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मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 28




सुषमा वर्मा की कलम से , 
मेरा परिचय तब तक अधूरा है जब तक मै अपने माता पिता का जिक् ना कर लूँ आज मै जो कुछ भी हूँ इनके ही त्याग और कठिन संघर्ष के कारण ही हूँ इनके ही दिये आर्शीवाद और दिये संस्कारो से ही आज मैने अपनी पहचान बनायी है..!!!!........... 
रंग तितलियों में भर सकती हूँ मैं...... फूलो से खुशबू भी चुरा सकती हूँ मैं.... यूँ ही कुछ लिखते-लिखते इतिहास भी रच सकती हूँ मैं......!!!

एहसासों के यज्ञ में इनकी 'आहुति' काफी मायने रखती हैं।  उम्र दर उम्र की सोच की करवटें मन के तारों को झंकृत कर जाती हैं। 



चलो इक बार फिर,
तुम मुझे कॉफी पर बुलाओ,
और हमेशा की ना करते हुए हाँ कर दूँ....
तुम्हारा कॉफी पर बुलाना,
इक बहाना था,
गुजरे पलो को दोहराना होता है...
तुम वही शर्ट पहन कर आओ,
जिसे कभी मैंने कहा था,
कि तुम पर अच्छी लगती है...
मैं वही रंग पहन कर आऊं,
जो तुमको बहुत पसंद था..
हम इस तरह इक-दूसरे को,
देख कर मुस्करा दिए,कि
याद तो अभी भी हमें सब कुछ है....
ना जाने क्यों तुम्हारे साथ जब भी होती हूँ,
सालो बाद भी कैपिचीनो कॉफ़ी का,
स्वाद वही होता है...
वही मिठास तुम्हारी बातो की लगती है,
और थोड़ी सख्त तुम्हारे अंदाज़ जैसी होती है...
पर इक बात मुझे आज तक,
समझ नही आई...
वैसे फोन पर तो तुमसे बहुत बाते करती हूँ,
पर जब तुम सामने होते हो,
जाने क्यों कुछ सूझता ही नही..
जैसे ही नजरो से नजरे मिल जाती,
धड़कने बढ़ जाती और,
मैं सब कुछ भूल जाती हूँ...
और तुम मुझे चिढ़ाते हुऐ कहते हो,
अब बताओ तुम्हे कितनी बाते करनी है.....
मैं सिर्फ मुस्करा कर रह जाती हूँ,
कैसे कहूँ तुम्हारा मेरे सामने होना ही,
सारी बातों का मतलब होता है....
सच कहूं तो ये कॉफी मुझे नही पसंद...
बस तुम्हारे साथ ही कॉफी पीती हूँ...
यही वो लम्हे है...
तुम्हारे साथ जिनसे मुझे प्यार हो गया...!!!


सोमवार, 11 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 27




कथाओं से बच्चों  को जोड़ते हुए
हम अनजाने ही सही 
उन्हें किसी अनसुलझे प्रश्न से बाँध देते हैं !
बचपन अपनी उम्र के अनुसार सोचता है 
चिंतन उसकी नरम मुलायम मिट्टी को 
कौन सा पुख्ता रूप देगी - कौन जाने !!!

अंशुमाला के इस विचार से आज मिलते हैं -

अच्छी कहानियों के बुरे पहलू --------- mangopeople




                                                                      बिटिया का तीसरे जन्मदिन का दूसरा दिन था वो उपहार में मिले सभी खिलौनों से एक साथ खेलना चाहती थी और मेरा नियम बना था हर महीने एक खिलौना निकलेगा | क्योकि बच्चे के लिए एक खिलौने की आयु अधिकतम २०-२५ दिन होता है उसके बाद उससे बोर हो कर भूल जाता है और नये की मांग करता है एक साथ सब दिया तो २५ दिनों में सब से बोर | उन्हें बहलाने के लिए उन्हें काम में उलझने के इरादे से उन्हें कहा सभी खिलौने बेडरूम में लाओ बारी बारी , उसे करने के बाद जाओ अब स्टूल लाओ , चलो अब मै स्टूल पर चढ़ती हूँ एक एक खिलौना मुझे दो ऊपर रख दू , एक जो पसंद है उसे रहने दो | दो तीन खिलौने देने के बाद उन्होंने मुझसे कहा , क्या तुम मेरी स्टेप मम्मी हो | कानो में पिघला शीशा डाल देना , दिल में जहर बुझा खंजर घोप देना जैसी बाते सुन रखी थी महसूस उस दिन पहली बार किया था | इसे अतिश्योक्ति न समझे मुझे लगा जैसे मुझे चक्कर आ रहे है और मैंने टेक न लिया तो स्टूल से गिर पड़ूँगी | निचे उतरी और बेटी को गले लगाते फिर से पूछा क्या कहा बेटा और उसने बात दोहरा दी | जैसा की हर माँ का ख्याल होता है मेरा बच्चा दुनिया का सबसे मासूम बच्चा है और लोगो से ये देखा नहीं जाता और वो उसे गलत बाते सिखा कर उसे बिगाड़ते है और माँ से उसके रिश्ते ख़राब करते है वही मैंने भी सोचा  | तुम्हे ये किसने सिखाया की मै तुम्हारी स्टेप मम्मी हो | तो तुम मुझसे इतना काम क्यों करवा रही हो सिंड्रेला और स्नोवाइट की स्टेप मॉम की तरह  |

                                                                  इन बच्चो के लिए बनी प्यारी प्यारी राजकुमारियों के कहानियों से भी हम बच्चो को कुछ गलत सीखा सकते है उनमे कोई पूर्वाग्रह भर सकते है ऐसा तो सपने में भी नहीं सोचा था | ऐसे ही जाने अनजाने हम सभी अपने दिलो दिमाग की सारी बुराइयाँ सारे गलत विचार , पूर्वाग्रह अपने अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए दे देते है | जब कहानियां सुनाते है तो बुरे पात्रों को और बुरा बताते समय उसे अपनी भावभंगिमाओं से और डरावना बुरा बनाते है मन में भरा पूरा जहर उगल देते है |  खुद हम कितना ग्रसित है इन ऊलजलूल विचारो से , जीवन में कभी किसी सौतेली माँ  से नहीं मिली हूँ , सौतेले मामा है लेकिन उनसे रिश्ते सामान्य है , फिर भी खुद के लिए सौतेला सुनना , जहर बुझा लग रहा था | मुझे याद है उसके बाद जब मैंने उन्हें कृष्ण की कहानी सुनाई तो एक बार भी कंस के साथ मामा शब्द नहीं लगाया , क्या पता मामा के लिए कुछ गलत भर दूं  | याद रखिये बच्चो में भरा गया एक गलत विचार , किसी के लिए नफरत , किसी के लिए कोई पूर्वाग्रह एक दिन पलट कर किसी न किसी रूप में आप के ही सामने जरूर आयेगा | खुद को सुधारे न सुधारे विरासत में बच्चो को कुछ ख़राब न दे कम से कम |

रविवार, 10 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 26





पल्लवी त्रिवेदी 
लिखना खुद को ढूँढने जैसा महसूस कराता है हमेशा....कई बार लिखने के बाद खुद को बदला बदला सा पाती हूँ तो कभी अपने अन्दर छुपे हुए जज्बातों का बाहर बह निकलना हैरत में डाल देता है! बदलते मूड के साथ अपने अन्दर बैठे कई इंसानों को महसूस करती हूँ...

मैंने 
पल्लवी त्रिवेदी को हर रंग में देखा है, व्यंग्य, समानुभूति, खानाबदोशी,इश्क़  ... हर कैनवस पर गहरे रंगों में 

अस्सी का दौर और छतों का इश्क 
---------------------------------------
मोहल्लों में प्यार की कितनी सारी कहानियां छतों से शुरू होती हैं !ढाई फीट की एक छोटी सी बाउंड्री वॉल से जुड़ी हुई छतें, आठ फीट की रोड के दोनों ओर टंगी छतें , सुबह शाम की ताज़ा ठंडी हवा में इश्क से महकती छतें , सर्दियों की दोपहरी में किताबों के पीछे से आँखों आँखों में बातें करती छतें, गर्मियों की रातों में साफ़ आसमान में सितारों के नीचे छुप छुप कर एक दूसरे को ताकती छतें !
आज मोबाइल और इन्टरनेट के युग में मुहब्बतें आसान हो गयी हैं ! लेकिन अस्सी के दौर में छतों की मुहब्बतों में आसानी भले न थी , रोमांच भरपूर था !ये वो दौर था जब बातें करना , मिलना इतना आसान न हुआ करता था ! एक मुलाक़ात के पहले महीनों निगाहें आपस में बात किया करती थीं !
"मम्मी ! पढ़ने जा रहे हैं छत पर" मार्च की परीक्षा से पहले की शामों में ६ बजते ही सभी घरों के बच्चे सज-धज कर छत पर पहुँच जाते ! मम्मी भी प्रसन्न कि "कितनी चिंता है मेरे लाल को पढाई की,टोकना नहीं पड़ता! " लडकियां रोज़ नए फैशन के कपडे पहन कर छत पर जाया करतीं ...लड़के भी टिप टॉप रहने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! हाथ में पानी की बोतल,कभी कभी कांच के गिलास में रूह आफ्ज़ा भी छत पर घूम घूम कर ही पिया जाता ! किताब भी एक अतिरिक्त बोझ की तरह हाथ में झूलती रहती !जिनको बगल वाली या सामने वाली छत पर जीने की वजह मिल जाती वे अँधेरा होने तक एक दूसरे को बस बिन कुछ कहे निहारा करते ! जिनके नसीब में थोडा और इंतज़ार बदा होता वे छतों पर घट रहीं प्रेमकथाओं को सिलसिलेवार अपनी मेमोरी में दर्ज करते जाते जिससे अगले दिन दोस्तों पर अपनी किस्सागोई के झंडे गाढ़ सकें ! यूं आधे लोग इश्क फरमाते ...आधे आशिकों के मज़े लेते !कुल मिलाकर किताबें उसी पेज पर हवा खाकर वापस लौट आती !
अब अँधेरा हो गया, नीचे से मम्मी की आवाज़ आने लगी" चलो,नीचे आओ ,नीचे बैठकर पढो"
"हाँ मम्मी, आते हैं,अभी तो दिख रहा है"
और सच भी है,दूसरी छत का सब कुछ दिख रहा होता था ! गोली मारो किताब में लिखे को..कमबख्त कोर्स की किताब को कौन पूछे जब सामने मुहब्बत की किताब खुली हो मुहब्बत की किताब का यही फायदा है...इसके अक्षर पढ़ने के लिए उजाले का होना नितांत ग़ैर ज़रूरी है!खैर ज़्यादा देर तक तो माँ को भी बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता, आधे घंटे में नीचे उतरना ही पड़ता !
लेकिन कोई बात नहीं जहाँ चाह,वहाँ राह! अगर प्रेमी प्रेमिका का घर आमने सामने है तो सोने पे सुहागा! गर्मी के दिन हैं तो खिड़की खोलकर पढना तो लाज़मी है भाई...अब इसमें किसी का क्या दोष जो अगला भी खिड़की खोले ही बैठा है दूसरी खिड़की पर चाँद के उगने के इंतज़ार में ! और अगर दोनों में से किसी एक ने पहले खिड़की पर डेरा जमा लिया और दूसरे को आने में १० मिनिट ऊपर हो गए तो ये १० मिनिट तो क़यामत के होते ! जिसने इन दस मिनिटों का लुत्फ़ उठाया है वही इस तड़प को समझ सकता है !यह तय था कि दोनों में से जिसने इंतज़ार किया है वो अगले को ज़रूर तड़पायेगा ,दूसरी खिड़की खुलते ही शिकायत भरी आँखों से एक बार देखकर मुंह फेर लेगा और किताब में सिर घुसा देगा जैसे मरा जा रहा हो पढ़ने को,किताब को भी पता होता है कि शुद्ध नौटंकी कर रहा है! अब अगला तब तक किताब में घुसे सिर को देखता रहेगा जब तक कि सिर ऊपर उठाकर देख न ले...और जैसे ही एक बार नज़र मिली देर से आने वाला कुछ अजीब सा बेचारगी भरा मुंह बनाता जिसका अर्थ होता "प्लीज़ माफ़ कर दो,आगे से ऐसा नहीं होगा" एक बार ऐसा मुंह बनाने से बात नहीं बनती,कम से कम ३-४ बार बनाना पड़ता, तब जाकर दूसरा एक अजीब ऐंठ भरा मुंह बना कर प्रतिक्रिया देता जिसका अर्थ होता कि "ठीक है,ठीक है,इस बार माफ़ किया !अगली बार ध्यान रखना! फिर दोनों खुश होकर मुस्कुरा देते !सुबह के ५ बजे तक इसी प्रकार गहन अध्ययन कार्य चलता ! रात के साथ ही दो खिड़कियों पर प्रेम परवान चढ़ता रहता !
इसी प्रकार पढाई करते करते अब परीक्षा सर पर आ जातीं ! अभी तक तो बात करने का कोई बहाना नहीं था मगर अब काम शुरू होता प्रश्न बैंक, 20 question और गैस पेपरों का ,इनकी अदला बदली से प्रेम का एक नया अध्याय प्रारंभ होता !
खैर परीक्षा हुई,रिजल्ट आया! माता-पिता हैरान "बच्चे ने रात रात भर जाग कर पढाई की फिर भी नंबर इतना खराब" कॉपी जांचने वाला मुफ्त में गालियाँ खाता ,शिक्षा व्यवस्था को भी कोसा जाता ! लेकिन बेटे बेटी को कोई गम नहीं! रिजल्ट चाहे जैसा आया हो....प्यार की गाड़ी तो आगे बढ़ ही जाती !
अस्सी के दौर वाले कितने ही प्रेमी आज एक साथ उन्हीं छतों पर बैठकर अपने बच्चों के साथ शाम की चाय इकठ्ठा पीते हैं , कितने ही उस पुराने मोहल्ले में उसी पुरानी छत पर कुछ वक्त गुज़ारने चले जाते हैं और सामने की ख़ाली छत को एक दबी हसरत से देख वापस लौट आते हैं, कितने ही अब छतवाली को अपने नन्हे के साथ देखकर 'मामा' शब्द से आतंकित होकर पीछे मुड़ जाते हैं और कितने ही उन छतों के किस्सों को फेसबुक पर लिख डालते हैं कि शायद उन सैकड़ों लाइक्स में उस सामने की छत वाले ख़ास नाम का एक लाइक झिलमिला जाए !

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 25




बुलेटिन के कदम हैं फेसबुक के पन्नों पर, सोच रही हूँ, इनका कोई ब्लॉग क्यूँ नहीं है !
शैलजा पाठक, रोजमर्रा के ख्यालों पर शब्दों का दोहर डालते हुए शयद खुद नहीं जानती कि उन्होंने कितने घरों में चिंगारी रखी है !
......... 




जब डर मरने लगे हमें मर जाना चाहिए

सही समय है यही
जब आ जाना चाहिए प्रलय
ढह जाने चाहिए 
मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे
पूरी दुनियाँ एक नदी में तब्दील हो जानी चाहिए
देश धर्म समाज के सभी झंडे
डूब जाने चाहिए
स्कुली बच्चों की आँखों में रेत का बवंडर उठे
वो कुछ न देख पाएं
उनके सवाल के जबाब नही होंगे हमारे पास
हम पूरी तरह तैयार है
जानवर बनने के लिये
हमने इंसान बनने की नाकाम कोशिश की
पर हम हार गए
बहुत सुंदर दुनियाँ को देखने के लिए बाकि बची उमर में
अगर हम अपने बेटे को आग में जलता
अपनी बेटी को गैंग रेप का शिकार होता देखते हैं
हम एक बुजुर्ग की इज्जत तार तार होता देखते हैं
रोज किसान को पेड़ पर झूल जाना देखते है
ये और इससे बहुत ज्यादा
देख सकते हैं
हम ऐसी फिल्मो को रोक कर देख रहे
रिवाइंड किये जा रहे बलात्कार के वीडियो
ठीक गर्दन काटते हाथ का क्लोसप देख सकते हैं
खून के एक एक छीटें गिन सकते हैं
आत्मा को हिला देने वाली चीखो को ईयर फोन लगा कर सुन सकते हैं
हम जानवर से बदतर जानवर हैं
कविता में नही बची कविता
प्रेम मे नही बचा प्रेम
यकीन में बचा है जानलेवा धोखा
धोखे में खून कतल दरिंदगी
इस समय को इतिहास किस नाम से जानेगा
डूब मरने को कम है पानी
ये झंडे और दंगे का देश है
यहाँ सबके तलवार में धार है
अब इंसान बीमार है
आग लगे ऐसे समाज को
बज्जर पड़े ऐसी धरती पर
जन्म न ले कोई अब
जो बचे हैं वो सब गर्दन झुका लें
उनके पास आरी है तलवार है कुल्हाड़ी है
वो आग के कारोबारी है
कल किसी और की बारी थी
आज हमारी बारी है...

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 24



सच  ... कड़वा हो या मीठा, सच है क्या ?
वह जो बोल दिया गया या वह जिसमें कुछ कतरे हलक में रह गए, या वह जो दीवारों में चुन दिया गया, जो सुरंग से निकल गया किसी और देश में अजनबी की तरह !
क्या सच में सच लिखा होता है चेहरे पर ? 
और  ... वाकई जो पढ़ लिया गया, वह सच है !
मेरा मानना है कि सच एक लुप्त गंगा है, जब तक लौटती है, कितने मौसम, कितने अर्थ बदल जाते हैं !!!

स्वप्न मेरे ... दिगम्बर नासवा जी का ब्लॉग 

खोलते हैं आज इस पाण्डुलिपि को 



बिन बोले, बिन कहे भी कितना कुछ कहा जा सकता है ... पर जैसा कहा क्या दूसरा वैसा ही समझता है ... क्या सच के पीछे छुपा सच समझ आता है ... शायद हाँ, शायद ना ... या शायद समझ तो आता है पर समय निकल जाने के बाद ...   

एक टक हाथ देखने के बाद तुमने कहा 
राजा बनोगे या बिखारी

वजह पूछी
तो गहरी उदासी के साथ चुप हो गईं
और मैंने ...
मैंने देखा तुम्हारी आँखों में 
ओर जुट गया सपने बुनने

भूल गया की लकीरों की जगह
हाथों का कठोर होना ज्यादा ज़रुरी है
सपनों के संसार से परे
एक हकीकत की दुनिया भी होती है
जहाँ लकीरें नहीं पत्थर की खुरदरी ज़मीन होती है

जूते पहनने के काबिल होने तक
नंगे पाँव चलना ज़रूरी होता है
गुलाब की चाह काँटों से उलझे बिना परवान नहीं चढ़ती  

ये सच है की सपनों का राजकुमार
मैं कभी का बन गया था
आसान जो था
नज़रें बंद करके सोचना भर था
पर भिखारी बने बिना भी न रह सका
(तुम्हारी तलाश में ठोकरें जो खाता रहता हूं)

सच है ... हाथ की रेखाएं बोलती हैं  ...

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 23




सबकुछ कितना निरर्थक लगने लगा है 
कितने एकाकी हो गए हैं व्यस्त होकर हम 
माता-पिता ने पढ़ाया 
खूब नाम कमाओ 
हर ऊंचाई को पाओ 
ऊंचाई पर गए 
तो वे नीचे रह गए 
अब शिकायतों का समंदर है आगे 
... !!!

डॉ राजीव जोशी से मिलिए 

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फ़िज़ूल ग़ज़ल
**********

बच्चे घरों के' जब बड़े जवान हो गए
तब से बुजुर्ग अपने बेजुबान हो गए

कुदरत को छेड़ कर हमें यूँ क्या मिले भला
खुद ही तबाह होने का सामान हो गए

देखो सियासतों का रंग क्या गज़ब हुआ
जितने भी' थे' शैतान, वो शुल्तान हो गए

यूँ तो किसी भी हुक़्मराँ पे है यकीं नहीं
अच्छे दिनों की बात पे क़ुर्बान हो गए

कहते थे' दिखावा जिन्हें मेरी गली के लोग
मेरे उसूल ही मेरी पहचान बन गए

कुछ भी नहीं कहा है मगर देख भर लिया
खुद ही की' नज़र में वो पशेमान हो गए

जब से तुम्हारा साथ मुझे मिल गया सनम
ज़िन्दगी के रास्ते आसान हो गए।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 22




मेरा फोटो

ख़्वाबों, ख्यालों की तहरीरें लिखी जाती रही हैं, लिखी जाती रहेंगी 
यादों की पोटली से कुछ ख़ुशी, कुछ उदासी निकलती रहेगी  ... 

आज हैं हमारे साथ गिरीन्द्र नाथ झा 

अनुभव: यादों की पोटली



 झिंगुर की 'झीं-झीं'  और गिरगिट की 'ठीक-ठीक' आवाज़ को भीतर में छुपाए चनका में हूं। शांत रात। ऐसी रात के लिए अक्सर इस ठिकाने में पहुँच जाता हूं। लालटेन की रौशनी में मन के अंधेरे में झाँकता हूं तो सुनता हूं एक आवाज़ -  "पापी कौन बड़ो जग मौसे, सब पतितन में नामी..." । भीतर की यह आवाज़ मन को धो देती है।  गाम का बूढ़ा मोती हर मुलाक़ात में पूछता है सूरदास को पढ़ें हैं ? उसका सवाल विचलित करता है। रात की बातें करते हुए देखिए न सूरदास आ गए मन में। बादल घुमर रहे हैं। आसमान में चाँद होगा शायद लेकिन दिख नहीं रहा है। मकान के चारों ओर खेत में धान के नन्हें पौधे हैं। बारिश की आश में हैं सब बच्चे। खेत भी रात के अंधेरे में ख़ूब नाचता है। बचपन में सलेमपुर वाली दादी इन्हीं खेतों की कहानी सुनाती थी। कथा की शुरुआत में कोई रानी आती थी पायल में और खेत में ख़ूब नाचती थी। मेरी यादों की पोटली से अक्सर सलेमपुर वाली निकल आती है।  उस बूढ़िया ने बाबूजी को गोदी में ख़ूब खिलाया था और बाद में मुझे भी। गाम की रात में वह बहुत याद आती है। जीवन के प्रपंचों  के बीच जो कथा चलती है उसमें ऐसे चरित्रों को सहेज कर रखता हूं। काश ! बैंक में ऐसी स्मृतियों के लिए भी लॉकर होता ! किसी पूर्णिमा की रात मैं निकल पड़ता हूं पश्चिम के खेत। वहाँ एक पुराना पेड़ है पलाश का। साल के उन दिनों जब वह फूल से लदा होता है, उसे निहारता हूं। उस फूल में आग की लपट दिखती है, शायद सुंदरता में 'जलना' इसी को कहते हैं। बग़ल में एक बड़ा  सा पोखर है। उसमें चाँद की परछाई निहारता हूं। रंग में सफ़ेद ही पसंद है। सब कहते हैं कि उमर से पहले बूढ़े हो चले हो !! लेकिन कैसे बताऊँ सफ़ेद रंग ही मेरे लिए बाबूजी हैं। बाबूजी की सफ़ेद धोती और कुर्ता मेरे मन के लॉकर में सुरक्षित है। मैं इस रंग में उन्हें ढूँढता हूं। जब पहली बार लिखकर पैसा कमाया था तो उनके लिए सफ़ेद रंग  का एक गमछा और शॉल लाया था। बाबूजी ने उस शॉल को संभाल कर रखा, उनकी आलमारी में आज भी है। आज की रात ऐसी ही कई यादें बारिश की बौछार की तरह भिंगा रही है। मेढ़क की आवाज़ भी आज सुरीली लग रही है। घास-फूस का एक बड़ा  सा घर था इस अहाते में, मैंने बाबूजी को वहीं पाया था। माँ का भंसा घर और मिट्टी का एक चूल्हिया और दो चूल्हिया ! सब याद आ रहा है। दीदी सबका कमरा, जहाँ लकड़ी का एक आलमारी था और माटी  का रेख। हर चार साल पर उस फूस  के घर का घास (खर) बदला जाता था। हम यादों में क्या क्या खोजने लगते हैं ! अभी वह लकड़ी का बड़ा सा हैंगर याद  आ रहा है, जिसमें पित्तल का सुनहरा हूक लगा था, बाबूजी का कुर्ता वहाँ टाँगा जाता था। साँझ से रात की तैयारी और दोपहर से साँझ की तैयारी होती थी। चूल्हे की राख से लालटेन और लैम्प का शीशा चमकाया जाता था। यह सबकुछ खोज रहा हूं तो मन के भीतर अचानक रौशनी दिख जाती है। नहर से राजदूत की आवाज़ आने लगती है। बाबूजी आ रहे हैं, दुआर पर लोग हैं, जिन्हें बात करनी है। अचानक बाहर देखता हूं तो कोई नहीं ! कोई आवाज़ नहीं। सब याद की किताब में, पन्ना दर पन्ना आज पलटना है, पंखुड़ी के लिए। उसे भी एकदिन गाम को जीना है...

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 21



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ज़िन्दगी की कथा बांचते बाँचते, फिर! सो जाता हूँ। अकेले। भटकने को योनि दर योनि, अकेले। एकांत की तलाश में!




आज अखबार में डा० बशिष्ठ नारायण सिंह के जन्मदिन की खबर पढ़कर नयन आर्द्र हो गए. बालपन में होनहार किरदारों के बारे में जो जानकारी मिलती है वह स्मृति पटल पर सदैव सजीव रहती है. उसमे कोई ऐसा व्यक्तित्व जो महानायक बनकर आपके दिलो दिमाग पर छा जाए, जिसकी अभ्यर्थना में आप अपनी निश्छल भावनाओं के समस्त प्रसून समर्पित कर दें और समय के प्रवाह में वही व्यक्तित्व कालसर्प के विषैले दंश का आखेट बन एक सामान्य सी जिन्दगी भी जीने को मुहताज हो जाय तो नियति की इस निष्ठुरता पर दृग जल का छलक  जाना अस्वाभाविक नहीं! बालपन की ड्योढ़ी पार कर  कैशोर्यावस्था के आलिंगन में समाने का ही तो समय होता है दसवीं पास करके ग्यारहवीं (तब इसे हम आई,एस,सी , यानी इंटरमीडिएट ऑफ़ साइंस कहते थे ) कक्षा में जाने का. ये वो वय होती है जब बड़े आपको बड़े नहीं मानते और छोटे आपको छोटे नहीं मानते. उम्र की ये त्रिशंकु अवस्था अदम्य ऊर्जा, जीवंत जीवट और जिज्ञासा का स्वर्ण काल होती है.जीवन मूल्यों के सही आकार लेने का काल होता है यह.  हमारा नामांकन पटना साइंस कॉलेज में हुआ था. कोआर्डिनेट ज्योमेट्री की कक्षा थी. ड़ा० डी पी वर्मा आये थे क्लास लेने. उन्हें अनुशासनहीनता का आभास हुआ. विद्वान् प्रोफेसर भावुक हो गए.
इस कथ्य को आगे बढाने से पहले आपको थोड़ा परिचय पटना साइंस कॉलेज का देना भी अपेक्षित होगा. १९२७ में पटना विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय के रूप में स्थापित पटना साइंस कॉलेज की नींव भारत के तत्कालीन वायसराय  लार्ड इरवीन ने  १५ नवम्बर १९२८ को डाली. यह महाविद्यालय अभी हाल के दशकों तक एक विश्व प्रसिद्द उत्कृष्ट विज्ञान संस्था के रूप में जाना जाता था, जहां बिहार के सुदूर गाँव की अनोखी प्रतिभाएं अपनी शैक्षणिक छवि तराशती थी. यहाँ आई एस सी में नामांकन हो जाना गौरव की बात मानी जाती थी.
असाधारण कोटि की प्रतिभा से संपन्न शिक्षकों की टोली स्नाकोत्तर से आई एस सी तक की कक्षाएं लेती थी. इसलिये छात्रों को अपनी प्रवेशिका स्तर के पठन पाठन विशेषकर विज्ञान की शिक्षा के शैशव काल में ही ऐसे कुशल शिक्षा शिल्पियों से तरासे जाने का सौभाग्य मिलता जो उन्हें समाज के भविष्य की अमूल्य धरोहर के रूप में गढ़ देता. फैराडे, कैवेंडिश, न्यूटन, रामानुजम औए सी वी रमण - ये पांच छात्रावास थे जो अपने अन्तेवासियों में अपने नाम के अनुरूप संस्कार गढ़ने का पर्यावरण सतत प्रस्तुत करते. मै  इंटर प्रथम वर्ष  (आज की ग्यारहवीं कक्षा) में रामानुजम भवन और द्वितीय वर्ष (बारहवीं कक्षा) में न्यूटन हाउस का अन्तेवासी था. न्यूटन हाउस में मै काशीजी के मेस में भोजन करता था. काशीजी बड़े चाव से छात्रों को उनके बेड के पूर्वज छात्रों की कहानी सुनाते. इस प्रक्रिया में जाने अनजाने संसकारों का संचरण पीढ़ी दर पीढ़ी होता रहता और प्रत्येक अन्तेवासी अपने बेड के गौरवशाली इतिहास की गरिमा बढाने की जुगत में सतत जुटा रहता. उस जमाने में कोचिंग संस्थानों की कुकुरमुत्ता संस्कृति का उद्भव नहीं हुआ था. शिक्षक और छात्रों की पारस्परिक प्रतिबद्धता अपनी पराकाष्ठा पर थी. प्रति वर्ष यह कॉलेज अकेले करीब  ६० से ७० छात्रों को देश के प्रतिष्ठित आई आई टी संस्थानों में भेजता.
अब हम इस संक्षिप्त परिचय के बाद उस घटना पर आते है जिसका हम जिक्र कर रहे थे. डी पी वर्मा गणित के उद्भट विद्वान् थे . उनके छोटे भाई, एच सी वर्मा, भी अभी नए नए फिजिक्स के लेक्चरर बने थे जो आजकल आई आई टी कानपुर में प्रोफेसर हैं तथा जिनकी फिजिक्स की पुस्तक पुरे देश के लडके आज कल पढ़ते हैं. तो, हमारे विद्वान् प्रोफेसर जैसे ही क्लास में थोड़े विलम्ब से पहुंचे उनकी नज़र ब्लैक बोर्ड पर पड़ी जिसपर किसी छात्र (वो छात्र भी आजकल आई आई टी कानपुर में प्रोफेसर है!) ने शरारत में उनके विलम्ब पर अपनी व्यग्र टिपण्णी दर्ज कर दी थी:- "This class will not take place due to sudden demise of our beloved coordinate teacher" अर्थात, 'कोआर्डिनेट ज्यामिति के हमारे प्रिय शिक्षक के आकस्मिक निधन के कारण यह कक्षा नहीं लगेगी.' और इससे पहले कि इस टिपण्णी को मिटाया जाता, प्राध्यापक महोदय का आकस्मिक आगमन हो गया ! सर अपनी आदत के अनुरूप हाथ में डस्टर उठा कर ब्लैक बोर्ड की ओर मुड़े और जडवत हो गए. सारे क्लास को तो मानो काठ मार गया.और फिर उनकी आहत भावनाओं की गंगा में वेदना की सरस्वती और करुणा की यमुना ने मिलकर जो त्रिवेणी धार बहायी वो छात्रो के नयनों को बहुत देर तक आप्लावित करती रही. रुंधे स्वर में कक्षा ने गुरु से क्षमा याचना की. गुरु के वात्सल्य का गौरव भी हिमालय की तरह उदात्त था. उसी 'एक दूसरे के आंसू पोछने' के भींगे माहौल में गुरु ने  छात्रों को उनकी विरासत की महिमा का भान दिलाने के क्रम में अपने पुराने छात्र वशिष्ठ की कहानी सुनायी और हम सभी छात्र पुरी तन्मयता से उस कथा गंगा में डूबकी लगाते रहे.
वशिष्ट नारायण सिंह ने अपने बैच में मैट्रिक की बोर्ड परीक्षा में प्रसिद्द नेतरहाट विद्यालय (मेरे अनुज यहाँ के छात्र रह चुके हैं) से  बिहार में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था . जहां तक मुझे याद है , उनके  ८०३ अंको का कीर्तिमान १९७८ तक रहा था. प्रथम वर्ष में ही उनकी चमत्कारी प्रतिभा से शिक्षकों की आँखे चौधियाने लगी. नाथन-बासु-आइन्स्टीन  थ्योरी  की प्रसिद्धि वाले प्रसिद्द वैज्ञानिक  ड़ा० नागेन्द्र नाथन साइंस कॉलेज के प्राचार्य थे . देवकांत बरुआ बिहार के राज्यपाल और पटना विश्वविद्यालय के चांसलर थे. विशेष व्यवस्था के तहत वशिष्ठजी को इंटर प्रथम वर्ष में ही बी एस सी हौनर्स  की परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गयी . प्रोफेसर वर्मा अपनी आँखों में एक अद्भुत चमक समेटे कक्षा में वशिष्ठजी के  व्यवहार का बखान कर रहे थे . वह छोटी छोटी गलतियों पर उग्र हो टोकाटाकी करते. गणित की किसी समस्या को सुलझाने का उनका अपना एक गैर पारंपरिक स्वतंत्र तरीका होता तथा वह समस्या के समाधान के लिए एक से अधिक रास्तों से एक साथ प्रयाण करते. उनकी सूझ विलक्षण होती तथा एक अलग प्रकार का नयापन होता.
 इस अर्जुन को एक द्रोणाचार्य प्रोफेसर केली के रूप में मिला जो इन्हें कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय ले गए. वहां 'साइकिल वेक्टर स्पेश थ्योरी' पर पीएचडी की और वाशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बने. नासा में काम करने का मौक़ा मिला. अमेरिका सरकार ने रोकने की कोशिश की तो भारत लौट आये. यहाँ आई आई टी कानपुर, , टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और भारतीय सांख्यिकी संस्थान जैसे प्रसिद्द संस्थानों में काम किया. वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत को चुनौती दी थी. उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था. सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था. शादी भी वन्दना रानी के साथ हो गयी . लेकिन नियति की निष्ठुरता ने इस गणित नायक को धर दबोचा . वशिष्ठजी ' सिजोफ्रेनिया' के शिकार हो गए. उनका इलाज़ रांची में चल रहा था. १९८९ में बशिष्ठ्जी अचानक लापता हो गए. १९९३ में सारण के एक कस्बे, डोरीगंज,  में उन्हें भिखारियों के झुण्ड में पत्तल चाटते देखा गया, जहां से वापस घर लाया गया. इस कारुणिक प्रसंग को सुनकर हमें वाकई उनकी भाभी प्रभावतीजी  की बात कचोटती है कि:-
"हिंदुस्तान में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है. लेकिन अब हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है. बाक़ी तो यह पागल खुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया."

वशिष्ठजी हाथ में पेंसिल लिए दीवारों में हलके से कुछ बुदबुदाते हुए लिखते नज़र आते. चिडचिडापन ने उनके स्वभाव में घर बना लिया था. २००४ मे मै प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली सरकार में ' मानव व्यवहार एवं सम्बद्ध विज्ञान संस्थान' में अधिशासी अभियंता के पद पर पदस्थापित हुआ था. पता चला कि एक साल पहले तक वह वहां इलाज़ के लिए भर्ती थे. मै उस वार्ड की कक्षा में जाता और अपने आदर्श नायक की याद में कुछ नम पल बिताता. उनकी सेवा मे लगे वार्ड बॉयज से उनकी हरकतों के बारे में कुतूहल से सुनता.. लेकिन उनको समीप से दर्शन करने की बलवती इच्छा फलवती हुई कुछ तीन एक साल पहले पटना के रविन्द्र रंगशाला में आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मलेन में, जहां उनको सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था. साथ में मालिनी अवस्थी, भरत व्यास, मनोज तिवारी  और अन्य लोग भी थे . पिछली पंक्ति में मेरे महानायक एक अबूझ  पहेली से अपने भाई के साथ निर्भाव रूप से खड़े थे. बिखरे बाल, चिथड़ी दाढ़ी,, क्लांत, बुझे बुझे, खोये खोये ! किन्तु, चहरे पर तैरती एक रहस्मय दार्शनिकता , मानो इस ब्रह्मांड में छिपे किसी गुह्यातगुह्यतम  आख्यान का मौन संधान कर रहे हों ! गणित की एक अबूझ पहेली !  मैं मंत्रमुग्ध ,हतशून्य निगाहों से उन्हें निहारे जा रहा था और मेरे कानों में अपने भाव विह्वल  प्रोफेसर वर्मा की आर्द्र वाणी फिर से गूंजने लगी थी............!  

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 20



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पूजा उपाध्याय, शब्द शब्द भावनाओं की लहरों के संग पाठकों के बीच बहती रही हैं, इस बात से बेपरवाह कि कौन लहरों के सौंदर्य में आकंठ डूबा है, कौन लहरों की भाषा नहीं समझता  ... वह अपनी लहरों में खुद ही एक दुर्लभ मोती बन कर अठखेलियां करती हैं  ... 




जो लोग तुम्हें ज्ञान देते हैं कि दुःख इमैजिनेरी होता है उन्हें तुम खींच के थप्पड़ दिया करो। नहीं सच में। ये ऐसी चीज़ है कि ख़ुद समझ में आती है नहीं और चल देते हैं दुनिया का ज्ञान देने। वे गाल सहलाते भौंचक सामने खड़े हों, तब उनसे पूछो...लहरता हुआ गाल इमैजिनेरी है?

दुनिया के दो हिस्से होते हैं। एक सच की दुनिया और एक ख़यालों की दुनिया। अधिकतर लोगों के लिए सच की दुनिया काफ़ी होती है। वे उसमें जीते मरते, इश्क़ करते, परेशान होते जीते रहते हैं। वे कभी कभी ख़यालों की दुनिया में थोड़ी डुबकी लगाते हैं...कि जैसे ऐश्वर्या मेरे साथ डेट पर चल ले या कि कर्ट कोबेन ज़िंदा होता या कि निर्मल वर्मा को कोई चिट्ठी लिख रहे होते...इतना भर। कभी कभी। वे अपनी ज़िंदगी में व्यस्त रहते हैं...ख़ुश या दुखी, जो भी हों, इसी दुनिया के अंदर रहते हैं। 

एक दुनिया होती है ख़यालों की। बड़ी सम्मोहक, बड़ी तिलिस्मी, बहुत ख़ूबसूरत। ये दुनिया सबको अच्छी नहीं लगती कि ये दुनिया ख़ुद ही बनानी पड़ती है। तो ये दुनिया वैसी ही होगी जैसी आप इसे बना पाएँगे। इस दुनिया के शहर, इस दुनिया की सड़कें, इस दुनिया के रंग...सब ख़ुद से रचने होते हैं। एक बुनियादी ढाँचा बनाना होता है, फिर सब कुछ आसान होता है। 

ये दुनिया अक्सर पनाह होती है लेकिन कभी कभी क़त्लगाह भी होती है। मक़तल, you know. जहाँ क़त्ल किए जाते हैं। इस दुनिया के रंग तब दिखते नहीं कि सब स्याह होता है। रोशनी नहीं होती। धूप नहीं होती। 

कुछ लोगों के लिए ये दुनिया भी उतनी ही सच होती है जितना तुम्हारे गाल पर लहरता हुआ थप्पड़। इसमें जाना आना अपने बस में नहीं रहता। सुबह उठ कर कौन से ख़याल अपनी गिरफ़्त में ले लेंगे, ये पहले से तय करना मुश्किल होता है। हम कभी नहीं जानते कि सुबह सुबह सूयसाइडल क्यूँ होते हैं। रात और भोर के बीच, सपनों के उस आयाम से होकर आने के दर्मयान क्या बदल जाता है।

ज़िंदगी में सब कुछ ख़ूबसूरत होगा या कि वैसा ही होगा जैसा एक दिन पहले था। एक लम्हा पहले था लेकिन ख़याल ने अगर धावा बोल दिया तो फिर इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सच की दुनिया कैसी है। कि कितना प्यार है दिल में। कि कितने लोग हैं जो आपकी जान की सलामती की दुआ माँगते हैं। हम किसी इमैजिनेरी दुःख में डूबते जाते हैं। हमें वहाँ से कोई बचा कर नहीं ला सकता। वो दुःख भी अपने सीने पर ही झेलना होता है। आत्मा में चुभता दुःख कोई। टीसता ज़ख़्म कोई। किसी किरदार के हिस्से का दुःख लिखने के पहले उसे जीना होता है हर साँस में। 

ये दोनों दुनियाएँ अलग अलग दिशा में हैं और कभी कभी ये दुविधा में डाल देती हैं। एक चुनने को विवश करती हैं। एक प्रेम से दूसरे प्रेम तक जाने के रास्ते में एक लम्हा ऐसा होता है जब आप दो व्यक्तियों से प्रेम में होते हैं। एकदम बराबर के प्रेम में। यहाँ से चुनाव हो जाता है। आप या तो पहले प्रेम तक लौट आते हैं या कि दूसरे प्रेम तक चले जाते हैं। मगर वो एक बिंदु कि जब आप दो व्यक्तियों के प्रति बराबर प्रेम में होते हैं, वो लम्हा घातक होता है। वहाँ से आपका वजूद दो बराबर के टुकड़ों में बंट जाता है और आप कितना भी कोशिश कर लें, जो छूट गया है उसके दुःख से ख़ुद को उबारना नामुमकिन होता है। फिर वक़्त का मरहम होता है और धीरे धीरे जो छूट गया है उस दुःख के तीखे किनारे घिसता रहता है कि आप उसके साथ जीने की आदत डाल लें। दुःख कहीं जाता नहीं। हम उसके साथ जीना सीख लेते हैं। सच और कल्पना में ऐसी ही जंग छिड़ती है, कि आप दोनों के साथ नहीं रह सकते हो। एक चुनना ही होगा। हम जो भी चुनते हैं, दूसरी दुनिया दुखती है। 

हम नहीं जानते कि किसी दिन सुबह उठते ही पहला ख़याल ख़ुदकुशी का क्यूँ आता है। ख़यालों की दुनिया में किस पुराने दुःख ने धावा बोला है। मैं कभी कभी वाइटल बीइंज़ के बारे में भी पढ़ती और समझने की कोशिश करती हूँ। सोते हुए हमारा मन कई आयामों में घूमता है। जाने कहाँ से कोई नेगेटिव सोच अपने साथ बाँध लाता है। ऐसे में कई बार हमारे वातावरण पर निर्भर करता है कि हम उस ख़याल से लड़ सकते हैं या समर्पण कर देते हैं। जिन दिनों धूप निकलती है और आसपास कुछ दोस्त होते हैं, ऐसे किसी ख़याल से लड़ना आसान रहता है। लेकिन जिस दिन धूप नहीं रहती और दोस्तों से बात किए हुए बहुत वक़्त हुआ रहता है...वैसे में ऐसा ख़याल एकदम पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। 

मुझे दवाइयों और डाक्टर्ज़ पर भरोसा नहीं है। सर्दी, खाँसी बुखार तक में अधिकतर मुझे दवा खाना पसंद नहीं है...तो ऐसे में मन की परेशानी के लिए कौन सा डॉक्टर खोजने जाएँ, कहाँ? पागलखाने वाले डॉक्टर मुझे समझ नहीं आते। कि मुझे लगता है सायकाइयट्री पूरी की पूरी दूसरे लोगों को स्टडी करके डिवेलप हुयी है लेकिन लोगों को किसी जेनरल खाँचे में बाँटा ही नहीं जा सकता। हर इंसान की सोच, दूसरे इंसान से इतनी अलग होती है...हर स्टिम्युलुस के प्रति उसका रीऐक्शन एकदम अलग। तो जो बात दुनिया के हज़ार और लोगों के लिए सही हुयी हो, हो सकता है मैं अपवाद हूँ...मुझपर वो चीज़ लागू ना हो। ऐसे में मुझे स्पेसिफ़िक, एक केस की तरह तो पढ़ा नहीं जाएगा। मैं कितना ही बताऊँ किसी को अपनी ज़िंदगी के बारे में। पिछली बार जिस सायकाययट्रस्ट के पास गयी थी, उसकी उल्टी-पुल्टी सलाह के कारण उसी शाम जान ही दे देती, लेकिन दोस्तों ने बचा लिया। 

तो इस इमैजिनेरी दुनिया के बेहद रियल दुखों का इलाज किसके पास है? ज़ाहिर है। दोस्तों के पास। लेकिन सवाल ये है, कि दोस्तों के पास वक़्त है?

रविवार, 3 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 19




प्राकृतिक, कृत्रिम
हास्य, रुदन 
जीवन - मृत्यु  ... इन सबके बीच अंदर का मौसम होता है, जिसे जीते हुए इंसान कलम उठाने पर विवश हो जाता है  ... 
आइये शिवनाथ कुमार के इस आंतरिक मौसम से गुजरें 
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जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे



लगा सुनाने बारिश का पानी
भीत छुपी थी कोई कहानी
बहने लगा है संग संग जिसके
यादें जो हो चुकी पुरानी
छप्पक छईं पानी में उतरा कोई  
लौट आई फिर अल्हड़ जवानी 
रूठे पिया को चला मनाने, भीग रहा मन मीत वही ढूंढें 
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 

धमक धमक बादल हैं गरजे
चमक चमक बिजली है चमके
काली चादर ओढ़े अम्बर
खोल रहीं हैं मन की परतें 
सिली सिली सी दिल की अंगराई
चेहरे पर इक मुस्कान है लाई
पिया के होने का अहसास, धरती अम्बर इक डोर में गूंदे   
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 

डाली डाली, पत्ता पत्ता 
वसुधा का अंग अंग है भीगा
काली कजरारी आँखों में
प्रेम का सुन्दर रंग है दिखा
सुर्ख भीगे अधरों पर 
नाम प्रीत का आकर टिका
अम्बर सा विस्तार पिया, साकार होती दिल की उम्मीदें  
जाग उठा अंदर का मौसम, अब तक था जो अँखियाँ मूंदे 

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 18



युग दृष्टि और उसे परखती आशीष जी की कलम  ... 

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सुनो तुम ईवा हो 
कभी सोने के रंग जैसी 
तो कभी फूलों की उमंग जैसी 
कभी कच्ची मखमली घास की छुवन
युग ,संवत्सर , स्वर्ग और भुवन 
तुम्हारा शरीर क्या है
दो नदियाँ मिलती है अलग होती है
तुम भाव की नदी बनकर धरती की माँझ हो
भाव की देह हो भाव का नीर हो
भाव की सुबह और भाव की सांझ हो
तुमने सुना है देह वल्कल क्या चीज़ है ?
तुम्हारे दोनों ऊरुओं के मध्य
घूमता है स्वर्णिम रौशनी का तेज चक्र
उत्ताप से नग्न वक्ष का कवच
मसृण और स्निग्ध हो जाता है
तुम रति हो फिर भी
तुम्हारी भास्वर कांतिमय देह
किसी कामी पुरुष की तरह स्रवित नहीं होती
सुनो ! आकाश भी छटपटाता है
धरती बधू को बाँहों में घेरने के लिए
वधू -धरित्री की भी ऐसी आकांक्षा होगी
नहीं पता मै लिख पाया या नहीं
लेकिन ये है इह मृगया
जाने गलत है या सही .


उपासना सियाग और उनकी नयी उड़ान 

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वजूद स्त्रियों का 
खण्ड -खण्ड
बिखरा-बिखरा सा। 

मायके के देश  से ,
ससुराल के परदेश में 
एक सरहद से 
दूसरी सरहद तक। 

कितनी किरचें 
कितनी छीलन बचती है 
वजूद को समेटने में। 

छिले हृदय में 
रिसती है 
धीरे -धीरे 
वजूद बचाती। 
ढूंढती,
और समेटती। 

जलती हैं 
धीरे-धीरे 
बिना अग्नि - धुएं  के
राख हो जाने तक।  

धंसती है 
धीरे -धीरे 
पोली जमीन में ,
नहीं मिलती ,
थाह फिर भी 
अपने वजूद की। 

नहीं मिलती थाह उसे 
जमीन में भी ,
क्यूंकि उसे नहीं मालूम 
उसकी जगह है 
ऊँचे आसमानों में। 

इस सरहद से 
उस सरहद की उलझन में 
 भूल गई है 
अपने पंख कहीं रख कर। 

 भटकती है 
वह यूँ ही 
कस्तूरी मृग सी। 

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

2017 का अवलोकन 17



अंजू शर्मा को पढ़ा है, अक्सर एक अंतराल पर  ... लेकिन पढ़ा है, ब्लॉग पर, फेसबुक पर , कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनका एक प्रभाव है, निःसंदेह स्वयंसिद्धा की तरह !






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"गामे की माँ,  कुछ सुना तूने, पाई बीमार है बड़ा....." 

ईश्वरी देवी ने अपने सिर की सफ़ेद चुन्नी संभालते हुए, घुटनों पर हाथ रख, मंजी पर बैठते हुए ऐलान किया तो मंजी पर बैठी गामे की माँ चौंक गई!

"क्या कह रहे हो भेन जी....पाई बीमार है?  की होया पाई नूं?"  गामे की माँ ने जरा परे सरकते हुए ईश्वरी देवी के बैठने के लिए जगह बनाते हुए कहा!

वहीं समीप ही एक कोने में पीढ़ा डालकर बैठी, सूरज को पीठ दिखा धूप सेंकते हुए माला फेरती सोनबाई ने भी पीढा आगे सरकाकर वार्तालाप में अपनी रूचि दर्शायी! गामे की माँ के अनवरत चलते हाथ ठिठक से गए और कब से युद्धरत ऊन-सलाइयों ने मानो राहत की साँस ली!  सामने के दरवाजे पर खड़ी सूखे तौलिये समेटती विमला देवी और अचार की बरनी संभालती भागवंती भी आकर यही सवाल पूछने लगीं तो ईश्वरी देवी ने सस्पेंस से पर्दा उठाया!

“रात मेरे पुत्तर जीते को बताया किसी ने!  जीते का वहां आना जाना है बस्ती में। बीमार तो पहले से चल रहा था, अब उमर भी हो गई, गामे की माँ! हम सब आगे पीछे के हैं! ज्यादा दिन नहीं हैं,  बस जी, चलाचली का टैम समझो!" अपने ठंड से जमे घुटनों को सहलाते हुए, गहरी सांस भरकर वे बोलीं "क्या कहते हो, पता कर आयें एक बार!  फिर रब जाने मिलना हो के ना हो!"

जाड़ों की इस उनींदी सुबह के बीतने पर गली के एक कोने में धूप सेंकती वृद्धाओं के इस समूह के लिए पाई की अहमियत गली के एक मामूली चने-मुरमुरे बेचने वाले वेंडर से कहीं अधिक थी! नई पीढ़ी शायद इस चिंता में इस तरह शामिल न हो पाती पर उन सभी वृद्धाओं ने उदास मन से गामे की माँ की बात पर सहमति की मुहर लगा दी! 

जीवन के इस संध्याकाल में घुटनों और जोड़ों के दर्द से व्यथित, अशक्त झुकते शरीर, कमजोर चश्मा लगी या मोतियाबिंद से धुंधलाई आँखों,  झुर्रियों से भरे चेहरों और सन से सफ़ेद बालों वाली इस पीढ़ी की मेहनतकश जवानी का सूरज तो कब का डूब चुका था और 'चलाचली की बेला' शब्द उनके बीच इस गहराई से पैठ बना चुका था कि अब किसी की बीमारी की खबर उन्हें अलविदा की आहट के समकक्ष सुनाई पड़ती! 'बिछड़े सभी बारी-बारी' की तर्ज पर पुराने साथी साथ एक-एककर साथ छोड़ रहे थे और अपने पीछे छोड़ जाया करते थे यादों का अनमोल, न चुकने वाला खज़ाना! उन्हें लग रहा था, उसी कड़ी में शायद पाई की बारी आ गई थी!  उम्र के उस धरातल पर साथ खड़े हुए उन्होंने बीते वक़्त को वहीं कहीं साथ खड़े पाया!

हिंदी का भाई शब्द जब पंजाबियत की सौंधी मिटटी से जन्मता है तो 'भ' का उच्चारण बदल कर 'प' के निकट हो जाता है!  पाई का असली नाम शायद ही किसी ने सुना हो पर पुराने लोग बताते हैं कि माँ-बाप का दिया नाम कुंदन सिंह था जो अब बड़े-बूढों-बच्चों सभी के लिए 'पाई' बनकर रह गया था!  उम्र ने साढ़े छह दशक देखें होंगे! छोटा-सा कद, इकहरा शरीर, झुकी कमर और गहरे रंग के चेहरे पर किसी पहलवान सी बड़ी-बड़ी मेहँदी से रंगी मूंछे, उसकी शख्सियत से  बिल्कुल मेल नहीं खाती थीं! सिर पर बचे बालों के विषय में कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता क्योंकि सिर हमेशा एक हल्की-सी पगड़ी से ढका रहता था! वह गोल घेरे वाली पंजाबी बुशर्ट पहने रहता, जिसकी बाजुएँ हमेशा मुड़ी रहती और जिसके दोनों तरफ कमर पर दो तथा दाई तरफ सीने पर एक जेब जरूर हुआ करती थी! नीचे के हिस्से में चैक के प्रिंट का एक पंजाबी तहमद (लुंगी) और पांव में आगे से मुड़ी पंजाबी जूतियाँ तो अपना रंग खोने से पहले शायद कभी काली रही होंगी, पाई की खास पहचान थी!

ठीक चार बजे जब वह श्रवण कुमार की तरह अपने कंधे पर बहंगी ले गली के कोने से आवाज़ लगाता दाखिल होता तो माएं आराम कर रहे बच्चों को जगा, शाम की चाय की तैयारी में लग जाती!  ट्यूशन जाने वाले बच्चे अपना बैग सहेजते और बड़े-बुजुर्ग चाय के बाद झोला ले सब्जी-मंडी या ताश पीटने पार्क जाने की सोचने लगते! हमारे घर के निकट चौराहे के एक किनारे पाई की यह छोटी-सी दुकान जमने से पहले ही छोटे बच्चे घरों से निकल कर उस दिशा में भागते जहाँ पाई अपनी बहंगी में जमी दो बड़ी टोकरियों में सामान ठीक कर रहा होता!  बड़े-बड़े लिफाफों और डिब्बों में चना, मुरमुरा, मूंगफली, मीठी खील, चना जोरगरम, दालसेव, दालमोठ, आलू के चटपटे चिप्स, शक्करपारे, गुड़ के सेव, गुड़गट्टा, गुड-पट्टी, तिलपट्टी और भी न जाने क्या-क्या भरा होता जो हम बच्चों के लिए कारूं के खजाने से कम नहीं था!
 
"पाई मुझे चवन्नी के चने चाहिए। नहीं....मीठी खील.... अ-अ-नहीं-नहीं दोनों मिला दो।"

बच्चों की भीड़ बार-बार फरमाइश बदलती, किसी एक पर राजी न हो पाती पर घनी मूछों के पीछे की स्नेहिल मुस्कान को किसी ने कभी खीज में नहीं बदलते देखा था! बच्चे दस्सी, बीसी, चवन्नी से भरे हाथ आगे करते और मनचाही चीज पा ख़ुशी से झूम उठते!  उस भीड़ में पाई की अनुभवी निगाहें उन उदास निगाहों और झिझकते हाथों को जाने कैसे ढूंढ लेतीं जिन्हें आज कोई सिक्का नहीं मिला था और जो डांटकर या कल के वायदे पर फुसलाकार माओं द्वारा टरका दिए होते!  सिक्के वाले बच्चों के ऐन पीछे की कतार में खड़े ऐसे बच्चों की मुस्कान लौटा लाने को पाई के पास 'झुंगा' यानि खट्टा-मीठा गीला चूरन होता था!  वह नन्ही-नन्ही उन हथेलियों पर एक डिब्बे से खींचकर थोड़ा-सा 'झुंगा' या कोई अन्य चीज रख देता!  मुफ्त में मिला ये तोहफानुमा झुंगा पाई का बच्चों के लिए प्यार होता जो सिक्के से भरी और खाली हथेलियों को एकाकार कर देता!  फिर देर तक हवा में बच्चों और पाई की हंसी और ठहाके गूंजते!  उस हंसी के अतिरिक्त उसकी आवाज़ बहुत कम सुनाई पड़ती, हाँ पाई की आँखों की चमक बच्चों के खिलते चेहरों के साथ गहरी होती जाती!

पाई के इर्द-गिर्द जुटने वाली इस भीड़ में दूसरे राउंड में बड़े भी शामिल होते पर पाई का सारा ध्यान उन नन्ही मुस्कानों, उनके नखरों और फरमाइशों पर लगा रहता। वर्षों पहले कभी उस भीड़ में हमारे पिता-चाचाओं-बुआओं का चेहरा हुआ करता था जो धीरे-धीरे समय के साथ हमारे चेहरों में बदल गया था!  फिर पाई के चने-मुरमुरे खाते और झुंगा चाटते हमारी पीढ़ी की  नन्हीं हथेलियां कब चौड़े पंजे में बदलने लगी और झुंगे के लिये फैलने में शर्माने लगी, ये न वक़्त जान पाया न खुद हम।

नब्बे का दशक शुरू हो गया था।  वक़्त तेज़ी से बदल रहा था।  हर साल एक कैलेंडर रद्दी हो जाता और नया दीवार पर टँग जाया करता।  हमारी पीढ़ी की एक पूरी पंक्ति बदल रही थी।  हमारी माएं हम लड़कियों को ताड़-सा बढ़ता देख बड़बड़ाती हुई दहेज जुटाने और पिताओं से तकाज़े करने में व्यस्त हो चली थीं और पिता बेपरवाह दिखने का अभिनय करते  चिंतातुर हो एकांत में अक्सर अपनी जमापूंजी टटोलने लगते थे। पर हमारी पीढ़ी की ऑंखें भविष्य के सुनहरे सपनों से रोशन थीं।  माएं रसोईघर की ओर इशारा कर हमें अन्नपूर्णा बनाना चाहती लेकिन छज्जों पर किताबें ले खड़ी रहनेवाली लड़कियां अब कॉलेज के बाद नए खुले इंस्टीट्यूटो में भविष्य से लड़ने के साधन डिप्लोमाओं की शक्ल में जुटाने लगीं थीं और उन्हें गली में कनखियों से निहारते निकम्मे घूमते लड़के टाई लगाकर किसी फ़ाइल को सीने से लगाये, अक्सर किसी बड़ी कम्पनी के किसी कक्ष में चल रहे इंटरव्यू की लाइन में प्रतीक्षा करते पाए जाते। बचपन हमारे हाथ से रेत की मानिंद फिसल रहा था और इस आपाधापी में हमारी घड़ियां चार बजने का अर्थ बदल चुकी थीं।  हम भूलने से  लगे थे पाई के लिफाफों में छिपी लज़्ज़त का स्वाद और अंकल चिप्स, क्रेकजैक के बिस्कुट, मैगी ने हमारे जीवन में जब चुपके से घुसपैठ की, तो हम वक़्त के साथ अपने जायके के बदलाव को पहचान ही नहीं पाए!

पहले से झुकी पाई की कमर अब एक सौ बीस से नब्बे डिग्री की ओर झुकने लगी थी और बीडी-तम्बाखू के सेवन का असर अक्सर खांसी और उखड़ती सांसों के रूप में सामने आने लगा था!  बढ़ती उम्र के आगे विवश पाई की गैरहाजिरी बढती चली गई और धीरे-धीरे गली भी भूलने की आदत डालने लगी कि चार बजने और चाय पीने के समय का पर्याय पाई कब से गली में नहीं आया था!  नई नन्ही पीढ़ी ने जब कदम बढ़ाना शुरू किया तो वह टॉफी, चोकलेट और कुकीज की दीवानी हो चली थी और हमारी पीढ़ी द्वारा ये मान लिया गया कि अब बढती उम्र की ओर अग्रसर सदाबहार पाई उस बूढ़े वृक्ष की तरह हो गया है जिसके सूख जाने पर लोग भूल जाते हैं कि उसकी छायादार उपस्थिति और फल कभी जीवन का अहम हिस्सा हुआ करते थे!

अलबत्ता साँझ के उसी मुहाने पर खड़ी वे अनुभवी आँखें अब भी कभी-कभी शाम को चौराहे के निकट उस खाली जगह को निहारकर ठंडी सांस ले, धीमी, थकी आवाज़ में ज़माने की रफ्तार की बात कर उदास हो जाया करती जिन्होंने विभाजन की विभीषिका से गुजरकर इस मोहल्ले को दशकों पहले गुलज़ार किया था! पाई ने जिनके साथ चने-मुरमुरे ही नहीं सुख के जश्न और दुःख का मातम भी बांटा था। विशेषकर ईश्वरी देवी और गामे की माँ अक्सर उन दिनों की स्मृतियों में डूब जाती जब उनका और बगल के गाँव से पाई का परिवार उजड़कर पाकिस्तान से यहां आन बसा था।

बंटवारे के दर्दनाक विस्थापन ने उन लोगों के बीच एक सहज अपनापा-सा कायम कर दिया था, जो तमाम वर्ग-विभेद से परे अपनी जगह ताजिंदगी कायम रहा। वे उजड़कर यहां बस तो गए थे पर उनकी जड़ों का एक अदृश्य सिरा आज भी वहीं कहीं अटका था जहां की मिट्टी में उन्होंने पहली सांस ली थी, जहाँ पहली बार लड़खड़ाते कदमों को साध चलना सीखा था। उम्र की साँझ में मन रह-रहकर स्मृतियों की ओर लौटता और अब जब साँसों की ये डोर कमजोर और पुरानी हो चली थी, उन्हें लगता था वे सब एक डाल पर लगे सूखे, जर्द पत्तों की तरह हैं जिन्हें काल की आंधी में समय पूरा होने पर, एक-एक कर बेआवाज़, टूट कर गिर जाना है। कल उनके बुजुर्ग गये, कुछ के पति-पत्नी बिछड़े, तो कुछ के संगी-साथी-साथिनें छोडकर अनंत-यात्रा पर निकल गये, और आज शायद पाई और आने वाले किसी कल को उनकी भी बारी है। 

फिर अगले दिन सुबह चाय-नाश्ता कर वे सब पैदल ही निकल पड़ीं अपने उस बीमार साथी से मिलने, कुछ दूर पर बसी एक स्लम बस्ती की ओर, जहाँ बीते दिनों की यादों के साये में वह अपनी शाम के डूबने की प्रतीक्षा में दिन काट रहा था। इस अप्रत्याशित मुलाकात में फिर समय के वरक पलटे गए, मन लौट चला स्मृति के गलियारों में, जहाँ वे साथ दौड़े, भागे, उजड़े, बसे और फिर धीरे-धीरे बदल गए पीले पत्तों में। आभार की मुद्रा में दोनों हाथ जोड़े, पाई की जर्द भीगी आँखों ने अबोले ही विदा के शब्द बुदबुदाये और वे मन-मन वजनी क़दमों से वे खामोश अपने नीड़ की ओर लौट चलीं! इस मुलाकात ने उनके मन को भारी और दुःख के रंग को और गहरा दिया था।  

“सुबह को रोज दोपहर और दोपहर को शाम हो जाना है।  ये कुदरत का नियम है गामे की माँ। हम सब बखत के चक्के के गुलाम हैं।  एक दिन सब पीले पत्तों को गिर जाना है, तभी तो जम्मेंगीं निक्की-नई कोंपले।" ईश्वरी देवी ने दार्शनिक भाव से कहा तो गामे की माँ निर्वात को ताकते हुए सहमति की मुद्रा में सिर हिलाने लगी!

“पत्ता टूटा डाल से, ले गई पवन उड़ाय, अब के बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय....” पास बैठी सोनबाई माला फेरते हुए गुनगुनाने लगीं!

चंद रोज बाद ईश्वरी देवी ने फिर धूप सेंकती वृद्धाओं के समूह को अनमने मन से साँझ के उस दीपक के बुझ जाने की खबर दी जिसने कभी ढेर से नन्हे जुगनुओं को अपनी रोशनी से जगमगाया था।  समय अपनी गति से चलता है, दोपहर ने ढलना नहीं छोड़ा,  घड़ी ने चार बजाने बंद नहीं किये पर नन्ही हथेलियाँ अब कभी झुंगा पाकर नहीं मुस्कुरायेंगी।  डाल से एक पत्ता फिर टूटकर समय की आंधी में खो गया था कभी न लौट कर आने के लिए और बाकी और बाकी बचे पीले पत्ते अब अपनी बारी की प्रतीक्षा में नन्हीं कोंपलों को खिलते देख रहे थे।

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 16




नहीं पढ़ा है बहुत सारे लोगों को
नहीं जानती हूँ हर कविताओं का अर्थ
नहीं कर पाती व्याख्या
लेकिन तितली की तरह 
इधर से उधर उड़ती रहती हूँ
और कुछ पराग ले आती हूँ ... आज लाई हूँ निधि सक्सेना को 


और अंततः वो मर गई | झर रही है चाँदनी - निधि - WordPress.com



​और अंततः वो मर गई!
परलोक के द्वार पर
पाप पुण्य का लिखा जोखा हो रहा है
चित्रगुप्त बही खाता लिए बैठे हैं
वो अचरज से सब देख रही है!!
समय की इकाई तरल है यहाँ
निश्चित नही है वक्त के अंश
शीघ्र और विलंब मन की कल्पनायें भर हैं!
अब उसकी बारी है
चित्रगुप्त उसके बही खाते बांच रहे हैं
बगैर उसकी ओर देखे
एकाग्रता से!!
उसने सहज ही पूछा है
मेरा भी खाता है क्या यहाँ
चित्रगुप्त ने नीचे देखे देखे ही जवाब दिया
हर मनुष्य का खाता है यहाँ
ओह!! उसके दीर्घ निःश्वास छोड़ी
याने आज ये तो सुनिश्चित हो ही गया
की मैं भी मनुष्य हूँ!!
चित्रगुप्त ने इस बार उस पर उड़ती दॄष्टि डाली
थोड़ी शिष्ट थोड़ी तीखी
थोड़ी चकित थोड़ी व्यथित
बड़े बड़े भरे भरे नयन लिए थी वो!!
चित्रगुप्त पुनः गुणा भाग में तल्लीन हो गए
कुछ ही क्षणों में हिसाब हो गया
तुलन पत्र पर कुल पाप अधिक हैं
कि वो लांछित है
अपराधिनी है
धर्म पथ से भटक गई है
झूठी है
विभत्स लालसायें हैं उसकी!
चित्रगुप्त पढ़ते जा रहे हैं दोष
और उसकी आँखों से आगे से गुजर रही है
चलचित्र सी उसकी जिंदगी
वो पुनः महसूस कर रही है
उन लांछनों के पीछे की विपन्नता
उन अभियोगों के पीछे की परिस्थिति
 अधर्म के पीछे की आहुति
 अपराध के पीछे अपमान
 लालसा के पीछे समर्पण!!
चित्रगुप्त ने फ़ैसला सुनाया है
माफी लायक नही है उसका जीवननामा
नर्क जाना होगा!!
अब क्रोध और आँसू तिरोहित हो गए हैं उसके
सर झुकाए बस इतना ही कह पाई
ईश्वर मुझे शायद माफ कर भी दें
परंतु मैं ईश्वर को कभी माफ न करूंगी!!
आहिस्ता आहिस्ता उसने नर्क की ओर उसने कदम बढ़ाये

एक बार फिर!!!


बुधवार, 29 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 15



बेचैन आत्मा - दुनिया, प्रकृति  ... क्या से क्या हो गई ! आत्मा स्तब्ध 

चिंतन में है, कभी किसी यात्रा के दरम्यान, कभी शून्य में विस्तार को 

देखते और मापते हुए 



नदी - बेचैन आत्मा - blogger

देवेंद्र पाण्डेय 


नदी
अब वैसी नहीं रही

नदी में तैरते हैं
नोटों के बंडल, बच्चों की लाशें
गिरगिट हो चुकी है
नदी!

माझी नहीं होता
नदी की सफाई के लिए जिम्मेदार
वो तो बस्स
इस पार बैठो तो
पहुँचा देगा
उस पार

नदी
के मैली होने के लिए जिम्मेदार हैं
इसमें गोता लगाने
और
हर डुबकी के साथ
पाप कटाने वाले

पाप ऐसे कटता है?
ऐसे तो
और मैली होती है नदी।

तुम क्या करोगे मछेरे?
अपने जाल से
नदी साफ करोगे?
तुम्हारे जाल में
छोटी, बड़ी मछलियाँ फसेंगी
नदी साफ होने से रही।

नदी को साफ करना है तो
इसके प्रवाह को, अपने बन्धनों से
मुक्त कर दो
चौपायों को सुई लगाकर,  दुहना बन्द करो
जहर से
चौपाये ही नहीं मरते
मरते हैं
गिद्ध भी

नदी
तुम्हारी नीतियों के कारण मैली हुई है
नदी
तुम्हारी नीतियों के कारण
गिरगिट हुई है
अब यह तुमको तय करना है
कि अपना
हाथ साफ करना है या
साफ करनी है
नदी।

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

2017 का अवलोकन 14



मनमोहन भाटिया जी को मैं हमेशा पढ़ती हूँ, नियम से वे मुझे अपनी रचनाएँ मेल करते हैं  ... 
My photo
निष्ठा से प्रायः हर दिन लिखते हुए मैंने देखा है - मनमोहन भाटिया, सुशील कुमार जोशी और देवेंद्र कुमार पांडेय को  ...इन्हें  पढ़ते हुए बहुत ही अच्छा लगता है !






सुबह के सात बजे सुरिंदर कमरे में समाचारपत्र पढ़ रहे थे उनके पुत्र ने एक वर्षीय पौत्र को सुरिंदर की गोद मे दिया।
"चलो दादू को गुड मॉर्निंग बोलो।"
पौत्र शौर्य दा-दा कहते हुए समाचारपत्र को अपने नन्हे हाथों में लेकर मसल देता है जिस कारण समाचारपत्र फट जाता है। फटे समाचारपत्र को देख शौर्य खुशी से हंसने लगता है। शौर्य के साथ सुरिंदर खेलने लगते हैं और दोनों जोर से हंसते हैं। शौर्य की दादी सुषमा पूजा समाप्त करके शौर्य  को गोद में लेती है।
"आप समाचारपत्र आराम से पढ़ो। मैं इसको संभालती हूं।"
अभी सुरिंदर अलग-अलग फटे हुए पन्नों को जोड़ रहे थे तभी उनकी पांच वर्षीय पौत्री सुहानी आकर सुरिंदर से चिपक जाती है।
"गुड मॉर्निंग दादू।"
"गुड मॉर्निंग सुहानी।"
गुड मॉर्निंग कह कर सुहानी दादा सुरिंदर के कंधे पर चढ़ जाती है।
"दादू आपके सिर के बाल कहां गए?" सुहानी ने सुरिंदर के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
"आपने खींचे थे इसलिए सब उड़ गए।"
"दादू झूठ बोल रहे हो, मैंने कब खींचे हैं। मैं तो कल आई हूं। बाल तो कल भी नही थे।" कह कर सुहानी सुरिंदर के कंधे पर चढ़ कर बैठ जाती है और सिर पर हाथ फेरते हुए बाल खींच लेती है।"
"सुहानी बेटे, बाल मत खींचो, दर्द होता है। आप मेरे सिर की चम्पी करो।" सुहानी मस्ती में दादा सुरिंदर के सिर की चम्पी करते  हुए बाल भी खींच लेती है। सुरिंदर को दर्द होता है फिर भी वे सुहानी के साथ मस्ती करते हैं।
सुरिंदर अपने पौत्र और पौत्री के संग मस्ती करते हैं। सुरिंदर की पुत्रवधू सुहानी को डांट कर डाइनिंग टेबल पर दूध पीने के लिए बिठाती है। सुरिंदर स्नान करने जाते है। सुहानी मस्ती में दूध पीते हुए कप गिरा देती है। कप टूट जाता है। सुहानी मां से डांट खाती है और रोते हुए दादी की गोद मे छुप जाती है।

सुरिंदर और सुषमा सेवा निवृति के पश्चात अकेले जीवन व्यतीत कर रहे है। शादीशुदा पुत्र और पुत्री अपने परिवार संग दूसरे शहर में रहते हैं। वर्ष दो के बाद कभी-कभी मिलने आते है तब घर मे रौनक लग जाती है वर्ना दोनो बूढे पति-पत्नी सारा दिन दीवारें ताकते हुए टीवी देखते हैं।
आज पोते-पोती संग सुरिंदर चहक रहे हैं। स्नान के बाद सुरिंदर पूजा में बैठते हैं तब शौर्य गोद मे मस्ती में कभी ताली बजाता है कभी गोदी से निकलने की कोशिश करता है। सुहानी बगल में बैठ कर मंदिर की घंटी बजाने में मस्त है।
नाश्ता करने के पश्चात सुरिंदर सुषमा सुहानी और शौर्य को लेकर बाजार जाते हैं और उनके लिए कपड़े और खिलौने खरीदते हैं। दोहपर के समय घर आकर खाने के पश्चात आराम करते हैं।
"सुहानी कल रविवार है तुम्हें चिड़ियाघर दिखलाते हैं।"
"वहां क्या होता है दादू?" सुहानी उत्सुकता में सुरिंदर से चिपक जाती है।
"वहां आपको शेर, हाथी, ज़ेबरा, दरियाई घोड़ा, बंदर और बहुत सारे पशु-पक्षी नजर आएंगे। आपको बहुत मजा आएगा।"
"सब सच्ची के होंगे दादू?"
"हां सच्ची के होंगे।"
"मुझे डर लगेगा दादू।"
"डर नही लगेगा क्योंकि एक तो हम आपके साथ होंगे और उनको पिंजड़े या बाडे में रखा जाता है। हम सबको दूर से देखेंगे।"

अगले दिन सुरिंदर सुहानी को चिड़ियाघर लेकर जाते हैं। अभी तक सुहानी ने जानवर टीवी पर देखे थे, आज उनको सामने देख अति प्रसन्न हुई। पांच वर्षीय सुहानी जल्दी थक गई तब सुरिंदर उसके साथ घर चले गए। घर आकर सुहानी खुशी में झूमते हुए सबको बताती है कि उसने शेर देखा।
हर रोज सुबह सुहानी और शौर्य के साथ समीप के पार्क जाते। सुहानी को झूला झुलाते।
एक सप्ताह बीतते पता ही नही चला और बच्चों के वापस जाने का समय हो गया। झलकती आंखों के साथ सुरिंदर ने बच्चों को विदा किया।

बच्चों के जाने के पश्चात सुरिंदर और सुषमा अकेले पढ़ गए।
"बच्चे अपने साथ रौनक ले गए।" सुषमा ने सुरिंदर के कंधे पर हाथ रख कर कहा।
बालकनी में समाचारपत्र पढ़ते हुए सुरिंदर ने चश्मा और समाचारपत्र टेबल पर रखते हुए कहा "घर सूना हो गया।"
"रौनक बच्चों से होती है। समय पंख लगा कर उड़ गया। एक सप्ताह फुरसत ही नही मिली और अब करने को कोई काम नही।"
"सुषमा सेवा निवृति के पश्चात समय व्यतीत करने की समस्या का कोई समाधान नही है। बच्चों के साथ संयुक्त परिवार में मन लगा रहता है। अकेलेपन की कोई दवा नही सुषमा। पूरे दिन में दो से तीन घंटे का काम है और बाकी समय किताबे पढ़ने और टीवी देखने मे बिताना पड़ता है।"
"अब उम्र के इस पड़ाव में हकीकत से मुंह नही मोड़ सकते। सच्चाई स्वीकार करके प्रभु वंदन करते जीवन बिताना है।"
बच्चों से कभी कभार फोन पर बात हो जाती है तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।

एक दिन शाम को बाजार से फल-सब्जी और रसोई का सामान खरीद कर सुरिंदर और सुषमा घर लौट रहे थे। सोसाइटी के गेट पर भीड़ थी। रिक्शे से वहीं उतर गए। पुलिस भी खड़ी थी और लोग खुसर-फुसर कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि एक मकान में चोरी हो गई। मकान में रहने वाला परिवार शादी में दूसरे शहर गए थे। दो दिन मकान में ताला लगा था। जब वापिस आये तब चोरी का पता चला। सोसाइटी के चौकीदारों पर शक की सुई घूम गई, जिन्हें हर मकान और उनके परिवार के आने-जाने की पूरी जानकारी होती है। पुलिस चौकीदारों से पूछताछ कर रही थी। सुरिंदर और सुषमा घर आ गए।
"सुषमा अब हम दोनों को चौकन्ना रहना चाहिए। दिन-दहाड़े चोरियां और बुजर्गो पर हमले हो रहे हैं। चोरी के समय बुजुर्गों पर कातिलाना हमला अब आम बात हो गई है।" सुरिंदर ने चिंता जाहिर की।
"सुरिंदर हमारे यहां तो कोई नौकर भी नही है। बुढ़ापे में समय काटने के लिए घर के सभी काम अपने हाथों से करते हैं। सिर्फ झाड़ू-पोंछे के लिए एक समय माई आती है।" सुषमा ने कह कर सुरिंदर को तसल्ली दी।
"अनजान व्यक्तियों को घर मे नही घुसने देना। मुख्य दरवाजे पर अतिरिक्त सुरक्षा का प्रबंध करते हैं।"
"जो होना है सुरिंदर हो ही जायेगा, कितनी ही मोटे ताले जड़ दो। कंस के लाख पहरों के बावजूद कृष्ण सुरक्षित यशोदा के घर पहुंच गए।" सुषमा कह कर रसोई में चाय बनाने लगी।

कुछ दिन बाद सुरिंदर और सुषमा बालकनी में शाम की चाय पी रहे थे। घर की घंटी बजी, दरवाजा खोला तो पुलिस खड़ी थी। सुरिंदर आशंकित और अचंभित हो गया। वह पुलिस की शक्ल देखने लगा। पुलिस की वर्दी पर लिखा था। "अजय दहिया"
"जी कहिए क्या आपको मेरे से कोई काम है?" सुरिंदर ने गला साफ करते हुए पूछा।
"बस आपके पांच मिनट लूंगा। अंदर बैठ कर बात करते हैं।"
सुरिंदर और अजय दाहिया सोफे पर बैठते है। सुषमा चाय पूछती है।
"नही आंटी चाय नही बस पानी, वो भी सादा। ठंडा फ्रिज का नही चलेगा।"
पानी पीने के बाद अजय दाहिया ने सुरिंदर को संबोधित किया।
"अंकल आजकल शहर में चोरी और बुजुर्गों पर हमलों की वारदात बढ़ गई है। पुलिस ने एक नई योजना बनाई है जिसमें हम थाना क्षेत्र में रहने वाले अकेले रह रहे बुजुर्गों की एक लिस्ट बना रहे हैं। हमें आपका नाम, पता और संपर्क नंबर चाहिए। आप हमें जरूरत के समय इन फोन नंबरों पर फोन कर सकते हैं। आपकी तबीयत ठीक न हो, हम आपको डॉक्टर या अस्पताल लेकर जाएंगे। केमिस्ट से दवा ला कर देंगे। समय-समय पर थाने से कोई सिपाही आपका हालचाल पूछने आएगा। अब आप समस्या बताएं जिनका हम समाधान ढूंढ सके और आपकी मदद कर सकें।"
"पुलिस की पहल और योजना का मैं स्वागत करता हूं।" सुरिंदर ने पुलिस का फार्म भर दिया।
"इस योजना को अधिक सफल बनाने के लिए आप सुझाव दीजिए।"
"बेटा इस उम्र में आकर अकेले रह रहे हम बुजुर्गों की बस एक समस्या अकेलेपन की है। मकान अपना है, दाल-रोटी मिल जाती है। बच्चे दूर हैं, मन उचाट रहता है। टीवी भी कितना देखें, बार-बार सारा दिन वोही कार्यक्रम दोराहे जाते हैं। बच्चों का कोई दोष नही है, नौकरी और व्यापार के लिए दूसरे शहर और देश जाना पड़ता है। बच्चों के बिन घर सूना लगता है और काटने को दौड़ता है। अकेलापन समस्या है। इस उम्र में अधिक काम कर नही सकते।" कह कर सुरिंदर और सुषमा की आंखें नम हो गई।
"आज सब के साथ यही समस्या है।" कह कर अजय दाहिया ने प्रस्थान किया।

सुरिंदर अपने मोबाइल पर सुहानी और शौर्य की तस्वीरों को देखते विचारों में डूब जाते हैं।


सुशील कुमार जोशी 



किसी दिन तो 
सब सच्चा 
सोचना छोड़ 
दिया कर 

कभी किसी 
एक दिन 
कुछ अच्छा 
भी सोच 
लिया कर 

रोज की बात 
कुछ अलग 
बात होती है 
मान लेते हैं 

छुट्टी के 
दिन ही सही 
एक दिन 
का तो 
पुण्य कर 
लिया कर 

बिना पढ़े 
बस देखे देखे 
रोज लिख देना 
ठीक नहीं 

कभी किसी दिन 
थोड़ा सा 
लिखने के लिये 
कुछ पढ़ भी
लिया कर 

सभी 
लिख रहे हैं 
सफेद पर 
काले से काला 

किसी दिन 
कुछ अलग 
करने के लिये 
अलग सा 
कुछ कर 
लिया कर 

लिखा पढ़ने में 
आ जाये बहुत है 
समझ में नहीं 
आने का जुगाड़ 
भी साथ में 
कर लिया कर 

काले को 
काले के लिये 
छोड़ दिया कर 
किसी दिन 
सफेद को 
सफेद पर ही 
लिख लिया कर 

‘उलूक’ 
बकवास 
करने 
के नियम 
जब तक 
बना कर 
नहीं थोप 
देता है 
सरदार 
सब कुछ 
थोपने वाला 

तब तक 
ही सही 
बिना सर पैर 
की ही सही 
कभी अच्छी भी 
कुछ बकवास 
कर लिया कर ।

लेखागार