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शनिवार, 31 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 47 (समापन के साथ)




आज हम समापन के किनारे हैं और रह गया है बहुत कुछ - जो सुनाना था।
ब्लॉग्गिंग की यात्रा, फेसबुक की यात्रा 
कुछ यहाँ मिला कुछ वहाँ मिला  ... 

एड़ी उचकाकर बहुतों को ढूँढा, 
मिले भी बहुतेरे 
लेकिन विराम देना है !

विराम के इस वक़्त में 
साहित्यिक रंगमंच का पर्दा गिराने से पूर्व 
हम 2016 के कई हीरे फेसबुक से अवलोकन करते हुए लाये हैं 

आप स्वयम महसूस करेंगे, कोई कम नहीं  ... 



मतिभ्रम
आईने के बिम्ब में परछाईयों की ख़ोज
बेहद मुश्किल है उसे धर दबोचना
एक छलावा है उसका पीछा करना 
कभी ना ख़त्म होने वाले इंतज़ार की तरह
ठीक वैसे जैसे आती हुई मुस्कराहट को हौले से
होंठों के कोने पे धकेल देना
या उस रस्ते का दूर से बारिश में तर दिखना
पर नज़दीक से खुश्क और सूखा होना
मतिभ्रम तो ये भी है कि
तुम्हारे छलावे पर इतराना
और उस बंद दरवाजे की गुमी हुई चाभी को
बेतहाशा हो खोजना
एक स्वर्ण हिरन का
आँगन के गलियारे में
गुलाचे मारते दिखना
और उसे पा लेने की तीव्र इच्छा रखना
सुनहरे क्षितिज के सम्मोहन में
प्रतिदिन उस अंत को खोजना
और हर बार उसका समंदर पार हीं दिखाई देना
अंत तो रिक्त है
पर भ्रम के सहारे
रिक्त भी सम्पूर्ण सा प्रतीत होता है
सम्पूर्णता कि संतुष्टि हीं
जीवन का मतिभ्रम है


जिंदगी है ....
बुरी तो नहीं है ,पर भली भी नहीं है,
ज़िंदगी अब वैसी भी नहीं है ,
कई बार देखा है मुड़कर , 
कहीं तेरे पैरों के निशाँ भी नहीं हैं ,
हाँ अब ज़िंदगी वैसी भी नहीं है ,
कई परतें खोलता है ,
पर आईना सच बोलता है ,
दरारें अब बढ़ रही हैं
हँसी चेहरे पर कहीं नहीं है ,
ज़िंदगी अब वैसी भी नहीं है ,
कुछ अटपटे हैं कुछ चटपटे हैं ,
कई मोहरे पिटें हैं ,प्यादों के हक़ वज़ीर से बड़ें हैं ,
सीधी चाल अब कौन चले ,
मात अब शह से बड़ी है ,
ज़िंदगी अब वैसी भी नहीं है

सिलवटें ,
कुछ मन में होती हैं
जिनको अक्सर
हाथों से खींचकर
सीधा कर दिया जाता है ।
कुछ खूटियां,
दीवारों पर नही मन में गड़ी होती हैं।
जिन पर टांग दी जाती हैं बिसरती हुई यादें
कभी एकांत में मनमानी याद पहन लेने को।
कुछ आले ,
दीवारों पर नहीं मन में भी होते हैं
जिनमे जाने क्यों ,
बेतरतीब बिखरी दुखती बातों को
रख लिया जाता है सहेजकर
फिर से घावों को ताज़ा करते रहने को

दाह संस्कार ,
शरीरों के ही नहीं किये जाते
कुछ शरीर लिए फिरते हैं
जलती हुई चिताएं अपने भीतर
सुलगती हुई आगें और धुआँ भी,
ये अधजले से शव
चलते फिरते फैलाते है दुर्गन्ध
अपने आस पास
ये कभी मुक्त नहीं होते खुद से,
इनको तलाश होती है किसी
मन्नत के हाथों की
जो बाँध आए इनके
चट चटाते शवों को
किसी पीर की दरगाह पर
या किसी पीपल तले
ये अधजले मन
किसी गंगाजल की शीतलता को
तरसते रहते हैं उम्र भर
तर जाने को ,मुक्त हो जाने को
ये कभी जान नहीं पाते
दाह उनके भीतर था कहीं,
और ,शीतल गंगा जल भी
पर उनके अंदर का ताप
कभी ढूंढ नहीं पाता
भीतर की शीतलता को
और ,वो चट चट कर
जलते रह जाते हैं
छटपटाते रहते है ,
ताउम्र,जनम जनम,
अपने ही अंतिम संस्कार को,
अपनी ही मुक्ति को।।

क्षणिकाएँ
1
अब
ना वो कौड्डियाँ
ना गीट्टियाँ 
ना परांदे
ना मींडियाँ
ना टप्पे
ना रस्सियाँ
ना इमली
ना अम्बियाँ
कहाँ गई
वो लडकियाँ !!!!!!
2
आज फिर
बचपन आ बैठा
सिरहाने
और मैं
झिर्रियों से झाँकती
धूप को
मुट्ठियों में
भरती रही |
3
हवाएँ
तेज़ चलती रही
सर्दी
बदन चीरती रही
धूप बदली की ओट
छिपती रही
और यह
इकलौता फूल
सूखी टहनी पर
इठलाता रहा
कितना जिद्दी है ना वो
मेरी तरह |
*कौड्डियाँ—डोगरी भाषा में कोड़ियों के लिए प्रयुक्त शब्द

मैं स्किज़ोफ्रेनिक हूँ
-------------------------
तुम्हें लगता है मैं बड़बड़ा रही हूँ
बतिया रही हूँ अपने आप से
गुस्सा कर रही हूँ
लड़ रही हूँ
घूम रही हूँ यूँ ही बेकाम
बेबात हँस रही हूँ
रो रही हूँ
नहीं
जब तुम नहीं सुन सके मेरी बात
नहीं पढ़ सके मेरा मन
नहीं समझ सके मुझे
तब
हाँ तब
मैंने बतियाना शुरू किया
हँसना रोना शुरू किया
मारना पीटना भी शुरू किया
अपने आप से बात नहीं करती हूँ मैं
मेरे साथी होते हैं
चिड़िया कबूतर दीवार
या मोटर साइकिल भी
टीवी रेडियो तक मुझसे बात करते हैं
मैं उन्हें सुनाती हूँ अपने मन की बात
क्योंकि वे सुनते हैं मुझे
तुम्हारी तरह सिर्फ सुनाते नहीं हैं
तब
जबकि मुझे ज़रूरत है तुम्हारे
प्यार की स्नेह की और देखभाल की
तुम दुत्कारते हो मुझे
मुझे पागल की उपाधि से नवाजते हो
चुप रहने को कहते हो
खुद पीटते हो
ओझाओं से पिटवाते हो
बस उससे नहीं मिलवाते
जो समझ सकता है मेरा मन
और तुम्हें भी समझा सकता है
मेरी बड़बड़ाहट
मेरी झल्लाहट
मेरी खीज
मेरा गुस्सा
हाँ, मेरा खुद पर नियंत्रण नहीं है
पर तुम इस बात को क्या कभी समझ पाओगे
तुमने मेरा जूता तो कभी पहन कर देखा ही नहीं
तुम कारण ढूँढते हो मेरी अवस्था का
मैं बस निवारण चाहती हूँ
हाँ मैं एक स्किज़ोफ्रेनिक हूँ
**
( मित्रों, इस रचना के ज़रिये मैंने कोशिश की है कि स्किज़ोफ्रेनिया के लक्षण बता सकूँ...यदि आपके आसपास भी कोई मानसिक रोगी हो तो उससे दूर नहीं जाएँ...वह सिर्फ आपके प्रेम , देखभाल का भूखा है..उसे उचित चिकित्सकीय सेवा उपलब्ध करवाएँ व आप खुद भी उसकी सही देखभाल के तरीके जानने के लिए काउन्सलर से मिलें ...इतना सोचें सिर्फ कि वह रोगी कभी कभी सामान्य अवस्था में भी होता है..उसे इंसान समझ कर प्रेम भरा व्यवहार करें यही उसका सही इलाज है)

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 46




आज़ादी का अर्थ है स्वतंत्र होना, न कि स्वच्छन्द होना !!! लेकिन अपनी सुविधा के लिए अपनी मर्ज़ी से लोग इसके मायने बदल देते हैं !
जैसे, खिड़की से कुछ बाहर फेंक देना, अपना घर तो साफ़ है, और जो फेंका वो अपने घर की खिड़की से !!
यात्रा के दौरान एक शहर से दूसरे शहर को जाते लोग चलती गाडी से सड़क पर कचरा उड़ा देते हैं, यह सोचकर कि कौन हमें पहचानेगा या हमें कौन सा इस सड़क पर चलना है  ... !!
अनुशासन के आगे अपनी दकियानूसी स्वतंत्रता,यानि स्वछंदता की कैंची बड़ी तेजी से चलती है  ... 

अवलोकन 

mangopeople से 

अंशुमाला जी की इस रचना का 


आज़ादी की आड़ में अनुशासन से परहेज ------mangopeople




                    मुम्बई में स्कूलों में बच्चो को मेहंदी,नेल कलर , बिंदी , टिका आदि फैशन वाली चीजे लगाना मना है । कुछ लोग बाज नहीं आते और बच्चो में मेहंदी लगा देते है नतीजा बच्चो को भुगतान पड़ता है । कुछ मम्मियां इस पर भिनभिनाती रहती है और मुझे समझ नहीं आता की किसी शादी में बच्चो ने मेहंदी न लगाया तो उससे उनके उत्साह में क्या कमी आ जायेगी ।  आम लोगो की सुरक्षा के लिए कोई नियम बनता है जाँच पड़ताल होती है तो सबसे ज्यादा आम लोग ही उस पर चिल्ल पो मचा देते है । अरे मॉल में पर्स चेक कर रहे है जैसे उसमे बम हो , जाँच से क्या होगा , कोई पर्स बम ले कर आयेगा क्या । सबको पता है की दो पहिया वाहन चलाते समय हेलमेट लगाना है , जैसे ही चेकिंग शुरू होती है लोग बोलना शुरू कर देते है , कमाई के लिए खड़े है , टारगेट मिला है , बेवजह परेशान कर रहे है, जल्दी है , जाम लगा है । यहाँ तक की शौचालय बनाने और शहर साफ करने जैसे मुद्दों के खिलाफ भी लोग बोलने लगते है । सभी को रातभर डांडिया करना है , शादियों में नाचना है तेज आवाज में संगीत बजा कर , रात १० -११ बजे सब बंद का नियम आजादी के खिलाफ है । 

                                                                            असल में तो लोगो को नियम मानने अनुशासन में रहने से परेशानी है । जैसे ही कोई नियम बनता है लोग आपत्तियां उठाना शुरू कर देते है , और कई बार इसमे सबसे आगे वो होते है जिनका उस नियम से कोई मतलब ही नहीं होता है । खबर आई सरकार ने कुछ पॉर्न साईट पर बैन लगा दिया , लो जी सभी को कुछ भी देखने की आजादी याद आ गई उसका विरोध ऐसा शुरू हुआ जैसे की पढाई करने पर रोक लगा दी गई है । विरोध करने वाले से पूछा भाई दिन में कितनी बार पॉर्न देखते है , नहीं नहीं हम नहीं देखते है ये सब , जब नहीं देखते है तो विरोध क्यों कर रहे है , जो देखते है उनकी तो आजादी के खिलाफ है ना । हे प्रभु जिस चीज को लोग देखते है किन्तु उसको स्वीकार करने को तैयार नहीं है , हिम्मत नहीं है उस पर किसी भी तरह का बैन इन्हें स्वीकार नहीं , जबकि उन्हें ये भी नहीं पता की सारे पॉर्न साईट पर बैन नहीं हुआ था , सिर्फ उन पर हुआ था जिन पर बच्चो के पॉर्न वीडियो थे , वो भी कोर्ट के कहने पर , वरना ये सारे मुद्दे तो हमारी सरकारों के लिस्ट में कही आती ही नहीं ।

                                                                       आजादी के नाम पर असल में हम अनुशासित होने से डरते है , आजादी का मतलब हमारे लिए ये है कि हम जो चाहे करे और हमें कोई न रोके , लेकिन जैसे ही किसी और की घूमती छड़ी हमारे नाक पर लगती है हमें सारे नियम कानून अनुशासन याद आ जाता है इस देश में तो कोई नियम कानून ही नहीं है , कोई देखने वाला ही नहीं है , किसी को पड़ी ही नहीं है । अब राष्ट्रगान का मामला ले लीजिये , कोर्ट ने जैसे ही सिनेमा में राष्ट्रगान बजने की बात की सबसे पहले याद आये विकलांग , वो कैसे खड़े होंगे , बेचारे विकलांग । सामान्य स्कुल में पढने , रोजगार के समान अवसर , सार्वजनिक इमारतों को विकलांगो के लायक बनाने जैसे अपने अधिकारों के लिए वो कितना लड़े आंदोलन किया कोई उनके साथ न आया , आज सिनेमा हॉल में ५२ सेकेण्ड वो कैसे खड़े रहेंगे इसके लिए अचानक सभी को उनकी याद आ गई । कोई बीमार हुआ तो वो कैसे खड़ा रहेगा , वो बेचारा बीमार तीन घंटे बैठ कर फिल्म देख सकता है बस , हमारी देखने की सुनने की आजादी का क्या हमें नहीं सुनना है तो मत जाइये सिनेमा हॉल , कोई जबरजस्ती नहीं है । किसी भी संस्थान, जगह स्कुल कॉलेज का जो नियम है उसके तहत ही आप वहां रहा सकते है तो रहिये वरना मना कर दीजिये । हम अपने बच्चो को मदरसों, गुरुकुलो में नहीं भेजते , हमें नहीं पसंद वहां ही शिक्षा व्यवस्था , आप भी मत जाइये जहाँ के नियम कानून आप को पसंद नहीं ।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 45




अनिता जी कहती हैं, "यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है."
और बुलेटिन ने उस सत्य को समीप करने की कोशिश की है 



बिन गुरू ज्ञान न होए

सद्गुरु कहते हैं जीवन गुरूतत्व से सदा ही घिरा है. गुरु ज्ञान का ही दूसरा नाम है. अपने जीवन पर प्रकाश डालकर हमें ज्ञान का सम्मान करना है, अर्थात सही-गलत का भेद जानकर जीवन में आने वाले दुखों से सीखकर ज्ञान को धारण करना है, ताकि पुनः वे दुःख न झेलने पड़ें. मन ही माया को रचता है और अपने बनाये हुए लेंस से दुनिया को देखता है. साधक वह है जो कोई आग्रह नहीं रखता न ही प्रदर्शन करता है. देने वाला दिए जा रहा है, झोली भरती ही जाती है. हमें वाणी का वरदान भी मिला है और मेधा भी बांटी है उसने. यदि उसे सेवा में लगायें जीवन तब सार्थक होता जाता है. भक्ति और कृतज्ञता के भाव पुष्प जब भीतर खिलते हैं, मन चन्द्रमा सा खिल जाता है, गुरु पूर्णिमा तब मनती है. 


जगे चेतना भीतर ऐसी

जीवन में कई बार ऐसा होता है जब हम दोराहे पर खड़े होते हैं. एक रास्ता जाना-पहचाना होता है, जिस पर चल कर हम कहीं भी तो नहीं पहुंचते  पर रास्ते का न तो कोई भय होता है न ही कोई दुविधा, दूसरा मार्ग अपरिचित होता है, वह कहाँ ले जायेगा ज्ञात नहीं होता उस पर चलने के लिए विरोध सहने का साहस भी चाहिए और मार्ग की कठिनाइयों का सामना करने की हिम्मत भी. अक्सर हम पहला  मार्ग ही चुन लेते हैं क्योंकि इसमें कोई जोखिम नहीं है और नतीजा यह होता है हम वहीं रह जाते हैं जहाँ थे. जीवन हमें कई बार अवसर देता है पर किसी न किसी तरह का भय हमें आगे बढ़ने से रोक लेता है. क्या ये सारे भय हमारे मन की दुर्बलता के परिचायक नहीं हैं. भीतर एक चेतना ऐसी भी है जो चट्टान की नाईं हर विरोध का सामना कर सकती है पर उसका हमें कोई स्मरण ही नहीं है.


टिक जाये जब मन ध्यान में

जीवन के स्रोत से जुड़े बिना मन सन्तुष्ट नहीं हो सकता, जिस तक जाने का उपाय है ध्यान। पहले-पहल  जब कोई ध्यान का आरम्भ करता है तो भीतर अंधकार ही दिखाई देता है, विचारों का एक हुजूम न जाने कहाँ  से आ जाता है, किन्तु साधना व निरन्तर अभ्यास से मन ठहरने लगता है और उस स्रोत की झलक मिलने लगती है जहाँ  से सारे  विचार आते हैं. मन के पार जाये बिना कोई मन को देख नहीं सकता उस पर नियंत्रण का तो सवाल ही नहीं उठता। ध्यान का  अनुभव किये बिना उस अनन्त शांति का स्वाद नहीं मिल सकता जिसका जिक्र सन्त कवि करते हैं, ध्यान ही वह राम रतन  है जिसे पाकर मीरा नाच उठती है. एक मणि  की तरह वह भीतर छिपा है जिसकी खोज ही साधक का लक्ष्य है.


माली सींचे मूल को

जब तक स्वयं की सही पहचान नहीं मिलती, जीवन में एक अधूरापन महसूस होता है. सब कुछ होते हुए भी एक तलाश जारी रहती है. देह किसी भी क्षण रोगग्रस्त हो सकती है, मृत्यु को प्राप्त हो सकती है, यह भय भी अनजाने सताता रहता है, शेष सारे भय उसकी की छाया मात्र हैं. स्वयं की पहचान करना इतना महत्वपूर्ण होते हुए भी हम इस कार्य को टालते रहते हैं, इसका कारण शायद यही है कि हमें लगता ही नहीं कि हम स्वयं को नहीं जानते, तभी हम अक्सर दूसरों से यह कहते हैं, तुम मुझे नहीं जानते. इस जानने में एक बड़ी भूल यह हो रही है कि जन्म के बाद इस जगत में हमने जो भी हासिल किया है, उसी से हम स्वयं को आंकते हैं. वृक्ष का जो भाग बाहर दिखाई देता है उसका मूल भीतर छिपा है. इस जीवन में हमने जो भी पाया अथवा खोया है उसका मूल भीतर है. यदि बाहर को संवारना है तो मूल से परिचय करना ही होगा.  

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 44




एक नाम, जो बिना किसी स्पर्द्धा के साहित्यिक जुनून में जीते हैं, लगभग हर परिचित ब्लॉग पर वे मिलते हैं।  गर्व होता है, क्योंकि हर लिखनेवाले की ख्वाहिश होती है कि कोई उसे पढ़े, और ये उस ख्वाहिश को सम्मान देते हैं अपनी उपस्थिति बताकर - भले ही उस एहसास से वह खुद को न जुड़ा पायें , लेकिन हर किसी का अपना ख्याल होता है, इसे मानते हुए वे अपनी यात्रा जारी रखते हैं  ... 


आज बुलेटिन अवलोकन में हम उनको लेकर आये हैं :)





कम नहीं हैं 
बहुत हैं 
चारों तरफ हैं 
 फिर भी 
मानते नहीं हैं 
कि हैं 
हो सकता है 
नहीं भी होते हों 
उनकी सोच में वो 
बस सोच की 
ही तो बात है 
देखने की 
बात है ही नहीं 
हो भी नहीं 
सकती है 
जब गर्दन 
किसी भी 
शुतुरमुर्ग की 
रेत के अन्दर 
घुसी हुई हो 
कितनी अजीब 
बात है 
है ना 
आँख वाले 
के पास देखने 
का काम 
जरा सा भी 
ना हो 
और सारे 
शुतुरमुर्गों 
के हाथ में 
हो सारे देखने 
दिखाने के 
काम सारे 
सभी कुछ 
गर्दन भी हो 
चेहरा भी हो 
जो भी हो 
घुसा हुआ हो 
और 
चारों तरफ 
रेत हो 
बस रेत 
ही रेत हो 
शुतुरमुर्ग 
होने मे कोई 
बुराई नहीं है 
शुतुरमुर्ग होने 
के लिये कहीं 
मनाही नहीं है 
कुछ होते ही हैं 
शुतुरमुर्ग 
मानते भी हैं 
कि हैं 
मना भी 
नहीं करते हैं 
शुतुरमुर्ग की 
तरह रहते भी हैं 
मौज करते हैं 
बेशरम शुतुरमुर्ग 
नहीं कह सकते हैं 
अपनी मर्जी से 
रेत में गर्दन भी 
घुसा सकते हैं 
ईमानदार होते हैं 
देखने दिखाने 
और बताने का 
कोई भी ठेका 
नहीं लेते हैं 
‘उलूक’ 
बकवास करना 
बंद कर 
गर्दन खींच 
और घुसेड़ ले 
जमीन के अन्दर 
और देख 
बहुत कुछ 
दिखाई देगा 
शुतुरमुर्गो 
नाराज मत होना 
बात शुतुरमुर्गों 
की नहीं हो रही है 
बात हो रही है 
देखने दिखाने 
और 
बताने की 
गर्दन घुसेड़ कर 
रेत के अन्दर । 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 43 : डेढ़ हज़ार पचासवीं ब्लॉग बुलेटिन

एक बड़ी प्यारी कथा है. एक आदमी कहीं जा रहा था. रास्ते में एक दुकान के बाहर उसे संगमरमर की एक शिला पड़ी दिखाई दी. वो वहीं रुक गया और उसने दुकानदार से उस शिला का मूल्य पूछा. दुकानदार ने कहा कि यह बेकार पड़ा पत्थर का टुकड़ा है, जिसने अकारण उसके दुकान की जगह घेर रखी है. दुकानदार बिना मूल्य वह शिला देने को राज़ी हो गया. यहाँ तक कि उसे पहुँचाने के पैसे भी उसने स्वयम दे दिए.

कुछ समय पश्चात वह व्यक्ति उस दुकानदार के पास दुबारा गया और उसे आग्रह कर अपने साथ ले आया. जब उस व्यक्ति ने एक कमरे में ले जाकर उस दुकानदार के सामने से परदा हटाया तो वो हैरान रह गया. परदे के पीछे एक अद्भुत कलाकृति छिपी थी. दुकानदार ने आश्चर्य से पूछा कि यह किसकी कलाकृति है, तो वह व्यक्ति बोला, “यह वही पत्थर की शिला है जो मैं तुम्हारे पास से लेकर आया था. इसमें जो व्यर्थ था उसे मैंने हटा दिया और जो बचा है उसे ही तुम एक अनुपम कलाकृति कह रहे हो!”

यह ब्लॉग-संसार बहुत छोटा है, लेकिन इसके अन्दर बहुत सारे घुमावदार रास्ते हैं. इन रास्तों में भटकने वाला इंसान कभी किसी गली में किसी कविता की छाँव तले पनाह पाता है, तो कभी किसी ग़ज़ल की ठण्डी हवा के झोंके के बीच सुस्ताता है, कभी कोई कहानी उसका माथा चूमती है, तो कभी कोई व्यंग्य गुदगुदा जाता है. कितनी गलियाँ तो ऐसी हैं, जिनसे कभी गुज़रे ही नहीं होते. कितने रास्ते हैं जिनका हमें अनुमान भी नहीं और कुछ ऐसे मनभावन ठाँव हैं जिनका हमें पता तक नहीं मालूम.

दरसल किसी भी अनजान शहर या गाँव में घूमना तो बहुत ही सुखद अनुभव होता है, किंतु कोई गाइड मिल जाए, तो यह सफ़र यादगार बन जाता है. उस गाँव के हर घर-घरौंदे, पेड़-पौधे, फूल-काँटे, फल-पत्ते, ईंट-रोड़े मानो उस गाइड की ज़ुबान से बोलने लगते हैं, सजीव होकर बतियाने लगते हैं हमसे. वो “गाइड” ही तो है जो किसी रोज़ी मार्को को नलिनी बना देता है और वो कहती है “आज फिर जीने की तमन्ना है.”

आप सोचेंगे कि मैं इतनी बड़ी भूमिका आख़िर क्यों बाँध रहा हूँ. तो मित्रो, जिनका परिचय मैं आपसे करवाना चाहता हूँ, वास्तव में वो किसी परिचय की मोहताज नहीं और इतनी लम्बी भूमिका भी उनके व्यक्तित्व को बाँध सके, यह सम्भव नहीं. लेकिन इतना भी नहीं कहता मैं, तो शायद ख़ुद से बेईमानी होती. आप समझ ही रहे होंगे कि मैं किनकी बात कर रहा हूँ. ब्लॉग-संसार को यदि हम एक शिलाखण्ड समझें, तो पिछले महीने भर से उस शिलाखण्ड से उकेरी गई कलाकृति के विभिन्न रूप वे आपके समक्ष प्रस्तुत करती रही हैं और एक गाइड की तरह एक-एक रचनाकार से आपका परिचय करवाती रही हैं.


मैं जानता हूँ कि उनका नाम न लूँ तो भी दूसरा कोई नाम आपके मन में आ ही नहीं सकता, सिवा एक नाम के, जो है – रश्मि प्रभा ! हमारे बुलेटिन-टीम की वरिष्ठ सदस्य और हम सबकी रश्मि दी! ऐसा भी नहीं है कि यह उनका प्रथम प्रयास है. विगत कई वर्षों से वो इस तरह के सुन्दर प्रयोग करती रही हैं. इसी से जुड़ी एक और कहानी याद आ रही है. तीन दोस्त एक गाँव से दूसरे गाँव जीविकोपार्जन के लिये जा रहे थे. रास्ते में एक नदी आई, जिसमें प्रवेश कर उन्हें उस पार जाना था. कोई छूट न गया हो इसलिये उन्होंने नदी पार कर मित्रों की गिनती शुरू की. लेकिन उनके दु:ख का पारावार न रहा जब उनकी गिनती में केवल दो ही मित्र पाए गये. बारी बारी से तीनों ने गिनती की, लेकिन बस दो ही मित्र दिखाई दिये. उनके विलाप को सुनकर एक व्यक्ति उनके समीप आया और सारी बात सुनकर उन्हें एक साथ खड़ा किया और उनकी गिनती की – एक, दो और तीन! तीनों खुशी-खुशी अपनी यात्रा पर निकल गये.

रश्मि दी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उन्होंने सभी रचनाकारों के परिचय हमसे करवाये और उनकी रचना से रू-ब-रू करवाया. किंतु इस गिनती में वे स्वयम की गिनती करना भूल गईं. ऐसे में मैंने सोचा कि क्यों न उनकी गिनती दुरुस्त कर दूँ और आपको उनसे मिलवाऊँ, एक ब्लॉगर के रूप में, एक सम्वेदनशील कवयित्री के रूप में, एक बेहतरीन सम्पादक के रूप में और सबसे ऊपर एक बहुत ही अच्छे इंसान के रूप में.

फेसबुक पर उनकी रचनाओं के साथ जितनी छेड़छाड़ मैंने की है, किसी और ने की हो, मेरी स्मृति में नहीं है. अन्य कोई रचनाकार होता तो मुझे ब्लॉक/अनफ़्रेण्ड कर चुका होता या खरी खोटी सुना देता. लेकिन यह रश्मि दी की उदारता है कि वे हमेशा मेरी बातों का प्रत्युत्तर देती हैं, मेरी आपत्ति को काटते हुये अपना पक्ष प्रस्तुत करती हैं. अपनी बात बड़प्पन के सहारे मनवाने से परे, वो अपनी सोच स्पष्ट करती हैं और मेरे भी तर्क पर ध्यान देती हैं. कभी मैं सुधर जाता हूँ और कभी वो सुधार लेती हैं. रचनाओं को लेकर हम दोनों भाई-बहन एक दूसरे के साथ वही सलूक करते हैं जो एक रचनाकार, दूसरे रचनाकार के साथ करता है. और यही उनका बड़प्पन है, जो उन्हें एक विशाल ब्लॉगर समूह के बीच सम्मान के साथ स्थापित करता है.

तो लोगों की गिनती में ख़ुद को नज़रअन्दाज़ करती रश्मि प्रभा दी के लिये हमने एक और नई गिनती खोजी है, जो है हमारी आज की एक हज़ार पाँच सौ पचासवीं ब्लॉग-बुलेटिन और उनका चयन अवलोकन शृंखला के अंतर्गत किया जाना, जो मेरी विशेष बुलेटिन है, मेरे लिये गर्व का विषय है. तो अब मुझे अनुमति दीजिये और आप आनन्द लीजिये रश्मि दी की एक प्रतिनिधि रचना का जिसे आप उनका आत्मकथ्य भी कह सकते हैं!


रात होते 
बन्द पलकों की सुरंग से 
अतीत में चहलकदमियाँ करती हूँ 
अहले सुबह 
आँख खुलते 
वर्तमान की लालिमा में 
ओस की बूँदों से उठाती हूँ शब्द 
"आत्मकथा" लिखने के लिए 
.... 
एक अथक प्रयास है धुंध को समेटने का 
पर,
मुमकिन नहीं !

यूँ लिखती तो हूँ,
पर वो कहाँ लिख पाती 
जो मन के दराजों में 
बुलबुलों की तरह बनता मिटता है 
... 
आत्मकथा तो उसे ही कहते हैं न !
ooo 

खैर,
मैं लिखना चाहती हूँ 
गोल गोल सफ़ेद फ्रॉक में घूमती लड़की को 
जो काबुलीवाला की मिन्नी की तरह 
चटर-पटर बोलती जाती थी 
एक लेमनचूस के लिए 
पापा की जेब से निकालकर 
दुकानदार को सौ रूपये दे आई थी 
... दुकानदार वापस कर गया था 
पापा से सीख मिली थी 
बिना कहे कुछ नहीं निकालते !!!
इसे चोरी नहीं कहते 
सिर्फ लेमनचूस का स्वाद कहते हैं 
पर, उसने जाना 
- स्वाद के लिए ऐसा करना गलत है!

000 

मैं लिखना चाहती हूँ 
वह लड़की जब क्लास-मॉनिटर बनी 
तो उसके अंदर एक शिक्षक बैठ गए 
कक्षा से शिक्षक के बाहर निकलते 
छड़ी उसके हाथ में होती 
मेज पर उसे पटककर 
वह चाहती 
बाकी बच्चे थरथर काँप उठें 
दूसरी कक्षा में मॉनिटर होना 
बहुत बड़ी उपलब्धि थी  ... 
एक दिन अपने रुआब में 
उसने एक लड़के पर सख्ती दिखाई 
शांत नहीं होने के जुर्म में 
अपनी छड़ी घुमाई 
मुड़े सर पर गुलौरी उठ आई 
"अरे बाप रे बाप" की चीख पर 
वह सकते में आई !
फिर भी रही शान में 
जिसे देख शिक्षक के चेहरे पर भी हँसी आई 
पर गम्भीरता से उन्होंने समझाया 
"तुम्हारा काम है 
शोर मचानेवालों का नाम लिखना 
ना कि सज़ा देना" 
सर हिलाते हुए हामी में 
वह देखती रही ललचाई नज़रों से छड़ी को 
शिक्षक के पद से यूँ हटना 
उसे समझ नहीं आया 
समझ से अधिक मन को नहीं भाया  ...

000 

लिखना चाहती हूँ 
उस लड़की को 
जिसकी अबोध उम्र में 
एक आँधी आई 
मृत्यु की भाषा से अनजान 
वह खोने के मर्म के द्वार पर खड़ी हो गई 
"क्या है मृत्यु"
सोचते-समझते 
शमशान के घने वृक्ष 
उसकी दहशत बन गए !
ज़िन्दगी के कई राग बदल गए 
 ... और,
ख्यालों, ख़्वाबों की पराती गानेवाला मन 
अबूझ को 
बूझने का प्रयत्न करने लगा  !

००० 

लिखना चाहती हूँ उस लड़की को 
जो देखते ही देखते 
शिवानी की कृष्णकली हो गई 
प्यार की रेखाएँ खींचती 
वह खुद में बसंत हो गई 
शिव वही 
पार्वती वही 
ध्यानावस्थित वह अर्धनारीश्वर बन गई  !
००० 

लिखना तो चाहती हूँ उस लड़की को 
पर कभी स्याही कम पड़ जाती है 
कभी  - जाने कितने पन्ने फाड़ देती हूँ 
कैसे लिख सकती हूँ उस दर्द को 
जो सात वचनों के साथ उभरे 
.... 
उस दर्द को उकेरना हास्यास्पद होगा 
क्योंकि,
उस दर्द को वही जीता है 
जो एक एक साँस का 
दो रोटी का मोहताज होता है!!!
नहीं लिख सकती उस लड़की का दर्द 
हल्का हो जाएगा वह दर्द 
जो उसे बुत बना गया  
साथ में माँ,
जहाँ से उसकी कथा बदल गई  ... 

.... 
००० 
मैंने सोते-जागते देखा 
बाह्य से खौफ खाती हुई वह लड़की 
धड़कनों पर काबू रखते हुए 
घर की चारदीवारों से बाहर निकलने लगी 
वह - जिसकी चाह थी 
जायसी का महाकाव्य बनने की 
वह कुरुक्षेत्र में खड़ी हो गई 
कभी वाणों की शय्या पर 
भीष्म की पीड़ा को समझती 
कभी अभिमन्यु के सारे चक्रव्यूह तोड़ती 
कभी कर्ण से सवाल करती 
गीता के कुछेक श्लोकों को दुहराकर 
वह कृष्ण की ऊँगली में समाहित हो गई 
अपने मातृव के आगे 
सुदर्शन चक्र बन गई  ... 

००० 

लिखना चाहती हूँ उस लड़की को 
जो कल्पनाओं के गुब्बारों को थामकर 
आकाश छूने लगी 
प्यार' उसके लिए जादू था 
वह कुछ भी उपस्थित कर दिया करती थी 
सब दाँतों तले ऊँगली दबाते 
कभी ईर्ष्या में अनर्गल तोहमतें लगाते 
उसका सत्य 
उसके जायों में था 
उनके अतिरिक्त 
यह अधिकार किसी को न था 
कि उस लड़की की व्याख्या कर सके 
उसके बीहड़ जंगलों को उसके जायों ने देखा था 
उसकी निगरानी में बच्चे जंगली जानवरों से सुरक्षित थे 
बच्चों की निगरानी में वह सुरक्षित थी 
रात दिन 
वे बच्चे उसके साथ 
जंगल में रास्तों का निर्माण करते रहे 
पसीने की 
बहते आँसुओं की अमीरी 
 बराबर बराबर जीते गए  ... 
इस अमीरी की कथा 
टुकड़ों में कोई क्या जानेगा 
!!!
०००  
अचानक 
बिल्कुल अचानक 
संभवतः महाभिनिष्क्रमण की प्रबलता थी 
या मोहबन्ध की 
या  .... 
वह कई कैनवसों से निकल गई 
एक नहीं 
एक बार नहीं 
कई उँगलियाँ 
कई बार उठीं 
आलोचनाओं का गुबार उठा 
और वह कमल हो गई 
जिस सहनशीलता से वह परहेज रखती थी 
उसे आत्मसात किया 
और उसे उच्चरित करने लगी  ... 
००० 

लिखना चाहती हूँ 
अक्षरशः, शब्दश: 
शाब्दिक दृश्य को ज़ुबान देना चाहती हूँ 
पर 
मुमकिन नहीं 
सत्य के कुरुक्षेत्र में 
जो चेहरे होंगे 
उनसे कोई जीत नहीं मिलेगी 
ना ही आत्मकथा को कोई दिशा मिलेगी 
बस कलम को संयमित कर 
इतना लिख सकती हूँ 
कि उस लड़की ने रिश्तों की गरिमा के पीछे 
नंगे सत्य का नृत्य देखा 
फिर वह लड़की 
जो स्वयम में 
एक शांत झील देखना चाहती थी 
त्रिनेत्र खोलने पर मजबूर हुई 
जी भरकर तांडव किया 
नंगे सत्य को झेलने के लिए 
कई नंगे झूठ को 
जबरन सत्य का जामा पहनाया 
और निकल पड़ी 
मोह संहार के लिए 
ठेस लगी 
आँसू पोछे 
एक शरीर में कई जन्म लिए  ... 
००० 

लिखना चाहती हूँ 
उस अल्हड़ सोलहवें वर्ष की लड़की को 
जो प्रेम को जीना चाहती थी 
प्रेमिका बनकर 
जीया - भरपूर जीया भी 
लेकिन माँ बनकर !
माँ में ही उसकी सम्पूर्णता रही 
हाँ,
कल्पना के पंख उसने कभी नहीं उतारे 
हकीकत की उम्र 
बढ़ते ब्लड प्रेशर 
थकते क़दमों में 
वह आज भी 
एक तितली 
एक चिड़िया बाँध देती है 
हो जाती है युवा लाल परी 
अपनी अगली पारी के लिए 
बटोर लाती है सपनों भरी कहानी 
अपने अगले क़दमों के लिए 
ooo 

ठेस अभी भी लगती है 
पर  ... 
आत्मकथा सी वह व्यक्त नहीं होती 
हो ही नहीं सकती 
मरे हुए रिश्तों के लिए भी 
दहकते शब्दों को 
नदी में बहाना पड़ता है 
अगले कदम मजबूत रहें 
इसके लिए 
कलम की जिह्वा को कटु नहीं बना सकते न !
आधे-अधूरे 
कुछ स्पष्ट
कुछ अस्पष्ट 
बोलते, लिखते हुए 
आत्मकथा नहीं लिख पाती 
लिख ही नहीं सकती 
.... 
ना - भय नहीं 
बस संस्कारों की सुरक्षा के लिए 
चाहे-अनचाहे 
कई सत्य का अग्नि संस्कार करना होता है 
क्योंकि,
वही सत्य है 
वही सही है 
सही मायनों में - माँ है !

और सच पूछो तो 
माँ की आत्मकथा 
एक माँ लिख भी नहीं सकती 
और एक बच्चा 
उसे कभी कथा नहीं बना सकता !!!

इसीलिए  ... हाँ इसीलिए 
मैं आत्मकथा नहीं लिख पाती 
ज़िन्दगी को कितना भी निचोड़ो 
आखिरी बूँद नहीं निकलती 
और उन बूँदों में बहुत कुछ होता है 
बहुत बहुत कुछ 
- जिसे लिखा नहीं जा सकता 



लेखागार