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मंगलवार, 13 जून 2017

मेरी रूहानी यात्रा आशा जी की कलम तक




जीते जी भी रूह निकलती है 
रूह से मिलने के लिए  ... 
अब उसे कविता कहो 
कहानी कहो 
या सरसराती,सिहरती कोई कल्पना  ... 


आदत वृद्धावस्था की


एक किस्सा पुराना 
बारबार उसे दोहराना 
है वृद्धावस्था का
अन्दाज पुराना 
कोई सुने या न सुने 
मजा आता है
उसे जबरन सुनाने में 
अब तो आदत सी
हो गई है 
एक ही बात
दस दस बार
दोहराने की 
हर बात पर अपनी 
मनमानी करने की 
जिद्द ठान लेने की 
सही है की 
मोहर लगा देने की 
कोई हँसे या न हँसे 
खुद ठहाके लगाने की |




पिंजरे में बंद एक पक्षी


कभी स्वतंत्र विचरण करता था ,
चाहे जहां उड़ता फिरता था ,
जीने की चाह लिए एक पक्षी ,
जब पिंजरे में कैद हुआ था ,
बहुत पंख फड़फड़ाए थे ,
खुले व्योम में उड़ने के लिए ,
मन चाहा जीवन जीने के लिए ,
अपनों से मिलने के लिए ,
अस्तित्व अक्षुण्य रखने के लिए ,
पर सारे सपने बिखर गए ,
हो कर इस पिंजरे में बंद ,
मन ने यह बंधन भी,
स्वीकार कर लिया ,
फिर जब भी पिंजरे का द्वार खुला ,
बाहर जाने का मन न किया ,
शायद भय घर कर गया था ,
बाहर रहती असुरक्षा का ,
पर कुछ समय बाद ,
एक रस जीवन जी कर ,
मन में हलचल होने लगी ,
जब दृष्टि पड़ी उसकी,
अम्बर में विचरते पक्षियों पर ,
स्वतंत्र होने की लालसा ,
बल वती पुनः होने लगी ,
भय का कोहरा छटने लगा ,
ऊर्जा का आभास होने लगा ,
हों चाहे जितनी सुविधाएं ,
और बना हो सोने का ,
पर है तो आखिर पिंजरा ही ,
स्वतंत्रता की कीमत पर ,
क्या लाभ यहाँ रहने का ,
अब समय बर्बाद न कर के ,
बंधक जीवन से मुक्ति पा ,
नीलाम्बर में उड़ना चाहे ,
नए नए आयाम चुने ,
उनमे अपना स्थान बनाए ,
जैसे ही पिंजरे का द्वार खुला ,
बिना समय बर्बाद किये ,
उसने तेज उड़ान भरी ,
पास के वृक्ष की डाली पर ,
बैठ स्वतंत्रता की खुशी में ,
एक मीठी सी तान भरी |

4 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर चयन।

Sudha Devrani ने कहा…

बहुत ही सुन्दर....
लाजवाब....

Kavita Rawat ने कहा…

आशा जी का अबाध सक्रिय लेखन एक प्रेरणा है हमारे लिए
बहुत अच्छी प्रस्तुति

sadhana vaid ने कहा…

हार्दिक आभार आपका रश्मिप्रभा जी ! अभी आशा दीदी के पास ही इतना समय बिता कर आई हूँ ! उनकी रचनाओं को आपकी सराहना मिली है जानकार हार्दिक प्रसन्नता होगी उन्हीं ! आजकल कुछ अस्वस्थ हैं इसलिए नेट से दूरी बनी हुई है !

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