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सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

.... सब अपने अपने हिस्से जीते हैं





धूप छाँव
दिन रात
सुख दुःख
हँसी उदासी .....
.... सब अपने अपने हिस्से जीते हैं
कभी बारिश नहीं होती
कभी बेमौसम बरसात से
आँखें फटी की फटी रह जाती हैं !
संकरे रास्ते 
सुख के भी 
दुःख के भी
खुला मैदान 
हँसी के लिए भी उदासी के लिए भी
....
मिलना तो सब है
कब कहाँ क्यूँ - तय नहीं
पर वक़्त आता है
स्थान भी आता है
और क्यूँ ? ...... अंतरात्मा समझती है .
..........
कई बार हम सज़ा के हकदार नहीं होते
पर अत्यधिक अच्छाई भी कटघरे में होती है
जानने के लिए
कि अपनी अच्छाई में आपने जिनका साथ दिया है
वे उसके पात्र नहीं थे
तो गुण जाए न जाए संगत से
सज़ा मिलती ही मिलती है !
.......
पानी से भरा घड़ा ईश्वर थमाता है
उन प्यासों के लिए
जिनकी प्यास बुझाना धर्म है
पर जो एक एक जीवनदायिनी बूंद के लिए
बेमौत मारते हैं
उनकी प्यास मिटाना
उनकी आसुरी शक्ति को जिंदा रखना है
और - इसकी सजा मिलती है
मिलनी भी चाहिए !

श्रद्धा , विश्वास की कीमत
एकलव्य का अंगूठा नहीं
शिष्य की निष्ठा के आगे द्रोण की समझ थी
एकलव्य को ईश्वर ने सब दिया
पर एकलव्य ने अपनी भक्ति के अतिरेक में
द्रोण के इन्कार को भी श्रेष्ठ बना दिया ...
तो अंगूठा - कब , कहाँ , क्यूँ का उत्तर था
सिर्फ एकलव्य के लिए नहीं
हम सबके लिए !



बिखरे हुए मन को
समेटना
क्योंकर होता
कैसे होता ?!
सब तार टूटे थे
विडम्बनाओं का काफ़िला
दूर तक फैला था
दर्द कई रूप धरे
विद्यमान था
दुःख कई थे
सुख और दुःख के बीच की सीमा रेखा का
कुछ यूँ हुआ था विलय
कि सुख और दुःख
अनन्य अविभाज्य से थे दृश्यमान
आंसुओं की सहज उपस्थिति ने
सुख-दुःख के आँचल नम कर रखे थे
शब्द कुछ कहते हुए
कुछ और अभिव्यक्त कर जाते थे
उनकी अपनी सीमा थी
मौन अपनी तरह से संतप्त था
हर एक झरोखा बंद था
रूठा था प्रकाश
बरस रहा था हृदयाकाश !!


आज #छठ की भीड़ है लोहे के घर में। साइड अपर में सामानों के बीच चढ़ कर बैठ गए हैं हम। सामने एक महिला ऊपर के बर्थ पर दो बच्चों को टिफिन में रखा दाना चुगा रही हैं। चूजे कभी इधर फुदकते हैं, कभी उधर। गिरने-गिरने को होते हैं कि मां हाथ बढ़ाकर संभाल लेती हैं। बगल के बर्थ में एक लड़का घोड़ा बेच कर सो रहा है। जफराबाद में #ट्रेन रुकी, ८-१० और यात्री चढ़ कर बैठने का जुगाड तलाश रहे हैं। नीचे के दोनो बर्थ पर कोहराम है। छोटे-छोटे पांच बच्चे, दो महिलाएं और चार पुरुष आपस में गड्डमगड्ड हैं। खाना बेचने वाला भी खड़ा है, यात्रियों के साथ। आवाज़ लगा रहा है-'सब्जी-भात, डिम- भात, मछछी-भात।' डिंबा से डिम बना हो शायद! अंडा को डिम बोल रहा था हाकर। कोई-कोई खरीद भी रहे हैं। जो खरीद रहे हैं वे खा भी रहे हैं। बगल वाले अपर बर्थ में एक महिला अपने बच्चे को चम्मच से अंडा-भात खिला रही है। खिलाते खिलाते मैंगो जूस बेचने वाले हाकर को रोक कर पूछ रही है-ऐ! पानी है?
एक आदमी और चढ़ कर मेरे बगल में बैठ गया है। इसे मालदा टाउन जाना है। बता रहा है कि हम छठ वाले नहीं हैं, बी एस एफ में हैं। छठ वाले वे लोग हैं। इसी भीड़ भाड़ वाले कोहराम में लोग मनोरंजन भी कर रहे हैं। नीचे एक आदमी मोबाइल में वीडियो देख रहा है। बच्चे लगातार 'चिल्ल-पों' मचाए हैं। बड़े उनको संभालने में लगे हैं। डिम-भात खाने वाले बच्चे को पानी की बोतल मिल गई है। पीने के बाद वो उसी बोतल से खेल रहा है। किसी स्टेशन पर रुक गई है ट्रेन। कुछ घबरा कर पूछ रहे हैं-बनारस कब आएगा?
#लोहेकाघर

2 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर बुलेटिन।

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी बुलेटिन प्रस्तुति

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