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शुक्रवार, 16 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा और मस्तो




नाम वाम में क्या रखा है 

चेहरा बहुत कुछ कहता है 
पढ़ते हुए आप मस्त होंगे 
तो कह लीजिये मस्तो  ... 


मस्तो कहते हैं,
"I ‘m Art & Life practitioner!

:::
Urdu Poet hun,Kahaniyan sunata hun..bachhon ko..badon ko..aap storyteller kah sakten hain..Film me Screenplay,Dialogs aur Lyrics likhta hun.Theater me as a Writer, Designer aur Actor kaam karta raha hun , Spiritual Practices se bhi juda hun…aur ye sab jo thoda bahut janta hun unhe padhata bhi hun."


तुम- बारिश !!


तुम टेरेस पर
कुर्सी डाले
पाव रखे
कुर्सी पर..
बारिश देखा करती थी..
:
मैं अंदर
सोफे पे बैठे..
तुमको देखा करता हूँ..
:
और जब
बारिश की बूँदें..
स्लीपर पर पड़ती हैं..
तुम
कुर्सी को पीछे
खींच लिया करती हो !!
:
हाय !
ये बारिश की बूँदें..
तुमको
छूना चाहती हैं..
तुमको
पाना चाहतीं हैं…
आख़िर
किस से..भाग रहे हो ??



कारण

बहुत देर तक सोचता ये रहा मैं
मैं हूँ कौन
मेरी ज़रुरत ही क्या  है
सफऱ
आह ! लंबा सफऱ ये..
बता यार कैसे कटेगा…
मैं ये सोचता…
अनवरत सोचता
तभी आ कर मस्तो ने
मुझको बताया
जो तू जानता है
वो सच
आखरी सच
परम सच
बयानी ही उसकी
तेरी साधना है
उसी के लिए जिस्म तुझको मिला है
मैं तब से लगा हूँ मेरी साधना में


डायरी : 18 जनवरी टेम्पेस्ट के बहाने से


किसी भी नाटक को देखने से पहले क्या अपेक्षाएँ हैं ..ये बहुत साफ़ होनी चाहिए..अमूमन कई बार नाटकों मे बहुत कुछ बुरा होता है लेकिन ऐसा भी नही है की नाटकों मे सब कुछ बुरा हो…
खैर ! समग्र मे भी बुरा करने वाले लोग हमारे और दूसरे शहरों में हैं 😉

शेक्सपियर के नाटक मे क्या कुछ प्रोग्रेसिव है.? अगर नही है तो क्योकार वो लिटरेचर का बड़ा हिस्सा हुआ ये सोचने की ज़रूरत है अगर तमाम लेखकों की माने तो जो प्रोग्रेसिव नही वो बड़ा साहित्य नही…
सो अगर ये बड़ा साहित्य है तो इसे प्रोग्रेसिव होना चाहिए अब हमको इसमे प्रोग्रेसिव होने के एलिमेंट तलाशने होंगे..?नही ??
खैर आप खोजेंगे तो जैसे भगवान मिल जाते हैं इसमें कुछ न कुछ एलिमेंट्स भी मिल जाएँगे…
शेक्सपियर के नाटकों के प्रोग्रेसिव होने के बाधक के रूप में जो मूल समस्या हैं वो जादू-टोना ,भविष्यवकताओं और अंध विश्वास को दर्शाना है.
जो मेरी नज़र में भी है…निश्चित रूप से समाज के वर्ग को उस तरफ़ धकेलती है.
अच्छा सोचा है कभी जादू-टोना ,भविष्यवकताओं और अंधविशवास से होता क्या है ?
हाँ कुछ लोग पैसा गंवाते हैं कुछ लोग पैसा/शक्ति कमातें हैं,पर इन दोषों के साथ ये कुछ देर जीने की या जीते रहने की उम्मीद नही जागतें हैं…?
ये ही ईश्वर के सन्दर्भ मे भी है की,इसके ज़रिए एक औसत दिमाग़ का आदमी कुछ और वक़्त हिम्मत से काट लेता है…वरना तो वो मर गया होता…
हाँ कई बार इसके चक्कर मे पड़ के वो मर अथवा मार भी देता है..पर १ लाख जादू-टोना ,भविष्यवकताओं और अंधविश्वाश मे ऐतबार करने वालों मे से 1 हज़ार के साथ हुआ तो ये फ़क़त 1 % ही है. खैर सही आंकडें क्या है मुझे अथवा आपको भी नही मालूम…पर अगर दिमाग़ नही खुला तो अच्छे या बुरे की समझ ला पाना मुश्किल है पाप और पुण्य समझा पाना आसान है…ये ये करोगे तो दोज़ख़्…ये ये करोगे तो जन्नत…
मैं दलील नहीं दे रहा,बस उनकी नज़र से एक दफा देखना चाहता हूँ
शेक्सपियर के नाटक जीने के कारण और प्रकृति द्वारा जीने के संकेतों को देखने को कहतें हैं..मानवीय संवेदना भावनओं को दर्शातें हैं पर बहुत मोटे तौर पे क्योकि तब से ले के अब तक संवेदनाएँ भावनाएं वो वही हैं पर कॉंप्लेक्सिटी बढ़ गयी है…अलग अलग स्तर पर…वो तमाम बातें एक सतही तौर पे तो असर डालती हैं.
पर सबसे ज़्यादह ड्रमॅटिक एलिमेंट जो मुझे लगता है वो जादू टोना भूत चुड़ैल भविष्यवाणियों वाला लगता है.
क्योकि घटना क्रम,पत्रों और संवादों द्वारा तो थोड़ा सा घटता है पर पूरे ड्रामे का एक बड़ा हिस्सा दर्शकों के भीतर घट रहा होता है उस आदमी के भीतर जो जादू .. और भविष्यवाणियों पे ऐतबार करता है या करना चाहता है क्योकि जीने के बहाने खोजना चाहता है.
आप इसे सही ग़लत कह सकतें हैं पर पूर्णतया क्या सही ? क्या ग़लत ?
सब अपने अपने पैमाने है..जैसे मेरे पैमाने से ये पूरी तरह ग़लत है…साहित्य में जो है ही नही उसके होने की बात कैसे की जा सकती है..और की जा रही है तो उसे साहित्य की श्रेणी में न गिना जाए..कम अज़ कम मेरी नज़र में…
पर मेरी नज़र आखरी नही है…लोग अपने चश्में से देखेंगे और समझेंगे और वो कह सकतें हैं की हमारी ग्रोथ भी हो रही और हमने जाना भी.
नाटक के साथ शुरू से ले के आज तक दूसरों की विचारधारा ,सोच हावी रही है सो उनको पोषित करने के लिए लिखे गये…
जैसे शेक्सपियर के नाटक भी..विशेष वर्ग और सोच को पोषित कर रहे थे…या भारत के आदि नाटक भी जो भारत मुनि के निर्देशन मे हुए वो भी..समुद्रमंथन पूरा पूरा एक विशेष वर्ग को पोषित करता हुआ है…पात्र सुर और असुर हों…और कुछ साझा देवता और जति ..
मुझे तो ये अजीबो ग़रीब कथा लगती है..
ऐसा लगता है दो जातियों ने जिनमे गोरे और काले लोग थे.(आप जानते ही होंगे ऋघ्वेद के भी कुछ ऋषि काले भी थे) समुद्रमंथन के उपमा है कोई मुश्किल काम को अंजाम देने के लिए…
नाग जातियों की मदत से (ख़ास उनके राजा शेषनाग)…पूरे भारत मे लूटमार किया..जो बेशकीमती चीज़ें मिली उसे दोनो लोग बाँटते चले गये.गोरे लोगों ने इसमे ज़्यादह शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त किया और इसमे हलाहल भी असुरों के देवता (सुरों द्वारा भी पूजनीय) के हिस्से आया…खैर !
इस नाटक को भारत मुनि ने ईमानदारी से नही लिख पाए वरना दोनों वर्ग के लोग इसको देख खुश होते…रसस्वादन करते…मेरा बहुत दृढ़ विश्वास है की भारत मुनि का ज्ञान जो नाट्यशास्त्र में है उनका नही दूसरों से लिया हुआ था..अगर उन्होने ये आत्मसात कर लिया होता समुदमंथन जैसा नाटक नही लिखते या लिखते भी तो यूँ लिखते की सुर व असुर दोनों उसका स्वाद ले सकें और आनंद को प्राप्त होते.खैर भारत मुनि और ..शेक्शपियर की बात फिर कभी…
खैर ! अभी मैं बात करूँगा भारतेंदु नाट्य अकादमी मे हुए नाटक तूफ़ान (टेम्पेस्ट) जिसकी परिकल्पना और निर्देशन पार्थो बंधोपाध्याय ने किया था
बी एन ए के स्टूडेंट्स की ये प्रस्तुति थी. निर्देशक ने बहुत कम समय में स्टूडेंट्स के बॉडी पे बहुत काम किया…अभिनय में आने वाले अधिकतर नये लोग अपने शरीर और आवाज़ पे बिल्कुल काम नही करते, पर खुशी है की उनकी बॉडी पे बहुत अच्छे से काम हुआ…शुरुआत मे नाटक 20 मिनट स्लो था ड्रॉप हो रहा था पर उसके बाद बहुत अच्छे से पेस पकड़ा…आर्टिस्ट मे अच्छी एनर्जी थी…संवाद न के बराबर हो तो बतौर अभिनेता और ज़्यादह काम करना होता है उस गैप को भरने के लिए जो सबने बखूबी किया.
कुछ दृश्य बंध बेहद खूबसूरत बन पड़े थे … और कहीं कहीं अद्भुत…पूरी टीम एक दिख रही थी..ये भी अच्छा है..मैने नये छात्रों की पहली प्रस्तुति देखी जो निश्चित रूप से प्रशंसनीय है.
हाँ नृत्य पूरी तरह सिंक्रोनाइज़ नही थे पर काफ़ी हद तक थे…म्यूज़िक कुछ जगह अच्छा…कुछ जगह औसत कुछ जगह बुरा मालूम दे रहा था.और वो चाइनीस मूव और म्यूज़िक दिखने सुन ने मे अच्छा था पर कुछ लोगों का मूड ब्रेक भी कर रहा था.
लव सॉंग और डॅन्स मूव्मेंट भी बहुत सहजता और खूबसूरत तरीके से लोगों ने अदा किया..मुझे कुछ भी फूहड़ या अजीब नही लगा…कुछ मूवमेंट
बेहद खूबसूरत बन पड़े थे…
लाइट भी अच्छी रही इस कारण कई दृश्य अपना असर छोड़ने मे कामयाब रहे.
एक इन्स्टिट्यूट के स्टूडेंट्स के लिए,अभिनय को समझने की तैयारी के अंतर्गत ये बेहद कामयाब और अच्छा नाटक रहा..साफ़ नज़र आ रहा था निर्देशक और स्टूडेंट्स ने बेहद मेहनत की थी…जो रंग लाई…लगभग एक माह की तैयारी में इसे तैयार करना और मूल नाटक के साथ
प्रयोग करते हुए परिकल्पना और निर्देशन के लिए पार्थो बंधोपाध्याय को ख़ास बधाई !
नाटक निश्चित तौर पे लम्बे वक़्त तक याद रखा जाएगा !
बधाई हो ! और भविष्य की शुभकामनाएं !

1 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर ब्लॉग।

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