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शनिवार, 21 जनवरी 2017

ट्रम्प युग में विश्व । ब्लॉग बुलेटिन


डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए, एक युग की अंत हुआ या यूँ कहिये कि एक नए युग की शुरुआत हुई। यहाँ "युग" शब्द का ज़िक्र मैंने इसलिए किया किया क्योंकि पिछले लगभग पाँच दशकों के बाद ट्रम्प विश्व के सबसे कम लोकप्रिय नेताओं में से एक हैं। अमेरिका में भी पॉपुलर वोट्स के आधार पर हिलेरी से ट्रम्प पिछड़ गए थे लेकिन सीटों के आधार पर ट्रम्प जीत गए। बहरहाल विश्व का सबसे शक्तिशाली या फिर विश्व का सबसे बड़ा कर्जदार देश अमेरिका की नीति ट्रम्प के पास है। यह एक बिज़नसमैन हैं सो इनके देश बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। ट्रम्प के बारे में भारतीय समुदाय की सोच बंटी हुई है... कई लोग इसलिए डरे हैं कि वीजा को लेकर अब क्या होगा, कई इसलिए भी डरे हुए हैं क्योंकि इसके बाद अमेरिका के कई इलाकों में चल रहे हिंसक विरोध प्रदर्शन के बाद क्या होने वाला है। वैसे लोकतंत्र के मामले में हमारा अनुभव यह कहता है कि जो जैसा चल रहा है चलता रहेगा कोई ख़ास फर्क अमेरिका जैसे देश को नहीं पड़ेगा। वैसे एक बात पर विचार किया जाए तो यह साफ़ हो रहा है कि अब विश्व में आम जनमानस दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर झुक रहा है।

भारत के लिए अगले कुछ साल बहुत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि ट्रम्प के आने से विश्व के कुछ समीकरण इधर उधर हो जायेंगे, दक्षिण एशिया की स्थिति, चीन, यूरोपियन यूनियन और अफ्रीका को लेकर और इस्लामिक आतंकवाद के लिए ट्रम्प अलग नीति अपनाएंगे। चुनाव के दौरान अमेरिकी भारतीयों द्वारा आयोजित एक चुनावी सभा में ट्रम्प ने कहा था कि वो हिंदुओं और भारत से बहुत प्यार करते हैं. उनका ये कहना यही नहीं रुका, आगे वो कहते है कि मोदी एक सशक्त नेता हैं और वो भी मोदी की तरह और मोदी के साथ काम करेंगे। यही कारण था कि वो चुनावी सभाओं में मोदी की तरह ही "अबकी बार ट्रम्प सरकार"। मोदी की तरह जनता के दिलों को छूने वालों मुद्दों और उनके आतंकवाद को लेकर साफ़ नीति बनाने की नीयत के कारण सो भारत में भी लोगों ने ट्रम्प के विजय के लिए प्रार्थना सभाएं आयोजित की थी। अमेरिकी चुनाव परिणाम आने के बाद लोगों ने भारत में भी जश्न मनाया. इससे उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों ही एक जैसी सोच वाली सरकारें एक दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगी।

वैसे हिंदी ब्लॉगरों की फेसबुक पर प्रतिक्रियाओं और पिछले कुछ घंटों में आयी ब्लॉग पोस्ट को खंगाला जाए तो यहाँ भी बंटे हुए विचार हैं। बहरहाल आने वाले समय में विश्व शान्ति की मंगल कामना के साथ पिछले चौबीस घंटे की ब्लॉग जगत की हलचलों पर गौर करते हैं।

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मित्रो तो आज का बुलेटिन यहीं तक, कल फिर एक नए अंक में आपसे फिर मिलेंगे !!

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

टूटी सड़क के सबक - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |



अगर आपकी राह में छोटे छोटे पत्थर, ऊबड़ खाबड़ सड़क मिले या गड्ढे आयें तो समझ लेना...












अब तो चुनावों के बाद ही सड़क सही हो पाएगी।












किताबें और मेले

देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

स्वतंत्र दृष्टिकोण वाले ओशो - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
ओशो नाम सुनते ही एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा उभरता है जिसके विचारों को, कृतियों को आज भी काम से जोड़कर देखा जाता है. जबकि वास्तविकता इससे कहीं अलग है. अपने विवादास्पद नये धार्मिक-आध्यात्मिक आन्दोलन के लिये मशहूर हुए ओशो ने सभी विषयों पर सबसे पृथक और आपत्तिजनक विचार व्यक्ति किये. जिसके चलते उनकी एक अलग और विवादस्पद छवि बनी है. उन्होंने पुरातनवाद के ऊपर नवीनता तथा क्रान्तिकारी विजय पाने का प्रयास किया है. उनके द्वारा प्रेम, शांति, सेक्स, रिश्तों आदि पर दिए गए प्रवचन अपने आपमें एक अद्भुत दर्शन की नवीनतम व्याख्या करते हैं. उनके द्वारा समाजवाद, महात्मा गाँधी की विचारधारा तथा संस्थागत धर्म पर की गई अलोचनाओं ने उन्हें विवादास्पद बना दिया. वे काम के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण के भी हिमायती थे, जिसकी वजह से उन्हें कई भारतीय और फिर विदेशी पत्रिकाओ में सेक्स गुरु के नाम से भी संबोधित किया गया. अपने बुद्धि कौशल से उन्होंने विश्वभर में अपने अनुययियों को जिस सूत्र में बांधा वह काफ़ी हंगामेदार साबित हुआ. उनकी भोगवादी विचारधारा के अनुयायी सभी देशों में पाये जाते हैं. 



आज, 19 जनवरी को उन्हीं ओशो का देहांत हुआ था. उनका जन्म 11 दिसम्बर, 1931 को जबलपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ था. बचपन में उनको रजनीश चन्द्र मोहन के नाम से जाना जाता था. जबलपुर विश्वविद्यालय से स्नातक तथा सागर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1959 में उन्होंने व्याख्याता का पद सम्भाला. वे धर्म एवं दर्शनशास्त्र के ज्ञाता बन चुके थे. ओशो ने पुणे में कम्यून की स्थापना की और अपने विचित्र भोगवादी दर्शन के कारण शीघ्र ही विश्व में चर्चित हो गये. बाद में उन्होंने अमेरिका पहुँच कर वहाँ भी मई 1981 में ओरेगोन (यू.एस.ए.) में अपना कम्यून बनाया. ओरेगोन के निर्जन भूखण्ड को रजनीश ने जिस तरह आधुनिक, भव्य और विकसित नगर का रूप दिया वह उनके बुद्धि चातुर्य का साक्षी है. 

सम्भोग से समाधि तक, मृत्यु है द्वार अमृत का, संम्भावनाओं की आहट, प्रेमदर्शन आदि उनकी कृतियाँ अत्यंत प्रसिद्द हैं. उन्होंने अपना निज़ी अध्यात्म गढ़कर उसका काम के साथ समन्वय करके एक अदभुत वैचारिकी को जन्म दिया. उनकी मृत्य 19 जनवरी 1990 को हुई. 

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बुधवार, 18 जनवरी 2017

डॉ. हरिवंश राय 'बच्चन' और ब्लॉग बुलेटिन

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।।
हरिवंश राय बच्चन ( जन्म: 27 नवंबर, 1907 - मृत्यु: 18 जनवरी, 2003) हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध कवि और लेखक थे। इनकी प्रसिद्धि इनकी कृति 'मधुशाला' के लिये अधिक है। हरिवंश राय बच्चन के पुत्र अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा जगत के प्रसिद्ध सितारे हैं।
27 नवंबर, 1907 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में जन्मे हरिवंश राय बच्चन हिन्दू कायस्थ परिवार से संबंध रखते हैं। यह 'प्रताप नारायण श्रीवास्तव' और 'सरस्वती देवी' के बड़े पुत्र थे। इनको बाल्यकाल में 'बच्चन' कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ 'बच्चा या संतान' होता है। बाद में हरिवंश राय बच्चन इसी नाम से मशहूर हुए। 1926 में 19 वर्ष की उम्र में उनका विवाह 'श्यामा बच्चन' से हुआ जो उस समय 14 वर्ष की थी। लेकिन 1936 में श्यामा की टी.बी के कारण मृत्यु हो गई। पाँच साल बाद 1941 में बच्चन ने पंजाब की तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। इसी समय उन्होंने 'नीड़ का पुनर्निर्माण' जैसे कविताओं की रचना की। तेजी बच्चन से अमिताभ तथा अजिताभ दो पुत्र हुए। अमिताभ बच्चन एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। तेजी बच्चन ने हरिवंश राय बच्चन द्वारा 'शेक्सपीयर' के अनुदित कई नाटकों में अभिनय किया है।

( साभार : http://bharatdiscovery.org/india/हरिवंश_राय_बच्चन )



आज महान कवि स्वर्गीय डॉ. हरिवंश राय 'बच्चन' जी की 14वीं पुण्यतिथि पर पूरा हिन्दी ब्लॉग जगत और हमारी बुलेटिन टीम उन्हें शत शत नमन करते है।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...


उनके ऊंट की पूंछ पर लटकता था ब्रिटिश आर्मी का झन्डा

बोल-बोल सकारात्मक बोल!

धूर्त लोगों का भला सोच समझ कर करें

गांव तुम्हारा - शहर हमारा...

राहुल गांधी और अखिलेश साथ साथ

इस कड़ाके की सर्दी में...

विकास ज़ोरों -शोरों पर

बंकर बस्ती - निदा नवाज़ की कविता

समानता

हिरण ने लिखा सलमान को पत्र, कहा "भाई थैंक यू वैरी मच"


आज की ब्लॉग बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

समझ लेते हो तुम सब




समझ लेते हो तुम वह सब 
जिसकी आलोचना करते तुम रुकते नहीं 
जब तक दूसरों के जूते काटते हैं 
तुम टेढ़ी मुस्कान के साथ कहते हो 
नंगे पाँव ही चलो न  .... 
सारे हास्यास्पद हल होते हैं तुम्हारे पास 
पर वही जूते 
जब तुम्हें काटते हैं 
तुम्हारी भाषा बदल जाती है 
तुम अनोखे हो जाते हो !

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आहुति"लिखती है...!!!

ਜਿਵੇਂ ਨਿੱਕੇ -ਨਿੱਕੇ ਆਲ੍ਹਣੇ ( जैसे छोटे -छोटे कोटर )


सोमवार, 16 जनवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन और ओपी नैय्यर

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।
ओंकार प्रसाद नैय्यर (अंग्रेज़ी: Omkar Prasad Nayyar, जन्म: 16 जनवरी, 1926 - मृत्यु: 28 जनवरी, 2007) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे। अपने सुरों के जादू से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जैसे कई पार्श्वगायक और पार्श्वगायिकाओं को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले महान संगीतकार ओ. पी. नैय्यर के संगीतबद्ध गीत आज भी लोकप्रिय है।

जीवन परिचय

16 जनवरी 1926 को लाहौर (पाकिस्तान) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे ओंकार प्रसाद नैय्यर उर्फ ओ.पी. नैय्यर का रुझान बचपन से ही संगीत की ओर था। वह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। भारत विभाजन के पश्चात उनका पूरा परिवार लाहौर छोड़कर अमृतसर चला आया। ओंकार प्रसाद ने संगीत की सेवा करने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। अपने संगीत के सफ़र की शुरूआत इन्होंने आल इंडिया रेडियो से की।

फ़िल्मी सफर

बतौर संगीतकार फ़िल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिये ओ. पी. नैय्यर वर्ष 1949 में मुंबई आ गये। मुंबई मे उनकी मुलाकात जाने माने निर्माता निर्देशक कृष्ण केवल से हुई जो उन दिनों फ़िल्म 'कनीज़' का निर्माण कर रहे थे। कृष्ण केवल उनके संगीत बनाने के अंदाज से काफ़ी प्रभावित हुये और उन्होंने फ़िल्म के बैक ग्राउंड संगीत देने की पेशकश की। इस फ़िल्म के असफल होने से ओ. पी. नैय्यर बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे भले ही सफल न हो सके लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री मे उनका कैरियर अवश्य ही शुरू हो गया।

( साभार : http://bharatdiscovery.org/india/ओ._पी._नैय्यर )


आज ओपी नैय्यर जी के 91वें जन्मदिवस पर हिन्दी ब्लॉगजगत और पूरा भारत उनके मधुर संगीत को सुनते हुये  उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सादर।।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...


ऑनलाइन मतदान की ओर कदम बढ़ाने का सही वक्त!

सही वक़्त पर सही फ़ैसले का नाम धोनी

अमित जी, सिर्फ मसालों से ही भोजन स्वादिष्ट नहीं बन जाता

इमेज बिल्डिंग! (प्रसंग - नितीश कुमार)

बाकी बहुत कुछ रहता है !!!

ओरछा क्यों जाना चाहिये ?

वाईकॉम का महादेव मंदि‍र और दीपमाला

संसद के कितने सत्र होते हैं?

बुरा वक़्त अच्छे लोग

सोमवार की आत्मकथा


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे तब तक के लिए शुभरात्रि।

रविवार, 15 जनवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन - ये है दिल्ली मेरी जान

दिल्ली हमको आए हुए सात महीना हो गया है अऊर ई सात महीना में अगर हम कहें कि हमको दिल्ली से प्यार हो गया है त कोनो अतिस्योक्ति नहीं होगा. ई सहर हमरे मोहब्बत के लिस्ट में कहीं था ही नहीं. मगर “भयो क्यों अनचाहत को संग” के तरह हमरे साथ लग गया. पाँच साल बिताकर गुजरात गए, मगर अफसोस नहीं हुआ दिल्ली छोडने का. अब जब चार साल बाद लौटकर आए हैं, त ओही दिल्ली, ओही ऑफिस, ओही जगह मगर प्यार हो गया है हमको. अऊर गुलजार साहब का ओही गनवा गुनगुनाने का मन कर रहा है कि रोको ना, टोको ना, हमको प्यार करने दो.

हमारा ऑफिस के बगले में है “राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय”. ई कड़ाका का ठण्डा में भी बहुत सा नाटक देखने गए. एही बहाने हमको अपने जिन्न्गी का सबसे बड़ा खालीपन भरने का मौक़ा मिला. कुछ बेहतरीन नाटक का बहुत उम्दा प्रस्तुति देखने को मिला अऊर अपना से आधा उम्र का बच्चा सब का अभिनय परतिभा देखकर त मुग्ध हो गए. ई बिद्यालय हमारा देस को एतना बढ़िया-बढ़िया कलाकार दिया है कि इसका परिसर में घूमते हुए लगता है कि एगो अलगे दुनिया में आ गए हैं.

एहिं पासे में है प्रगति मैदान. सहर के बीचो बीच एतना बड़ा जगह उपलब्ध करवाना जिसमें दुनिया भर का लोग अपना प्रोडक्ट का प्रोमोसन कर सके. केतना तरह का मेला एही मैदान में आयोजित होता रहता है. मगर सबसे बड़का आकर्सन होता है अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला का. दुनिया भर का परकासन संस्थान अपना नया पुराना सब तरह का किताब एही मेला में लोग के सामने लेकर आते हैं अऊर पढने वाला को एक्के जगह सब तरह का किताब मिल जाता है. कहे वाला लोग त ईहो कहता है कि आजकल ऑनलाइन शॉपिंग का ज़माना है, सब कुछ मिलता है. ई बात पर हम गुलज़ार साहब का ऊ नज़्म नहीं सुनाएंगे जो सबको ज़ुबानी इयाद है (जुबां से ज़ायका जाता नहीं सफहे पलटने का), हम त एही कहेंगे कि बच्चा का फोटो देखकर अच्छा लगता है, बाकी असली खुसी त बच्चा को गोदी में लेकर, हाथ से छूकर, प्यार से उसका गाल सहलाकर, दुलारकर अऊर पुचकारे बिना कहाँ आता है.

हर तरह का, हर बिसय का किताब हर स्टाल पर मिलता है. आप जाइए, हाथ में उठाइये, पन्ना पलटकर देखिये अऊर खरीद लीजिए अच्छा छूट पर. पुराना कहावत है कि बिना किताब का घर, बिना खिडकी के मकान के तरह होता है अऊर जहाँ एतना किताब हो, ऊ जगह त हवा महल कहलाने लायक होगा.

हम लोग जैसा लोग ब्लॉग के माध्यम से ना जाने केतना लोग के साथ जुड़े. इसको एही बात से जाना जा सकता है कि अलग अलग प्रांत अऊर सहर में रहते हुए भी हमलोग को एक दूसरा से जुडना, पहचान बनाना अऊर सबसे बड़ा बात उनका रचना से परिचित होने का मौक़ा मिला. धीरे धीरे वही रचना एक किताब का सकल में हमलोग के हाथ में आने लगा. बहुत सा लोग ई बात का मजाक उड़ाने वाला भी मिला, मगर मजाक उड़ाना बहुत आसान है, कर के देखाना बहुत मोसकिल है. एगो पुराना कहावत है कि अगर आदमी एही इंतज़ार में रहा कि ऊ ऐसा काम करे कि कोई उसमें गलती नहीं निकाल सके, त बूझ जाइए कि ऊ जीबन भर कोनो काम नहीं कर सकता है.

इस बार हमरा पुस्तक मेला का सुरुआत हुआ प्रियंका गुप्ता के आदेस पर उससे मिलने से. हमलोग पहिला बार मिले, मगर अपना भतीजी से मिलकर मन खुस हो गया.


निर्मला कपिला जी के गज़ल संग्रह का लोकार्पण था अऊर उनका आमंत्रण भी मिला था. इस उम्र में भी एतना उम्दा सायरी कर लेना सलाम करने जोग्य है.  

कुश वैष्णव, पराग अग्रवाल, इरशाद खान ‘सिकंदर’, व्योमा मिश्रा, मीनाक्षी जी आदि लोगों से पहिला बार मिलना हुआ. इसके अलावा पुराना दोस्त लोगों में से रश्मि रविजा, आराधना मुक्ति, सोनल रस्तोगी अऊर अरुण चंद्र रॉय जी के साथ मुलाक़ात हुआ अऊर बहुत सा बात हुआ पुराना टाइम को याद करके. अनूप शुक्ल जी के साथ मिलना ओही पुरनका गरमजोसी के साथ. देखते साथ हमसे गला मिले अऊर छूटते बोले कि अगिला साल आपका किताब भी आ जाना चाहिए सलिल जी. हम मुस्कुराकर रह गए, अऊर मने मन बोले कि अभी हम इस लायक नहीं हुए हैं.

पूरा मेला का हासिल रहा स्वप्निल तिवारी जी गज़ल संग्रह “चाँद डिनर पर बैठा है” – ई उनका पहिला संग्रह है जो पहले उर्दू में अऊर अब लिप्यांतर के बाद देवनागरी में छपा है. अब चूँकि ऊ हमारी बिटिया वर्तिका श्रीवास्तव के पति हैं इसलिए हमारे दामाद हैं अऊर उनको आदर सूचक संबोधन से सूचित कर रहे हैं हम.

ई पूरा यात्रा में हमारे साथ रहा हमारा भतीजा अभिषेक कुमार. दिल्ली आने के बाद से हमारा कला यात्रा में यही हमको श्रवण कुमार के तरह तीर्थयात्रा पर ले जाता है. 

कल बिटिया को लेकर गए तो हमारी पुत्री ने भी शरलॉक होम्स का पूरा सेट अऊर फोटोग्राफी का किताब खरीदा. अऊर हमारा अंतिम दरसन किया, हमारे ब्लॉग बुलेटिन सहजोगी अऊर प्रिय अनुज अजय कुमार झा ने.

शनिवार, 14 जनवरी 2017

कुल्हड़ की चाय सा




कुछ समय कुल्हड़ की चाय सा होता है 
स्पेशल, इलायचीवाली 
 - थकान उतर जाती है 

साथ में हो कुछ पढ़ने को, तो बात ही अलग है 


पतंग
आवा राजा चला उड़ाई पतंग ।
एक कन्ना हम साधी
एक कन्ना तू साधा
पेंचा-पेंची लड़ी अकाश में
अब तs ठंडी गयल
धूप चौचक भयल
फुलवा खिलबे करी पलाश में
काहे के हौवा तू अपने से तंग । [आवा राजा चला...]
ढीला धीरे-धीरे
खींचा धीरे-धीरे
हम तs जानीला मंझा पुरान बा
पेंचा लड़बे करी
केहू कबले डरी
काल बिछुड़ी जे अबले जुड़ान बा
भक्काटा हो जाई जिनगी कs जंग । [आवा राजा चला...]
केहू सांझी कs डोर
केहू लागेला अजोर
कलुआ चँदा से मांगे छुड़ैया
सबके मनवाँ मा चोर
कुछो चले नाहीं जोर
गुरू बूझा तनि प्रेम कs अढ़ैया
संझा के बौराई काशी कs भंग। [आवा राजा चला...]


हज़ारों मन्नतो के बाद मेरी आत्मा का खोया टुकड़ा
मेरी कोख में आया...
उसे पहली बार जब नर्स मेरे सामने लाई तो
सब कुछ धुँधला धुँधला सा दिखाई दिया..
दिखता कैसे ?
ये आँखें खुशी से जो भरी थी..
छलकती थी फिर भरती थी..
जाती हुई नर्स से एक मिनट रूक फिर से उसे
जी भर देखने कि गुज़ारिश कि..
ओर आँख भर कर उसे देखती रही...
वो पल वहीं रूक गए..वो वक़्त वहीं थम गया...
मेरे जीवन का सबसे खुशी का पल वही था..
जिस वक़्त मेरा काव्यांश मेरे सामने था..
वो जैसे मेरी कविताओं का सार..मेरे दिल कि गहराई..
मेरी टीस भाँपता हुआ सा..नापता हुआ सा..
मेरी आँखों में आँखें डाल..
मेरे हिस्से का सारा प्यार उँडेलता हुआ सा..
मेरी पलकों कि डालियों पे आ बैठा..!!
मेरी सारी टीसों पे एक साथ मलहम
जैसा आया मेरा काव्यांश...।।।।
वो छह महीने का हुआ तो फिर से नौकरी पे
जाने का समय आया..
पर उसे रोता छोड एक पल को भी कहीं जाने
कि हिममत ना हुई..
ऐसी लाखों नौकरियाँ क़ुर्बांन मेरी जान पर...
बस फिर क्या..तरक़्क़ी..नौकरी..
हर चीज को ताक पे रख दो साल कि लीव
विदाऊट पे के लिए अपलाई कर दिया...
ओर छुट्टी ले ली उसके ओर मेरे बीच आने
वाली हर चीज से..
बस एक ही चाह थी..पल पल उसे बड़ा होते देखना..
उसकी हर अदा को दिल में क़ैद करना..
उसकी हर मुस्कुराहट में हज़ारों बार जी जाना..
ओर उसकी एक आह पे हज़ारों बार मर जाना..
अंधेरी रातों में उसकी अंगुलीयां मेरी आँखों को
नींदों का रास्ता दिखाती रही..
उसका प्यार मेरी ताकत बनता रहा..
आफिस कि सब ज़रूरी ट्रेनिंग छोड दी..
ओर जहाँ मेरा जाना ज़रूरी था..
हर उस जगह उसे साथ ले गई..
कभी ना ले जा पाएगी तो दौड़ते भागते
रात तक उसके पास पहुँच ही गई....
जब कभी काव्यांश कभी मेरे पीछे से रोया..
तो लौट कर हर बार उसे समझाया..
कि
माँ जहाँ कहीं भी होगी जब भी
तुम बुलाओगे आ जाएगी..
ओर काव्यांश ने भी यही समझा
कि देर से ही सही पर
माँ आ ही जाएगी...
जब भी बच्चे के गोद में लिए कोई माँ
मेरे सामने..बच्चो कि देखभाल के कारण
नौकरी ना कर पाने का अफ़सोस जताती है..
तब मैं उनसे कहती हूँ..
कि सबसे ख़ुशनसीब होती हैं वो औरतें
जो सुबह से शाम अपने बच्चो के बीच बिताती हैं..
कामयाबी केवल खुद के पैरों पर खड़ा होना ही नहीं..
अपितु परिवार कि नींव बनना भी है..
बच्चों को अच्छे संस्कार देना व प्रेम सिखाना भी है..
कामयाबी वो है जब आपके बच्चे आपके आदर में
सर झुकाए ओर जब आप के दर्द में
उनकी पलके भीग जाए...
कामयाबी वो है जब वक़्त ओर हालात कि ज़रूरत
देखते हुए आप अपने बच्चों के लिए अपने
सपने क़ुर्बान कर देते हो...
मेरे काव्यांश..
तुम्हारे जन्म के बाद ही मैंने जाना
कि असली
कामयाबी चुप रह जाने में है...
प्रेम में हैं...हार मान लेने में है...
किसी को जिताने में है...
मैं कोशिश करूँगी कि कुछ ओर समय तुम्हारे
साथ बिताऊँ
क्यूँ कि तुम्हारी ये
छोटे छोटे खिलौने..
तोतली बातें..
बेमतलब कि ज़िदे..
बाज़ार घूमने कि बेताबी...
डंडों के खेल...
समय के साथ कम होते जाएँगें..
तुम बडे होते जाओगे...
सोच समझ के बातें करने लगोगे...
दोस्तों के संग घूमोगे...
ओर मैं नहीं चाहती
कि तब मैं अफ़सोस करूँ...
के काश कुछ ओर समय तुम्हारी
तोतली ज़बान सुनी होती..
कि कुछ ओर समय
तुम्हारे बेतुके खेल समझे होते...
कुछ ओर समय...
तुम्हें समझा होता..
तुम्हारा बचपन जीया होता...
इसलिए मैं सुनिश्चित करूँगी..
कि कुछ ओर समय तुम्हारे साथ बिताऊँ...
तुम्हें समझू...तुम्हें जीयूं....
तुम्हारी मासूम बातो में
जीवन के कुछ ओर सार्थक
अर्थ खोजूँ....
तुम्हारे प्रेम में विवश...
#तुम्हारीमां

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री - राकेश शर्मा - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

राकेश शर्मा (अंग्रेज़ी:Rakesh Sharma, जन्म:13 जनवरी, 1949 पटियाला, पंजाब) भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री हैं। उन्हें अंतरिक्ष यान में उड़ने और पृथ्वी का चक्कर लगाने का अवसर 2 अप्रैल, 1984 में मिला था। वे विश्व के 138वें अंतरिक्ष यात्री हैं। स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा ने लो ऑर्बिट में स्थित सोवियत स्पेस स्टेशन की उड़ान भरी थी और सात दिन स्पेस स्टेशन पर बिताए थे। भारत और सोवियत संघ की मित्रता के गवाह इस संयुक्त अंतरिक्ष मिशन के दौरान राकेश शर्मा ने भारत और हिमालय क्षेत्र की फ़ोटोग्राफी भी की। 

भारतवासियों के लिए वो गर्व का क्षण था जब राकेश शर्मा के अन्तरिक्ष मे रहते हुये एक सीधे प्रसारण के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूछने पर कि अंतरिक्ष से भारत कैसा लगता है, तब उन्होने ने कहा- 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा'। 
 
 

आज राकेश शर्मा जी के ६८ वें जन्मदिन के अवसर पर ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से हम सब उनको अपनी हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं |
 
सादर आपका

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

स्वामी विवेकानन्द को याद करते हुए - ब्लॉग बुलेटिन

नमस्कार साथियो,
आप सभी को राष्ट्रीय युवा दिवस की शुभकामनायें.
युवा संन्यासी के नाम से प्रसिद्द स्वामी विवेकानन्द जी के जन्मदिन को सम्पूर्ण देश इसे मनाता है. आज ही के दिन यानि कि 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानन्द का जन्म कलकत्ता में हुआ था. उनकी माता का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी और पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त था. उनको बचपन में नरेन्द्रनाथ के नाम से पुकारा जाता था. 25 वर्ष की आयु में उनकी मुलाकात स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई. उनके विचारों से प्रभावित होकर वे उनके शिष्य बन गए. सितम्बर 1893 में स्वामी विवेकानन्द विश्व धर्म सम्मलेन में शामिल होने के लिए शिकागो (अमेरिका) गए. वहाँ उनको संबोधन के लिए अत्यंत कम समय मिलने के साथ-साथ सबसे अंत में अवसर दिया गया था. वहाँ उन्होंने Sisters and Brothers of America (अमेरिकी भाइयों एवं बहनों) के साथ अपने भाषण का आरम्भ कर समूचे हॉल को प्रभावित किया. इसके बाद वे भारतीय दर्शन, संस्कृति पर ओजपूर्ण, धाराप्रवाह व्याख्यान देने के चलते लोगों के चहेते बन गए. 


अपने गुरु के निधन के पश्चात् स्वामी विवेकानन्द ने 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके अपने गुरुजी के विचारों को सम्पूर्ण देश में प्रसारित करने का कार्य किया. इसके अलावा 9 दिसंबर 1898 को कलकत्ता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना भी की. वेदांत दर्शन के प्रतिपादक स्वामी विवेकानन्द का कहना था कि उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये. उनके द्वारा योग, राजयोग तथा ज्ञानयोग जैसे ग्रंथों की रचना की गई. स्वामी विवेकानन्द का देहांत 04 जुलाई 1902 को हुआ. उनकी समाधि बेलूर में गंगा तट पर स्थित है.
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वामी विवेकानन्द के बारे में लिखा है कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं.
ब्लॉग बुलेटिन परिवार की तरफ से स्वामी विवेकानन्द को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है.  

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बुधवार, 11 जनवरी 2017

ब्लॉग बुलेटिन - पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की 51वीं पुण्यतिथि

सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा सादर नमस्कार।

आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की 51वीं पुण्यतिथि पर हम सब उन्हें याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर...

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की ५१ वीं पुण्यतिथि

जय जवान जय किसान का नारा कैसे लगायें!

अफ़साने और भी हैं

छोरी समझ कर न लड़ियो

स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा लें युवा

खोदा पहाड़ निकला अकबर!

ई -वॉलेट को मिल पायेगा वो भरोसा !

भाषा नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी : बिष्ट

मातम भी तो मज़ाक़ है


आज की बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे। तब तक के लिए शुभरात्रि। जय जवान। जय किसान।।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

१० जनवरी - विश्व हिन्दी दिवस - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

आज १० जनवरी है ... आज विश्व हिन्दी दिवस है | विश्व हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी को पूरे विश्व में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। 

विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। इसीलिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 


भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी, 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं।

 ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सभी हिन्दी ब्लॉगर मित्रों को विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं | 

सादर आपका

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विश्व हिन्दी दिवस और शब्द क्रमंचय संचय प्रयोग सब करते हैं समझते एक दो हैं

परिप्रेक्ष्य : विश्व हिंदी दिवस : राहुल राजेश

कर्म और आचरण में अक्सर फर्क होता है

प्रेम- विवाह से पहले या बाद......

रोओ रुदालियों अपना अपना रोना रोओ -----mangopeople

वो गुज़रा ज़माना याद आया...

और इक बरस बीता

ओरछा महामिलन का शानदार आगाज

निर्धन की क्या जाति बता दो -

भारतीय ब्लॉगरों और साहित्यकारों ने न्यूजीलैंड में फहराई हिन्दी की पताका

40 पार के बाद सुखमय वृद्धावस्था के लिए यह भी याद रखें...

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

जय हिन्दी !!!

सोमवार, 9 जनवरी 2017

भारतीय प्रवासी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन

प्रवासी भारतीय दिवस या अनिवासी भारतीय दिवस 9 जनवरी को पूरे भारत में मनाया जाता है। 9 जनवरी 1915 को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मान्यता दी गई है क्योंकि इसी दिन महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और अंततः दुनिया भर में प्रवासी भारतीयों और औपनिवेशिक शासन के तहत लोगों के लिए और भारत के सफल स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरणा बने। यह दिन हर साल प्रवासी भारतीय दिवस (पीबीडी) सम्मेलन के रूप में मनाया जाता है। प्रवासी भारतीय दिवस 'प्रवासी भारतीय मामले मंत्रालय' का प्रमुख कार्यक्रम है।

प्रवासी भारतीय समुदाय

भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा डायस्पोरा है। प्रवासी भारतीय समुदाय अनुमानतः 2.5 करोड़ से अधिक है। जो विश्व के हर बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। फिर भी किसी एक महान भारतीय प्रवासी समुदाय की बात नहीं की जा सकती। प्रवासी भारतीय समुदाय सैंकड़ों वर्षों में हुए उत्प्रवास का परिणाम है और इसके पीछे विभिन्न कारण रहे हैं, जैसे- वाणिज्यवाद, उपनिवेशवाद और वैश्वीकरण। इसके शुरू के अनुभवों में कोशिशों, दुःख-तकलीफों और दृढ़ निश्चय तथा कड़ी मेहनत के फलस्वरूप सफलता का आख्यान है। 20वीं शताब्दी के पिछले तीन दशकों के उत्प्रवास का स्वरूप बदलने लगा है और "नया प्रवासी समुदाय" उभरा है जिसमें उच्च कौशल प्राप्त व्यावसायिक पश्चिमी देशों की ओर तथा अकुशल,अर्धकुशल कामगार खाड़ी, पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया की और ठेके पर काम करने जा रहे हैं।

( साभार : http://bharatdiscovery.org/india/प्रवासी_भारतीय_दिवस )


अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर ...

हरगोविंद खुराना

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नए साल की शुभकामनायें

आज की ब्लॉग बुलेटिन में बस इतना ही कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए शुभरात्रि। सादर ... अभिनन्दन।।

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