तो जग्गू को मिलेगी ही। यह हार तो तुम्हारा हुआ।

यह कहानी नहीं अपितु सत्य है और  फिर हमें सीख देती है – नारी चाहे घर को स्वर्ग बना दे, चाहे नर्क! मुझे लगता है कि देश, समाज और आदमी को नारी ही गढ़ती है।


इसी को साबित करते हुये आज भारतीय क्रिकेट टीम ने भी एक अनूठी पहल करते हुये अपने खिलाड़ियों की जर्सी पर उनके नाम या उपनाम की जगह उनकी माता के नाम को जगह दी | इस प्रकार भारतीय क्रिकेट टीम ने देश की मातृ शक्ति को नमन किया है और शुभ संयोग देखिए कि आज के मैच में भारतीय टीम को एक बड़ी जीत मिली है |

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
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कुछ नई पहल.. अबकी बार...दीपावली के शुभ अवसर पर

नरकचतुर्दशी : मुहूर्त , पूजा और महत्व

छोटी दीवाली

दीपावली के दीप.......

व्यंग्य जुगलबंदी : मेरी तेरी उसकी दीवाली

२३४. दिवाली में दृष्टि परिवर्तन

हौसले की लौ

Happy Deepawali

- मैथिलीशरण गुप्त की कलम से राहुल और माँ यशोधरा की बातें पढ़ो

पाण्डे के प्रश्न, तिवारी के उत्तर.............

न्याय.............अधीर

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ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से, देश की सम्पूर्ण मातृ शक्ति को शत शत नमन करते हुए, आप सब को छोटी दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं |
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अब आज्ञा दीजिये ...

वंदे मातरम !!!

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

कुम्हार की चाक, धनतेरस और शहीदों का दीया

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

कुम्हार की चाक पर तेजी से चलने वाली अंगुलियों की रफ्तार धीमी ही नहीं बंद होती नजर आ रही है। मशीनरी करण के इस युग में मिट्टी की मूर्तियां और खिलौने बाजार से गायब ही होते जा रहे हैं अब तो मशीनों से ढले फाइबर के खिलौने और मूर्तियों की बिक्री का चलन चल निकला है पूजा के लिये मिट्टी की मूर्ति तलाश ने के बाद भी मिलना नामुमकिन होती जा रही है। 
बाजारीकरण ने आज कुम्हार को चॉक का पहिया जाम दिया है। वहीं लोगों में भी प्लास्टिक के खिलौने खरीदने की चाह बढ़ी है। एक तो प्लास्टिक खिलौने जल्दी टूटते फूटते नहीं हैं। वहीं मिट्टी के खिलौनों की हिफाजत करनी पड़ती है। जरा से हाथ से सरके कि टूट फूट गये। वहीं प्लास्टिक के खिलौनों की कीमत काफी कम है जबकि मिट्टी के खिलौने मंहगे होते हैं। भले ही मंहगाई की मार इतनी ग्राहकों पर न पड़ी हो। लेकिन मशीनीकरण ने कुम्हार की चॉक थाम कर उनकी रोजी रोटी छीन ली है। 
कुम्हारों का यह पुश्तैनी धंधा अब पतन की ओर है। हर शहर में कुछ बुजुर्ग कुम्हार ही बचे हैं। जिनकी काँपती उंगलियां आज भी चॉक के पहिये की रफ्तार को गतिवान किये हैं। यही हाल रहा तो प्लास्टिक के खिलौनों के इस बढ़ते चलन के कारण एक दिन कुम्हारी के बनाए माटी के कुल्हड़, गिलास, खिलौने, मूर्तियां आदि बीते युग की बाते हो जायेगी।

दिवाली आ गई है ... ऐसे मे आप सब से निवेदन है कि भले ही आप अपने घर मे कितनी भी बिजली की झालरें लगाएँ ... मिट्टी के चंद दिये जरूर जलाएं ... और उन दीयों में एक दिया हमारे अमर शहीदों के नाम का भी हो !!
मेरे पुत्र कार्तिक द्वारा प्रज्वलित शहीदों के नाम का दीया|

सादर आपका 

शिवम मिश्रा 
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एक दीप रखा है आँगन में मैंने

लाडलों का प्यार .....

शुभ दीपावली !

मेरे द्वारा प्रज्वलित शहीदों के नाम का दीया

ख्वाहिश की लंदन डायरी- 2

बंटती थीं खुशियां दिवाली पर

धन तेरस

दीये का संकल्प

हर्ष का त्यौहार है दीपावली

पहाड़ पर कविता

"तमसो माँ ज्योतिर्गमयः"

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ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं !!



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 अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

अहिंसक वीर क्रांतिकारी को नमन : ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज अमर क्रांतिकारी जतींद्रनाथ दास का जन्मदिन है. उनका जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता में एक बंगाली परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था. वे अपनी शिक्षा लेने के समय ही महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन से जुड़े. उन्हें गिरफ़्तार कर छः महीने की सज़ा सुनाई गई. बाद में वे क्रान्तिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गये. 1925 में जतीन्द्रनाथ को दक्षिणेश्वर बम कांड और काकोरी कांड के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया. जेल में दुर्व्यवहार के विरोध में उन्होंने 21 दिन तक भूख हड़ताल की तो बिगड़ते स्वास्थ्य को देखकर सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया.

जेल से बाहर आकर वे कांग्रेस सेवादल में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक बने. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके वे जतीन्द्रनाथ के द्वारा बनाये हुए थे. 14 जून 1929 को लाहौर षड़यंत्र केस में जतीन्द्रनाथ पुनः गिरफ़्तार कर लिये गए. जेल में उचित व्यवहार न होने के कारण जतीन्द्र नाथ सहित अनेक क्रान्तिकारियों ने अनशन आरम्भ कर दिया. जेल अधिकारियों द्वारा नाक में नली डालकर बलपूर्वक अनशन पर बैठे क्रांतिकारियों के पेट में दूध डालना शुरू कर दिया गया. इसी में एक डॉक्टर ने जतीन्द्रनाथ द्वारा एक नाक की नली दाँतों से दबा लिए जाने पर उनकी दूसरी नाक से नली डाल दी, जो उनके फेफड़ों में चली गई. उनकी घुटती साँस की परवाह किए बिना उस डॉक्टर ने दूध उनके फेफड़ों में भर दिया. इससे उनकी हालात बिगड़ गई. अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया. जतीन्द्र के भाई किरण चंद्रदास ट्रेन से उनके शव को कोलकाता ले गए. जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया.

ऐसे वीर अमर सेनानी को बुलेटिन परिवार की तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है.

बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

मन्मथनाथ गुप्त और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
मन्मथनाथ गुप्त (अंग्रेज़ी: Manmath Nath Guptaजन्म: 7 फरवरी 1908 - मृत्यु: 26 अक्टूबर 2000) भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी तथा सिद्धहस्त लेखक थे। इन्होंने हिन्दी, अंग्रेज़ी तथा बांग्ला में आत्मकथात्मक, ऐतिहासिक एवं गल्प साहित्य की रचना की है। ये मात्र 13 वर्ष की आयु में ही स्वतन्त्रता संग्राम में कूद गये और जेल गये। बाद में वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सक्रिय सदस्य भी बने और 17 वर्ष की आयु में उन्होंने सन् 1925 में हुए काकोरी काण्ड में सक्रिय रूप से भाग लिया।

क्रांतिकारी और लेखक मन्मथनाथ गुप्त का जन्म 7 फरवरी 1908 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता वीरेश्वर विराटनगर (नेपाल) में एक स्कूल के हेडमास्टर थे। इसलिये मन्मथनाथ गुप्त ने भी दो वर्ष वहीं शिक्षा पाई। बाद में वे वाराणसी आ गए। उस समय के राजनीतिक वातावरण का प्रभाव उन पर भी पड़ा और 1921 में ब्रिटेन के युवराज के बहिष्कार का नोटिस बांटते हुए गिरफ्तार कर लिए गए और तीन महीने की सजा हो गई। जेल से छूटने पर उन्होंने काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया और वहाँ से विशारद की परीक्षा उत्तीर्ण की। तभी उनका संपर्क क्रांतिकारियों से हुआ और मन्मथ पूर्णरूप से क्रांतिकारी बन गए। 1925 के प्रसिद्ध काकोरी कांड में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया। ट्रेन रोककर ब्रिटिश सरकार का खजाना लूटने वाले 10 व्यक्तियों में वे भी सम्मिलित थे। इसके बाद गिरफ्तार हुए, मुकदमा चला और 14 वर्ष के कारावास की सजा हो गई।

( साभार : http://bharatdiscovery.org/india/मन्मथनाथ_गुप्त )

आज मन्मथनाथ गुप्त जी की 16वीं पुण्यतिथि पर सारा देश उनको याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर....


यूपी-ये हो होना ही था...

मुलायम कुनबे की कलह में मौजूद है बॉलिवुड का पूरा मसाला

नास्तिकों से कौन डरे है !

गाँव नहीं रहा अब गाँव जैसा

टाटा के मुखिया की बर्खास्तगी से निकलने वाले सबक

सोशल मीडिया के बहादुरों जमीन पर आओ

हिंदी में एकांगी मीडिया मंथन

कहतें दीपक जलता है

अनंत से अनंत तक

यूँ ही कुछ कुछ

हमको तो दीवाली की सफाई मार गई


आज की बुलेटिन में सिर्फ इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2016

फ्लॉप शो का उल्टा-पुल्टा कलाकार - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार मित्रो,
आज प्रसिद्द हास्य कलाकार जसपाल भट्टी की पुण्यतिथि है. प्रसिद्ध हास्य कलाकार और हिन्दी फ़िल्मों के अभिनेता जसपाल भट्टी का जन्म 3 मार्च 1955 को अमृतसर में हुआ था. वे सिर्फ हास्य कलाकार ही नहीं थे वरन जीवन की विसंगतियों पर चुटीली टिप्पणियाँ करने वाले मँजे हुए व्यंग्यकार भी थे. उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की उपाधि ली. अपने कॉलेज के दिनों में ही वे अपने नुक्कड़ नाटक नॉनसेंस क्लब से अत्यंत मशहूर हो गए थे. नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर उनके कार्यक्रम फ़्लॉप शो तथा उल्टा−पुल्टा बेहद चर्चित हुए. टेलीविजन में कार्यक्रम करने से पूर्व वे चंडीगढ़ से प्रकाशित द ट्रिब्यून में कार्टूनिस्ट के रूप में कार्य करते थे.

उन्होंने प्रसिद्द हास्य सीरियल फ्लॉप शो के माध्यम से तो मध्यम वर्ग के लोगों की समस्याओं को विशिष्टता के साथ सामने रखा. इस सीरियल की निर्माता उनकी पत्नी सविता भट्टी थीं. इसके साथ ही इसकी सभी कड़ियों में उन्होंने उनकी पत्नी की भूमिका भी निभाई थी. टीवी के एक कार्यक्रम नच बलिये में भट्टी जी ने अपनी पत्नी के साथ अपना नृत्य कौशल भी दिखाया था. उन्होंने मोहाली में उन्होंने जोक फैक्टरी के नाम से अपना एक प्रशिक्षण स्कूल भी  स्थापित किया था. टीवी के साथ-साथ उन्होंने कुछ फिल्मों में भी काम किया था. जानम समझा करो में सलमान खान के निजी सचिव वाली उनकी भूमिका को लोगों ने बहुत पसंद किया था. इसी तरह वे आमिर खान, काजोल अभिनीत फना में जॉली गुड सिंह नामक गार्ड बने थे.  

आज ही के दिन 25 अक्टूबर 2012 को तड़के क़रीब तीन बजे जालंधर में शाहकोट के पास हुए एक सड़क हादसे में उनका देहांत हो गया था. उस समय वे अपनी फ़िल्म पावर कट के प्रमोशन के लिए अपनी टीम के साथ भठिंडा से जालंधर जा रहे थे. बुलेटिन परिवार की तरफ से हास्य के इस कलाकार को विनम्र श्रद्धांजलि.

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सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

ब्लॉग बुलेटिन - कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल की १०२ वीं जयंती

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
लक्ष्मी सहगल (जन्म: 24 अक्टूबर, 1914 - निधन : 23 जुलाई , 2012 ) भारत की स्वतंत्रता संग्राम की सेनानी थी। वे आजाद हिन्द फौज की अधिकारी तथा 'आजाद हिन्द सरकार' में महिला मामलों की मंत्री थीं। वे व्यवसाय से डॉक्टर थी जो द्वितीय विश्वयुद्ध के समय प्रकाश में आयीं। वे आजाद हिन्द फौज की 'रानी लक्ष्मी रेजिमेन्ट' की कमाण्डर थीं।

डॉक्टर लक्ष्मी सहगल का जन्म 1914 में एक परंपरावादी तमिल परिवार में हुआ और उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की शिक्षा ली, फिर वे सिंगापुर चली गईं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो लक्ष्मी सहगल सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गईं थीं।

वे बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित हो गई थीं और जब महात्मा गाँधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा तो लक्ष्मी सहगल ने उसमे हिस्सा लिया। वे 1943 में अस्थायी आज़ाद हिंद सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं। एक डॉक्टर की हैसियत से वे सिंगापुर गईं थीं लेकिन 87 वर्ष की उम्र में वे अब भी कानपुर के अपने घर में बीमारों का इलाज करती हैं।

आज़ाद हिंद फ़ौज की रानी झाँसी रेजिमेंट में लक्ष्मी सहगल बहुत सक्रिय रहीं। बाद में उन्हें कर्नल का ओहदा दिया गया लेकिन लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा। पूरी जानकारी यहाँ क्लिक करके पढ़े...

आज कर्नल डॉ. लक्ष्मी सहगल जी 102वीं जयंती पर पूरा देश उनको स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।






आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

रविवार, 23 अक्तूबर 2016

ब्लॉग - जो अब बंद हैं - 6




कुछ पाने की ख्वाहिश में
कितना कुछ हम पीछे छोड़ आये
क्या सच में हम इतना आगे चले आये
कि मुड़कर देखना मुनासिब नहीं लगा !!!
जाने कितने ख्याल मथते हैं ठहरे पानी के आगे
क्या सच में बाधा थी ?
या हमने बहने नहीं दिया ?
या  ...
काश, कभी पूछा होता,
मित्र ठहर क्यूँ गए !
कुछ तो सुगबुगाता एहसासों का सफर





शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

ब्लॉग - जो अब बंद हैं - 5




मिलकर रोयें, फरियाद करें 

उन बीते दिनों की याद करें 

ऐ काश कहीं मिल जाये कोई 

जो मीत पुराना बचपन का  ... आनंद बक्शी जी की लिखी पंक्तियाँ यूँ ही नहीं, गुजरे वक़्त, रिश्तों को सोचकर गुनगुना उठता है वर्तमान 



शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

ब्लॉग - जो अब बंद हैं - 4



कुछ देर रुके थे हम साथी 
कुछ जिम्मेदारियाँ निभानी थीं 
हमें भी- तुम्हें भी 
कोई गिला नहीं कि तुमने हमें नहीं पुकारा 
हम बुलाते हैं 
कुछ लिखो ना  ... 

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